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भगवान सूर्य नारायण31 श्लोक

आदित्यहृदय स्तोत्रम् — वाल्मीकि रामायण, सम्पूर्ण श्लोक, हिंदी अर्थ एवं सूर्य उपासना विधि

The Aditya Hridaya Stotram (आदित्यहृदय स्तोत्रम्) is a supreme Vedic hymn found in the Yuddha Kanda (Sarga 105) of Sage Valmiki's Ramayana. On the battlefield of Lanka, as Lord Rama paused after long hours of combat against the formidable Ravana, the revered Sage Agastya appeared alongside celestial seers and initiated Rama into this eternal secret of the Sun God (Surya Narayana). Reciting this stotra guarantees victory in righteous endeavors, radiates self-confidence, dispels debilitating depression and sluggishness, and bestows vibrant physical longevity.

दृश्य:
base
रचयिता / ऋषिमहर्षि अगस्त्य
मूल शास्त्र / स्रोतवाल्मीकि रामायण (युद्ध काण्ड, सर्ग १०५)
शुभ दिन व समयरविवार, मकर संक्रांति, छठ पर्व एवं नित्य सूर्योदय
कुल श्लोक संख्या31 श्लोक

दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर

सुझाव: नित्य 3 recitations on Sundays or 1 recitation daily पाठ करें। प्रत्येक पाठ के बाद 'गिनें' पर टैप करें।

पाठ संख्या0
ॐ

॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥

पाठ से पूर्व ध्यान

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥

Dhyeyaḥ sadā savitṛ-maṇḍala-madhya-vartī Nārāyaṇaḥ sarasijāsana-sanniviṣṭaḥ | Keyūravān makara-kuṇḍalavān kirīṭī Hārī hiraṇmaya-vapur-dhṛta-śaṅkha-cakraḥ ||

भावार्थ:

सूर्यमंडल के मध्य में विराजमान, कमल के आसन पर स्थित, बाजूबंद, मकराकृत कुंडल, मुकुट और सुंदर हार धारण किए हुए, स्वर्ण के समान तेजस्वी शरीर वाले तथा हाथों में शंख और चक्र लिए हुए भगवान सूर्यनारायण का हमें सदैव ध्यान करना चाहिए।

श्लोक1

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ १ ॥

Tato yuddha-pariśrāntaṁ samare cintayā sthitam | Rāvaṇaṁ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam || 1 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उधर रणभूमि में युद्ध से थके हुए और चिंता में खड़े हुए भगवान श्री राम को देखकर तथा उनके सामने रावण को पुनः युद्ध के लिए उपस्थित पाकर...

श्लोक2

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः ॥ २ ॥

Daivataiśca samāgamya draṣṭum-abhyāgato raṇam | Upāgamyābravīd-rāmam-agastyo bhagavān ṛṣiḥ || 2 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए पधारे हुए परम तेजस्वी भगवान अगस्त्य मुनि ने श्री राम के समीप जाकर उनसे यह कल्याणकारी वचन कहा...

श्लोक3

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥ ३ ॥

Rāma rāma mahā-bāho śṛṇu guhyaṁ sanātanam | Yena sarvān-arīn vatsa samare vijayiṣyasi || 3 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे महाबाहु राम! हे वत्स! इस परम गोपनीय और सनातन रहस्य को सुनो, जिसके प्रभाव से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकोगे।

श्लोक4

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥ ४ ॥

Āditya-hṛdayaṁ puṇyaṁ sarva-śatru-vināśanam | Jayāvahaṁ japen-nityam-akṣayaṁ paramaṁ śivam || 4 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इस परम पवित्र स्तोत्र का नाम 'आदित्यहृदय' है। यह समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला, शाश्वत विजय प्रदान करने वाला, अक्षय सुख देने वाला तथा परम कल्याणकारी है। इसका नित्य पाठ करना चाहिए।

श्लोक5

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५ ॥

Sarva-maṅgala-māṅgalyaṁ sarva-pāpa-praṇāśanam | Cintā-śoka-praśamanam-āyur-vardhanam-uttamam || 5 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

यह स्तोत्र संपूर्ण मंगलों का भी मंगल है, समस्त पापों का विनाश करने वाला है, चिंता और शोक को शांत करने वाला तथा मनुष्यों की आयु को बढ़ाने वाला सर्वोत्तम साधन है।

श्लोक6

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६ ॥

Raśmimantaṁ samudyantaṁ devāsura-namaskṛtam | Pūjayasva vivasvantaṁ bhāskaraṁ bhuvaneśvaram || 6 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जो किरणों से दैदीप्यमान, उदित हो रहे हैं, देवता और असुर दोनों जिनके चरणों में प्रणाम करते हैं, उन संपूर्ण भुवनों के स्वामी, प्रकाश के आगार विवस्वान भगवान भास्कर की तुम पूजा करो।

श्लोक7

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः । महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ७ ॥

Eṣa brahmā ca viṣṇuś-ca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ | Mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hy-apāṁ patiḥ || 7 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ये सूर्यदेव ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कार्तिकेय (स्कंद), प्रजापति, देवराज इंद्र, कुबेर, काल (समय), यमराज, चंद्रमा और जल के स्वामी वरुण देव हैं।

श्लोक8

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः । वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ८ ॥

Pitaro vasavaḥ sādhyā hy-aśvinau maruto manuḥ | Vāyur-vahniḥ prajā-prāṇa ṛtu-kartā prabhākaraḥ || 8 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ये ही पितर, आठों वसु, साध्यगण, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, समस्त प्रजाओं के प्राण, ऋतुओं के निर्माता और प्रकाश के पुंज प्रभाकर हैं।

श्लोक9

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ ९ ॥

Ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān | Suvarṇa-sadṛśo bhānur-hiraṇya-retā divākaraḥ || 9 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ये अदिति के पुत्र आदित्य, सबको उत्पन्न करने वाले सविता, आकाश में विचरने वाले सूर्य व खग, जगत का पोषण करने वाले पूषा, किरणों से युक्त गभस्तिमान, सुवर्ण के समान कांतिमान भानु, सुवर्ण-बीज वाले हिरण्यरेता और दिन के निर्माता दिवाकर हैं।

श्लोक10

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥ १० ॥

Haridaśvaḥ sahasrārciḥ sapta-saptir-marīcimān | Timironmathanaḥ śambhus-tvaṣṭā mārtāṇḍa aṁśumān || 10 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हरे/पीले घोड़ों वाले, सहस्रों किरणों वाले, सात घोड़ों वाले, प्रकाश किरणों से मंडित, अंधकार का नाश करने वाले, कल्याणकारी शंभु, देवताओं के शिल्पी त्वष्टा, ब्रह्मांड-अंड से प्रकट मार्तंड और किरणों से सुशोभित अंशुमान हैं।

श्लोक11

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः । अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ ११ ॥

Hiraṇyagarbhaḥ śiśiras-tapano bhāskaro raviḥ | Agni-garbho'diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśira-nāśanaḥ || 11 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ये हिरण्यगर्भ, शीतलता व तपन देने वाले, प्रकाशक भास्कर, स्तुति योग्य रवि, अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले, माता अदिति के पुत्र शंख और शीत व अज्ञान का नाश करने वाले हैं।

श्लोक12

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥ १२ ॥

Vyomanāthas-tamobhedī ṛg-yajuḥ-sāma-pāragaḥ | Ghana-vṛṣṭir-apāṁ mitro vindhya-vīthī-plavaṅgamaḥ || 12 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

आकाश के स्वामी, अंधकार के भेदक, ऋग्-यजुः-साम तीनों वेदों के पारंगत, मूसलाधार वर्षा कराने वाले, जल के मित्र और विंध्य पर्वत के आकाश-मार्ग में शीघ्रता से विचरने वाले हैं।

श्लोक13

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः । कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १३ ॥

Ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarva-tāpanaḥ | Kavir-viśvo mahā-tejā raktaḥ sarva-bhavodbhavaḥ || 13 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ये प्रचंड धूप वाले आतपी, गोल बिंब वाले मंडली, संहारकारी मृत्यु, पीत-लोहित पिंगल, सबको तपाने वाले, सर्वज्ञ कवि, विश्वरूप, परम तेजस्वी, लाल वर्ण वाले और संपूर्ण जगत की उत्पत्ति के कारण हैं।

श्लोक14

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥

Nakṣatra-graha-tārāṇām-adhipo viśva-bhāvanaḥ | Tejasām-api tejasvī dvādaśātman namo'stu te || 14 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

समस्त नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के अधिपति, संपूर्ण विश्व का पालन-पोषण करने वाले, महातेजस्वी और बारह मासों के बारह रूपों में स्थित हे द्वादशात्मन् सूर्यदेव! आपको मेरा नमस्कार है।

श्लोक15

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १५ ॥

Namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ | Jyotir-gaṇānāṁ pataye dinādhipataye namaḥ || 15 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

पूर्वांचल (उदयाचल पर्वत) पर उदित होने वाले को नमस्कार! पश्चिमांचल (अस्ताचल पर्वत) पर जाने वाले को नमस्कार! समस्त ज्योतिर्मंडल के स्वामी और दिन के अधिपति को नमस्कार!

श्लोक16

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः । नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १६ ॥

Jayāya jaya-bhadrāya haryaśvāya namo namaḥ | Namo namaḥ sahasrāṁśo ādityāya namo namaḥ || 16 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

विजय स्वरूप और विजय के साथ मंगल देने वाले, हरित अश्वों से युक्त, सहस्र किरणों वाले भगवान सूर्य (आदित्य) को बारंबार नमस्कार है।

श्लोक17

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः । नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥ १७ ॥

Nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ | Namaḥ padma-prabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ || 17 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

शत्रुओं के लिए उग्र, महापराक्रमी वीर, शीघ्रगामी सारंग को नमस्कार! कमल को खिलाने वाले और ब्रह्मांड-अंड से उत्पन्न मार्तंड भगवान को बारंबार नमस्कार!

श्लोक18

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १८ ॥

Brahmeśānācyuteśāya sūryāyāditya-varcase | Bhāsvate sarva-bhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ || 18 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ब्रह्मा, शिव और अच्युत (विष्णु) के भी स्वामी, अद्वितीय आदित्य-तेजस्वी, देदीप्यमान, प्रलयकाल में सब कुछ भस्म करने वाले और रौद्र स्वरूप वाले सूर्यदेव को नमस्कार!

श्लोक19

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ १९ ॥

Tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane | Kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṁ pataye namaḥ || 19 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अंधकार का नाश करने वाले, शीत और बर्फ को पिघलाने वाले, शूरवीर शत्रुनाशक, असीम स्वरूप वाले, कृतघ्नता का नाश करने वाले और समस्त ज्योतियों के स्वामी सूर्यदेव को नमस्कार!

श्लोक20

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥ २० ॥

Tapta-cāmīkarābhāya vahnaye viśva-karmaṇe | Namas-tamo'bhinighnāya rucaye loka-sākṣiṇe || 20 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

तपे हुए शुद्ध स्वर्ण के समान कांति वाले, अग्निरूप, संपूर्ण विश्व की रचना करने वाले विश्वकर्मा, गहन अंधकार का नाश करने वाले, प्रकाशवान और समस्त जगत के कर्मों के साक्षी सूर्य को नमस्कार!

श्लोक21

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २१ ॥

Nāśayaty-eṣa vai bhūtaṁ tad-eva sṛjati prabhuḥ | Pāyaty-eṣa tapaty-eṣa varṣaty-eṣa gabhastibhiḥ || 21 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

यही सूर्यदेव समस्त चराचर को नष्ट करते हैं और यही पुनः नवीन सृष्टि करते हैं। यही अपनी किरणों द्वारा जल सोखते हैं, यही तपते हैं और यही बादलों के रूप में वर्षा करते हैं।

श्लोक22

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः । एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २२ ॥

Eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ | Eṣa evāgni-hotraṁ ca phalaṁ caivāgni-hotriṇām || 22 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जब सब प्राणी सो जाते हैं, तब भी ये अंतःकरण में जाग्रत रहते हैं। यही अग्निहोत्र यज्ञ हैं और यही अग्निहोत्र करने वाले साधकों को मिलने वाला परम फल हैं।

श्लोक23

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥ २३ ॥

Vedāś-ca kratavaś-caiva kratūnāṁ phalam-eva ca | Yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ || 23 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

समस्त वेद, यज्ञ, यज्ञों के फल और इस संसार में जितने भी शुभ कर्म-कर्तव्य हैं, उन सबके अधिष्ठाता और आत्मा स्वयं भगवान रवि (सूर्य) ही हैं।

श्लोक24

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २४ ॥

Enam-āpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca | Kīrtayan puruṣaḥ kaścin-nāvasīdati rāghava || 24 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अगस्त्य मुनि कहते हैं: हे राघव! विपत्ति में, संकटों में, घने बीहड़ वनों में अथवा किसी भी प्रकार के भय के समय जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, वह कभी दुःखी या पराजित नहीं होता!

श्लोक25

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् । एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजentryष्यसि ॥ २५ ॥

Pūjayasvainam-ekāgro deva-devaṁ jagat-patim | Etat triguṇitaṁ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi || 25 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इसलिए हे राम! एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव जगत्पति सूर्य की पूजा करो। इस पावन आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ करने से तुम इस भीषण युद्ध में निश्चित ही विजय प्राप्त करोगे।

श्लोक26

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि । एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥ २६ ॥

Asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṁ tvaṁ vadhiṣyasi | Evam-uktvā tato'gastyo jagāma ca yathāgatam || 26 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे महाबाहु! इसी संग्राम के अवसर पर तुम दुराचारी रावण का वध करोगे। ऐसा कहकर परम पूज्य अगस्त्य मुनि जैसे आए थे, वैसे ही अंतर्धान हो गए।

श्लोक27

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा । धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २७ ॥

Etac-chrutvā mahā-tejā naṣṭa-śoko'bhavat-tadā | Dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān || 27 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अगस्त्य ऋषि के इन दिव्य वचनों को सुनकर महातेजस्वी श्रीराम का सारा संशय और शोक उसी क्षण नष्ट हो गया। उन्होंने अत्यंत प्रसन्न और एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्र को अपने हृदय में धारण किया।

श्लोक28

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २८ ॥

Ādityaṁ prekṣya japtvā tu paraṁ harṣam-avāptavān | Trir-ācamya śucir-bhūtvā dhanur-ādāya vīryavān || 28 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सूर्यदेव का ध्यान कर और इस स्तोत्र का तीन बार जप कर श्रीराम ने परम हर्ष प्राप्त किया। फिर तीन बार आचमन कर पवित्र होकर उन पराक्रमी श्रीराम ने अपना दिव्य धनुष उठाया।

श्लोक29

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् । सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥ २९ ॥

Rāvaṇaṁ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat | Sarva-yatnena mahatā vadhe tasya dhṛto'bhavat || 29 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

रावण को सामने देखकर श्रीराम पूरे उत्साह और संकल्प के साथ युद्ध के लिए आगे बढ़े और अपने संपूर्ण पराक्रम से रावण के वध के लिए दृढ़-निश्चयी हो गए।

श्लोक30

अथ रुचिरविलोचनो मुदा युक्तः परमरहस्यमुपेत्य राघवस्तु । प्रमुदितमनाः स रावणं दृष्ट्वा समुपस्थितं पुनरुद्यतो बभूव ॥ ३० ॥

Atha rucira-vilocano mudā yuktaḥ Parama-rahasyam-upetya rāghavas-tu | Pramudita-manāḥ sa rāvaṇaṁ dṛṣṭvā Samupasthitaṁ punar-udyato babhūva || 30 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इस प्रकार इस परम गोपनीय स्तोत्र-रहस्य को पाकर सुंदर नेत्रों वाले राघव परमानंद से युक्त हो गए। अत्यंत प्रफुल्लित मन से वे सामने उपस्थित रावण का वध करने के लिए पुनः सन्नद्ध हो गए।

श्लोक31

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः । निशिचरपतिकसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥ ३१ ॥

Atha ravir-avadann-irīkṣya rāmaṁ Mudita-manāḥ paramaṁ prahṛṣyamāṇaḥ | Niśicara-patika-saṁkṣayaṁ viditvā Sura-gaṇa-madhya-gato vacas-tvareti || 31 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

तब देवगणों के बीच आकाश में स्थित भगवान सूर्य ने हर्षित मन से श्रीराम को देखा, और निशाचरपति रावण के संहार का समय निकट जानकर अत्यंत प्रसन्नता से श्रीराम से कहा: 'हे राम! शीघ्रता करो!'

फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)

महर्षि अगस्त्य से इस स्तोत्र को सुनकर भगवान श्री राम ने आचमन किया और अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर तीन बार इसका पाठ किया। उनका संपूर्ण श्रम व संशय दूर हो गया और उन्होंने रावण का संहार कर धर्म की विजय पताका फहराई।

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