श्री सूक्तम् — ऋग्वेद खिलानि, १६ पावन वैदिक मन्त्र, हिंदी अर्थ एवं लक्ष्मी अनुष्ठान विधि
The Sri Suktam (श्री सूक्तम्) is a foundational, primordial Vedic hymn found in the parishishta (Khilani) of the Rigveda. Addressed to Agni (the sacred fire) as the divine messenger to invoke Goddess Sri (Mahalakshmi), this hymn contains 16 timeless mantras that re-align the human energy field with the cosmic frequency of nourishment, radiant beauty, and gold-hued abundance (Hiranya-varnam). Unlike later emotional prayers, the Sri Suktam operates as an energetic sonic science that clears the subtle debris of poverty (Alakshmi) from the mind, home, and lineage.
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॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥
अरुणकमलसंस्था तद्रजःपुञ्जवर्णा करकमलधृतेष्टाभीतिमुग्धांबुजा च । मणिकुंडलभूषा भास्कराभा त्रिनेत्रा कमलमुकुलरम्या श्रीरभीष्टां ददातु ॥
Aruṇa-kamala-saṁsthā tad-rajaḥ-puñja-varṇā Kara-kamala-dhṛteṣṭābhīti-mugdhāmbujā ca | Maṇi-kuṇḍala-bhūṣā bhāskarābhā trinetrā Kamala-mukula-ramyā śrīr-abhīṣṭāṁ dadātu ||
जो लाल कमल पर विराजमान हैं, कमल के पराग के समान जिनका दिव्य वर्ण है, जिनके करकमल वरद, अभय और मनोहर कमल पुष्प धारण किए हुए हैं, मणियों के कुंडल से जो सुशोभित हैं, सूर्य के समान जिनका तेज है, वे त्रिनेत्रधारिणी भगवती श्री हमारे समस्त मनोरथों को पूर्ण करें।
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १ ॥
Oṁ hiraṇya-varṇāṁ hariṇīṁ suvarṇa-rajata-srajām | Candrāṁ hiraṇmayīṁ lakṣmīṁ jātavedo ma āvaha || 1 ||
हे अग्निदेव (जातवेदा)! सुवर्ण के समान कांति वाली, हरिणी के सदृश चंचल और सुंदर, सोने और चांदी के हार धारण करने वाली, चंद्रमा के समान शीतल और प्रकाशित, स्वर्णमयी भगवती लक्ष्मी का मेरे कल्याण के लिए आह्वान कीजिए।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥
Tāṁ ma āvaha jātavedo lakṣmīm-anapagāminīm | Yasyāṁ hiraṇyaṁ vindeyaṁ gām-aśvaṁ puruṣān-aham || 2 ||
हे अग्निदेव! आप मेरे लिए उन स्थिर लक्ष्मी को बुलाइए, जो कभी मुझे छोड़कर न जाएं; जिनके अनुग्रह से मैं सुवर्ण, गौ, अश्व और उत्तम सेवकों/पुत्रों को प्राप्त कर सकूं।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३ ॥
Aśva-pūrvāṁ ratha-madhyāṁ hasti-nāda-pramodinīm | Śriyaṁ devīm-upahvaye śrīr-mā devī juṣatām || 3 ||
जिनके आगे-आगे घोड़े दौड़ते हैं, जो दिव्य रथ के मध्य में विराजमान हैं, और हाथियों की चिंघाड़ की गूंज से जो प्रसन्न होती हैं, उन भगवती श्री का मैं आह्वान करता हूं; वे देवी मुझ पर प्रसन्न होकर मेरी सेवा स्वीकार करें।
कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥
Kāṁ sosmitāṁ hiraṇya-prākārām-ārdrāṁ jvalantīṁ tṛptāṁ tarpayantīm | Padme sthitāṁ padma-varṇāṁ tām-ihopahvaye śriyam || 4 ||
जो मंद मुस्कान वाली हैं, सुवर्ण के कोट से घिरी हैं, दया से आर्द्र हैं, तेजस्वी हैं, स्वयं तृप्त रहकर भक्तों को तृप्त करने वाली हैं, कमल पर विराजमान और कमल के समान वर्ण वाली हैं, उन श्री महालक्ष्मी को मैं यहां सादर आमंत्रित करता हूं।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥
Candrāṁ prabhāsāṁ yaśasā jvalantīṁ śriyaṁ loke deva-juṣṭām-udārām | Tāṁ padminīm-īṁ śaraṇam-ahaṁ prapadye'lakṣmīr-me naśyatāṁ tvāṁ vṛṇe || 5 ||
जो चंद्रमा के समान आह्लादकारी, प्रकाशमयी, अपने यश से दीप्तिमान, देवगणों द्वारा पूजित और अत्यंत उदार हैं, उन कमलनयनी महालक्ष्मी की मैं शरण लेता हूं। हे देवि! मेरी दरिद्रता का नाश हो, मैं आपकी शरण में आता हूं।
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६ ॥
Āditya-varṇe tapaso'dhijāto vanaspatis-tava vṛkṣo'tha bilvaḥ | Tasya phalāni tapasā nudantu māyāntarāyāśca bāhyā alakṣmīḥ || 6 ||
हे सूर्य के समान तेजस्वी वर्ण वाली भगवती! आपकी तपस्या से ही वनस्पतियों में श्रेष्ठ 'बिल्व वृक्ष' उत्पन्न हुआ है। उस वृक्ष के फल हमारी आंतरिक अविद्या और बाह्य दरिद्रता (अलक्ष्मी) को समूल नष्ट कर दें।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥
Upaitu māṁ deva-sakhaḥ kīrtiśca maṇinā saha | Prādurbhūto'smi rāṣṭre'smin kīrtim-ṛddhiṁ dadātu me || 7 ||
देवताओं के सखा कुबेर और यश मणि (चिंतामणि) सहित मेरे पास आएं। इस राष्ट्र में उत्पन्न हुए मुझ भक्त को देवी महालक्ष्मी यश और अक्षय समृद्धि प्रदान करें।
क्षुत्पिपासाकलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥
Kṣut-pipāsā-malāṁ jyeṣṭhām-alakṣmīṁ nāśayāmy-aham | Abhūtim-asamṛddhiṁ ca sarvān nirṇuda me gṛhāt || 8 ||
भूख-प्यास से पीड़ित रहने वाली, दरिद्रता की देवी 'ज्येष्ठा अलक्ष्मी' का मैं नाश करता हूं। हे महालक्ष्मी! मेरे घर से समस्त अभाव, विपन्नता और अमंगल को सदा के लिए दूर कर दें।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ९ ॥
Gandha-dvārāṁ durādharṣāṁ nitya-puṣṭāṁ karīṣiṇīm | Īśvarīṁ sarva-bhūtānāṁ tām-ihopahvaye śriyam || 9 ||
जो सुगंधित गंध वाली, किसी से भी न दबने वाली, सदैव पुष्टि और संपन्नता से युक्त, गोधन व धान्य से समृद्ध और समस्त प्राणियों की स्वामिनी हैं, उन श्री महालक्ष्मी को मैं अपने घर बुलाता हूं।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १० ॥
Manasaḥ kāmam-ākūtiṁ vācaḥ satyam-aśīmahi | Paśūnāṁ rūpam-annasya mayi śrīḥ śrayatāṁ yaśaḥ || 10 ||
मेरे मन की शुभ कामनाएं और संकल्प सिद्ध हों, मेरी वाणी में सत्य का वास हो। गो-पशु, उत्तम अन्न, ऐश्वर्य और यश मेरे जीवन में सदा आश्रय पाएं।
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम । श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥ ११ ॥
Kardamena prajā-bhūtā mayi sambhava kardama | Śriyaṁ vāsaya me kule mātaraṁ padma-mālinīm || 11 ||
हे कर्दम ऋषि! आपके पुत्र रूप में उत्पन्न होने वाली जगन्माता महालक्ष्मी मेरे कुल में निवास करें। कमल की माला धारण करने वाली माता लक्ष्मी को आप हमारे वंश में सदा स्थापित करें।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥ १२ ॥
Āpaḥ sṛjantu snigdhāni ciklīta vasa me gṛhe | Ni ca devīṁ mātaraṁ śriyaṁ vāsaya me kule || 12 ||
जल देवता स्निग्ध और कल्याणकारी पदार्थों की रचना करें। हे चिक्लीत (लक्ष्मीपुत्र)! आप मेरे घर में वास करें और अपनी माता देवी लक्ष्मी का भी मेरे कुल में स्थायी निवास कराएं।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १३ ॥
Ārdrāṁ puṣkariṇīṁ puṣṭiṁ piṅgalāṁ padma-mālinīm | Candrāṁ hiraṇmayīṁ lakṣmīṁ jātavedo ma āvaha || 13 ||
हे अग्निदेव! जो दया से द्रवित, कमल के सरोवर जैसी शीतलता प्रदान करने वाली, पुष्टि स्वरूपा, पीतवर्णा, कमलमाला धारिणी, चंद्रमा के समान आह्लादकारी और सुवर्णमयी हैं, उन लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १४ ॥
Ārdrāṁ yaḥ kariṇīṁ yaṣṭiṁ suvarṇāṁ hema-mālinīm | Sūryāṁ hiraṇmayīṁ lakṣmīṁ jātavedo ma āvaha || 14 ||
हे अग्निदेव! जो दुष्टों को दंड देने वाली राजयष्टि स्वरूपा, सुवर्णमयी माला धारण करने वाली, सूर्य के समान प्रतापी और स्वर्ण रूपा हैं, उन महालक्ष्मी को मेरे कल्याणार्थ यहां ले आइए।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥ १५ ॥
Tāṁ ma āvaha jātavedo lakṣmīm-anapagāminīm | Yasyāṁ hiraṇyaṁ prabhūtaṁ gāvo dāsyo'śvān vindeyaṁ puruṣān-aham || 15 ||
हे अग्निदेव! आप मेरे लिए उस कभी न जाने वाली स्थिर लक्ष्मी का आवाहन करें, जिसके आने से मुझे प्रचुर सुवर्ण, गौएं, दास-दासियां, घोड़े और परिजन प्राप्त हों।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥ १६ ॥
Yaḥ śuciḥ prayato bhūtvā juhuyād-ājyam-anvaham | Śriyaḥ pañcadaśarcaṁ ca śrī-kāmaḥ satataṁ japet || 16 ||
जो मनुष्य पवित्र और संयमित होकर प्रतिदिन घी की आहुति देकर हवन करे और श्री की कामना से इन पंद्रह ऋचाओं वाले श्रीसूक्त का निरंतर पाठ करे, वह अक्षय लक्ष्मी को प्राप्त करता है।
फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)
जो भक्त नित्य १६ मंत्रों वाले श्री सूक्त का पाठ अथवा हवन करता है, उसके कुल में कभी धन और धर्म की कमी नहीं होती।
नित्य पाठ करें और आत्मिक शांति प्राप्त करें
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अन्य कल्याणकारी स्तोत्र
अपनी नित्य पूजा और साधना के लिए अन्य पावन स्तोत्रों का पाठ करें।
