शिवताण्डवस्तोत्रम् — रावण कृत १५ श्लोक, हिंदी अर्थ, लयबद्ध पाठ एवं लाभ
The Shiva Tandava Stotram (शिवताण्डवस्तोत्रम्) is an awe-inspiring, high-voltage devotional hymn composed by King Ravana of Lanka when his pride was shattered under Mount Kailash. Overwhelmed by the cosmic grandeur and fierce grace of Lord Shiva performing His Tandava dance, Ravana burst into extemporaneous poetry composed in the rapid, intoxicating Panchachamara meter. Chanting this stotra invigorates the nervous system, dissolves fear and ego, awakens inner willpower, and attracts Mahadev's infinite benevolence.
दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर
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॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् । पद्मासीनं समंतात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
Dhyāyen-nityaṁ maheśaṁ rajata-giri-nibhaṁ cāru-candrāvataṁsaṁ Ratnākalpojjvalāṅgaṁ paraśu-mṛga-varābhīti-hastaṁ prasannam | Padmāsīnaṁ samantāt stutam-amara-gaṇair-vyāghra-kṛttiṁ vasānaṁ Viśvādyaṁ viśva-bījaṁ nikhila-bhaya-haraṁ pañca-vaktraṁ trinetram ||
जो चांदी के पर्वत (कैलाश) के समान श्वेत कांति वाले हैं, जिनके मस्तक पर सुंदर अर्धचंद्र सुशोभित है, रत्नों के आभूषणों से जिनका अंग-अंग दीप्तिमान है, जिनके हाथों में परशु, मृग-मुद्रा, वरद और अभय मुद्राएं हैं, जो प्रसन्नमुख कमल पर विराजमान हैं, देवतागण जिनकी स्तुति कर रहे हैं, जो व्याघ्रचर्म धारण किए हुए हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के आदि-कारण, बीज-स्वरूप, समस्त भयों को हरने वाले, पंचमुख और त्रिनेत्रधारी हैं, उन देवाधिदेव महेश्वर का मैं नित्य ध्यान करता हूं।
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ १ ॥
Jaṭā-ṭavī-galaj-jala-pravāha-pāvita-sthale Gale'valambya lambitāṁ bhujaṅga-tuṅga-mālikām | Ḍamaḍ-ḍamaḍ-ḍamaḍ-ḍaman-nināda-vaḍ-ḍamarvayaṁ Cakāra caṇḍa-tāṇḍavaṁ tanotu naḥ śivaḥ śivam || 1 ||
जिनकी सघन जटा रूपी वन से बहती हुई गंगा जी की पावन जलधारा से जिनका कंठस्थल पवित्र है, जिनके गले में विशाल काले सर्प की लंबी माला लटक रही है, और जो 'डम-डम-डम-डम' करते हुए डमरू की तीव्र ध्वनि के साथ प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे कल्याणकारी देवाधिदेव शिव हम सबका कल्याण विस्तार करें।
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धधद्धधद्धधज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २ ॥
Jaṭā-kaṭāha-sambhrama-bhraman-nilimpa-nirjharī- Vilola-vīci-vallarī-virājamāna-mūrdhani | Dhadhad-dhadhad-dhadhaj-jvalal-lalāṭa-paṭṭa-pāvake Kiśora-candra-śekhare ratiḥ pratikṣaṇaṁ mama || 2 ||
जिनकी कड़ाहे के समान उलझी हुई जटाओं में वेग से चक्कर काटती हुई देवनदी गंगा की चंचल लहरों की लताएं जिनके मस्तक पर सुशोभित हैं, जिनके ललाट के चौड़े पटल पर 'धधक-धधक' करती हुई प्रचंड अग्नि जल रही है, और जिनके शीश पर बालचंद्रमा (द्वितीया का चंद्रमा) विराजमान है, उन भगवान शिव में मेरा अनुराग प्रतिक्षण निरंतर बढ़ता रहे।
धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥
Dharā-dharendra-nandinī-vilāsa-bandhu-bandhura- Sphurad-dig-anta-santati-pramodamāna-mānase | Kṛpā-kaṭākṣa-dhoraṇī-niruddha-durdharāpadi Kvacid-digambare mano vinodam-etu vastuni || 3 ||
पर्वतराज हिमालय की कन्या भगवती पार्वती के विलासपूर्ण कटाक्षों से जिनका मन आनंदित रहता है, जिनकी कृपा रूपी करुणा-दृष्टि की निरंतर धारा से भक्तों की असह्य विपत्तियां तुरंत दूर हो जाती हैं, ऐसे दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाले दिगंबर शिव में मेरा चित्त आनंद प्राप्त करे।
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
Jaṭā-bhujaṅga-piṅgala-sphurat-phaṇā-maṇi-prabhā- Kadamba-kuṅkuma-drava-pralipta-dig-vadhū-mukhe | Madāndha-sindhura-sphurat-tvag-uttarīya-medure Mano vinodam-adbhutaṁ bibhartu bhūta-bhartari || 4 ||
जिनकी जटाओं में लिपटे हुए सर्पों के फणों की मणियों की पीली-लाल आभा से समस्त दिशाओं रूपी सुंदरियों के मुख पर कुमकुम का लेप सा लग गया है, जो मदमस्त हाथी के फड़कते हुए चमड़े का उत्तरीय (दुपट्टा) धारण किए हुए हैं, उन समस्त जीवों के पालक और रक्षक भगवान भूतनाथ में मेरा मन अलौकिक आनंद प्राप्त करे।
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ ५ ॥
Sahasra-locana-prabhṛty-aśeṣa-lekha-śekhara- Prasūna-dhūli-dhoraṇī-vidhūsarāṅghri-pīṭha-bhūḥ | Bhujaṅga-rāja-mālayā nibaddha-jāṭa-jūṭakaḥ Śriyai cirāya jāyatāṁ cakora-bandhu-śekharaḥ || 5 ||
इंद्र आदि समस्त देवताओं के मुकुटों पर चढ़े हुए पुष्पों के पराग-कणों से जिनके चरणकमलों की चौकी निरंतर धूसरित (सुशोभित) रहती है, जिन्होंने सर्पराज वासुकि की माला से अपने जटाजूट को बांधा हुआ है, और चकोर पक्षी के बंधु चंद्रमा को जिन्होंने अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है, वे देवाधिदेव शिव हमें चिरकाल के लिए अखंड ऐश्वर्य और कल्याण प्रदान करें।
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥ ६ ॥
Lalāṭa-catvara-jvalad-dhanañjaya-sphuliṅga-bhā- Nipīta-pañca-sāyakaṁ naman-nilimpa-nāyakam | Sudhā-mayūkha-lekhayā virājamāna-śekharaṁ Mahā-kapāli-sampade śiro-jaṭālam-astu naḥ || 6 ||
जिन्होंने अपने ललाट की अग्नि वेदी से निकलती हुई ज्वाला की स्फुलिंगों (चिंगारियों) से कामदेव (पंचबाण) को भस्म कर दिया था, जिन्हें देवराज इंद्र भी शीश झुकाकर प्रणाम करते हैं, जिनके मस्तक पर अमृतमयी किरणों वाली चंद्रमा की कला चमक रही है, वे महाकपाली जटाधारी शिव हमारे लिए परम संपत्ति और सिद्धि के दाता बनें।
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७ ॥
Karāla-bhāla-paṭṭikā-dhagad-dhagad-dhagaj-jvala- -ddhanañjayāhutī-kṛta-pracaṇḍa-pañca-sāyake | Dharādhirendra-nandinī-kucāgra-citra-patraka- -prakalpanaika-śilpini trilocane ratir-mama || 7 ||
जिनके भयानक ललाट-पटल पर 'धगद्-धगद्' जलती हुई प्रचंड अग्नि में कामदेव भस्म हो गया, तथा जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती के स्तनों पर चित्र-विचित्र पत्रक रचना करने वाले एकमात्र अद्वितीय शिल्पी हैं, उन त्रिनेत्र शिव में मेरी प्रगाढ़ प्रीति हो।
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः । निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥ ८ ॥
Navīna-megha-maṇḍalī-niruddha-durdhara-sphurat- -kuhū-niśīthinī-tamaḥ-prabandha-baddha-kandharaḥ | Nilimpa-nirjharī-dharas-tanotu kṛtti-sindhuraḥ Kalā-nidhāna-bandhuraḥ śriyaṁ jagad-dhurandharaḥ || 8 ||
नवीन मेघमालाओं से घिरी अमावस्या की आधी रात के गहन अंधकार के समान जिनका कंठ श्यामल है, जो गंगाजी को धारण करने वाले, गजचर्मधारी, चंद्रकला से सुशोभित और संपूर्ण जगत का भार उठाने वाले हैं, वे भगवान शिव हमें अक्षय ऐश्वर्य प्रदान करें।
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥
Praphulla-nīla-paṅkaja-prapañca-kālima-prabhā- -valambi-kaṇṭha-kandalī-ruci-prabaddha-kandharam | Smara-chidaṁ pura-chidaṁ bhava-chidaṁ makha-chidaṁ Gaja-chiddhān-dhaka-chidaṁ tam-antaka-chidaṁ bhaje || 9 ||
पूर्ण खिले हुए नीलकमल के समूह जैसी श्यामल कांति से सुशोभित कंठ वाले, कामदेव, त्रिपुरासुर, भवबंधन, दक्षयज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और यमराज का भी नाश करने वाले उन कल्याणकारी भगवान शिव का मैं भजन करता हूं।
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १० ॥
Akharva-sarva-maṅgalā-kalā-kadamba-mañjarī- -rasa-pravāha-mādhurī-vijṛmbhaṇā-madhuvratam | Smarāntakaṁ purāntakaṁ bhavāntakaṁ makhāntakaṁ Gajāntakāndhakāntakaṁ tam-antakāntakaṁ bhaje || 10 ||
माता पार्वती की समस्त कल्याणमयी कलाओं रूपी कदंब-मंजरी के रस-प्रवाह का आस्वादन करने वाले भौंरे के समान, कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार-भय, दक्षयज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और मृत्यु के काल महाकाल शिव की मैं उपासना करता हूं।
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥
Jayatvad-abhra-vibhrama-bhramad-bhujaṅgama-śvasa- -dvinirgamat-krama-sphurat-karāla-bhāla-havyavāṭ | Dhimiddhimid-dhimi-dhvanan-mṛdaṅga-tuṅga-maṅgala- -dhvani-krama-pravartita-pracaṇḍa-tāṇḍavaḥ śivaḥ || 11 ||
आकाश में तीव्रता से घूमते हुए भयंकर सर्पों की फुंकारों से ललाट की अग्नि और अधिक धधक रही है, तथा 'धिमिद्-धिमिद्-धिमि' बजते हुए मृदंग की उच्च मंगलकारी ध्वनि पर प्रचंड तांडव करने वाले भगवान शिव सदा विजयी हों!
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२ ॥
Dṛṣad-vicitra-talpayor-bhujaṅga-mouktika-srajor- -gariṣṭha-ratna-loṣṭhayoḥ suhṛd-vipakṣa-pakṣayoḥ | Tṛṇāravinda-cakṣuṣoḥ prajā-mahī-mahendrayoḥ Sama-pravṛttikaḥ kadā sadāśivaṁ bhajāmy-aham || 12 ||
कठोर पत्थर और कोमल शय्या में, सर्प और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तृण और कमल में, साधारण प्रजा और चक्रवर्ती राजा में समान दृष्टि रखकर मैं कब सदाशिव का अनन्य भजन करूंगा?
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् । विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
Kadā nilimpa-nirjharī-nikuñja-koṭare vasan Vimukta-durmatiḥ sadā śiraḥ-stham-añjaliṁ vahan | Vimukta-lola-locano lalāma-bhāla-lagnakaḥ Śiveti mantram-uccaran kadā sukhī bhavāmy-aham || 13 ||
गंगाजी के पावन तट पर गुफाओं में निवास करते हुए, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सिर पर हाथ जोड़कर, चंचल दृष्टियों का त्याग कर, ललाट पर शिव का ध्यान धरते हुए 'शिव' मंत्र का उच्चारण कर मैं कब परमानंद को प्राप्त होऊंगा?
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ १४ ॥
Imaṁ hi nityam-evam-uktam-uttamottamaṁ stavaṁ Paṭhan-smaran-bruvan-naro viśuddhim-eti santatam | Hare gurau subhaktim-āśu yāti nānyathā gatiṁ Vimohanaṁ hi dehināṁ suśaṅkarasya cintanam || 14 ||
इस प्रकार कहे गए इस उत्तमोत्तम स्तोत्र को जो मनुष्य नित्य पढ़ता, स्मरण करता अथवा सुनता है, वह सदा परम पवित्र हो जाता है। भगवान शिव और गुरु में उसकी शीघ्र ही सुदृढ़ भक्ति हो जाती है, क्योंकि शंकर का चिंतन समस्त मोह-माया का नाश करने वाला है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥ १५ ॥
Pūjāvasāna-samaye daśa-vaktra-gītaṁ Yaḥ śambhu-pūjana-paraṁ paṭhati pradoṣe | Tasya sthirāṁ ratha-gajendra-turaṅga-yuktāṁ Lakṣmīṁ sadaiva sumukhīṁ pradadāti śambhuḥ || 15 ||
प्रदोष काल में शिव पूजन के उपरांत जो मनुष्य रावण द्वारा गाए गए इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शिव उसे रथ, गज, अश्व आदि वाहनों से युक्त स्थिर एवं सदा प्रसन्न रहने वाली लक्ष्मी प्रदान करते हैं।
फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)
जो मनुष्य पूजा के अंत में रावण रचित इस पावन शिव तांडव स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उस पर भगवान शंकर सदैव प्रसन्न रहते हैं। उसे जीवन पर्यंत अखंड लक्ष्मी, तेज और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।
नित्य पाठ करें और आत्मिक शांति प्राप्त करें
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अन्य कल्याणकारी स्तोत्र
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