Bhakti Voice
भगवान श्रीराम38 श्लोक

श्री रामरक्षास्तोत्रम् — मूल श्लोक, हिंदी अर्थ, पठन विधि एवं सम्पूर्ण कवच

The Sri Ram Raksha Stotra (श्री रामरक्षास्तोत्रम्) is an ancient, supreme protective shield composed by Sage Budha Kaushika under the direct divine inspiration of Lord Shiva in a dream. Revered across millions of homes, this sacred stotra acts as an impenetrable spiritual armour (Kavach) protecting the chanter from physical dangers, astral obstacles, illnesses, anxiety, and negative planetary influences. Chanting it with pure devotion invites the eternal grace of Lord Rama, Lakshmana, and Mother Sita.

दृश्य:
base
रचयिता / ऋषिऋषि बुधकौशिक
मूल शास्त्र / स्रोतपद्म पुराण / भगवान शिव द्वारा स्वप्न में प्रेरित
शुभ दिन व समयमंगलवार, रविवार एवं रामनवमी (अथवा नित्य प्रातःकाल)
कुल श्लोक संख्या38 श्लोक

दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर

सुझाव: नित्य 1 to 11 recitations daily (41-day Sankalp for siddhi) पाठ करें। प्रत्येक पाठ के बाद 'गिनें' पर टैप करें।

पाठ संख्या0
ॐ

॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥

पाठ से पूर्व ध्यान

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्थिनेत्रं प्रसन्नम् । वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥

Dhyāyed-ājānu-bāhuṁ dhṛta-śara-dhanuṣaṁ baddha-padmāsanasthaṁ Pītaṁ vāso vasānaṁ nava-kamala-dala-spardhi-netraṁ prasannam | Vāmāṅkārūḍha-sītā-mukha-kamala-milal-locanaṁ nīradābhaṁ Nānālaṅkāra-dīptaṁ dadhatam-uru-jaṭā-maṇḍalaṁ rāmacandram ||

भावार्थ:

जिनकी भुजाएं घुटनों तक लंबी हैं, जो धनुष-बाण धारण किए पद्मासन में विराजमान हैं, पीतांबर पहने हैं, जिनके नेत्र खिले हुए नवीन कमलदल की भांति मनोहर हैं, जिनकी बाईं गोद में विराजमान माता सीता के मुखकमल से उनके नेत्र मिले हुए हैं, जिनका मेघ के समान श्याम वर्ण है तथा जो नाना प्रकार के आभूषणों से सुशोभित हैं, ऐसे जटाधारी भगवान श्री रामचंद्र जी का मैं ध्यान करता हूं।

श्लोक1

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ १ ॥

Caritaṁ raghunāthasya śata-koṭi-pravistaram | Ekaikam-akṣaraṁ puṁsāṁ mahā-pātaka-nāśanam || 1 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

भगवान श्री रघुनाथ जी का पावन चरित्र सौ करोड़ श्लोकों में फैला हुआ है। इसका एक-एक अक्षर भी मनुष्यों के समस्त घोर पापों का समूल नाश करने वाला है।

श्लोक2

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ २ ॥

Dhyātvā nīlotpala-śyāmaṁ rāmaṁ rājīva-locanam | Jānakī-lakṣmaṇopetaṁ jaṭā-mukuṭa-maṇḍitam || 2 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

नीले कमल के समान श्यामवर्ण, कमल नयन, जटाओं के मुकुट से सुशोभित, माता जानकी और भाई लक्ष्मण सहित विराजमान भगवान श्री राम का ध्यान करके...

श्लोक3

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३ ॥

Sāsi-tūṇa-dhanur-bāṇa-pāṇiṁ naktaṁcarāntakam | Sva-līlayā jagat-trātum-āvirbhūtam-ajaṁ vibhum || 3 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हाथ में खड्ग, तरकश, धनुष और बाण धारण किए हुए, निशाचरों (राक्षसों) का संहार करने वाले तथा अपनी दिव्य लीला से संसार की रक्षा करने के लिए अवतरित अजन्मा और सर्वव्यापी प्रभु राम का स्मरण कर...

श्लोक4

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ ४ ॥

Rāmarakṣāṁ paṭhet-prājñaḥ pāpaghnīṁ sarva-kāmadām | Śiro me rāghavaḥ pātu bhālaṁ daśarathātmajaḥ || 4 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

बुद्धिमान मनुष्य को समस्त पापों का नाश करने वाले तथा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। रघुकुल शिरोमणि श्री राम मेरे सिर की रक्षा करें और दशरथनंदन मेरे ललाट (माथे) की रक्षा करें।

श्लोक5

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ५ ॥

Kausalyeyo dṛśau pātu viśvāmitra-priyaḥ śrutī | Ghrāṇaṁ pātu makha-trātā mukhaṁ saumitri-vatsalaḥ || 5 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

माता कौशल्या के नंदन मेरे नेत्रों की रक्षा करें, विश्वामित्र जी के प्रिय मेरे कानों की रक्षा करें, यज्ञों के रक्षक मेरे नासिका की रक्षा करें और लक्ष्मण जी पर वात्सल्य रखने वाले प्रभु मेरे मुख की रक्षा करें।

श्लोक6

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः । स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥ ६ ॥

Jihvāṁ vidyā-nidhiḥ pātu kaṇṭhaṁ bharata-vanditaḥ | Skandhau divyāyudhaḥ pātu bhujau bhagneśa-kārmukaḥ || 6 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

विद्या के सागर श्री राम मेरी जिह्वा (जीभ) की रक्षा करें, भरत जी द्वारा पूजित प्रभु मेरे कंठ की रक्षा करें, दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले मेरे कंधों की रक्षा करें और भगवान शिव के धनुष को तोड़ने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

श्लोक7

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ ७ ॥

Karau sītā-patiḥ pātu hṛdayaṁ jāmadagnya-jit | Madhyaṁ pātu khara-dhvaṁsī nābhiṁ jāmbavad-āśrayaḥ || 7 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सीतापति मेरे हाथों की रक्षा करें, परशुराम जी के गर्व को शांत करने वाले मेरे हृदय की रक्षा करें, खर नामक असुर का संहार करने वाले मेरे उदर (पेट) की रक्षा करें और जाम्बवान जी के आश्रयदाता मेरी नाभि की रक्षा करें।

श्लोक8

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः । ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥ ८ ॥

Sugrīveśaḥ kaṭī pātu sakthinī hanumat-prabhuḥ | Ūrū raghūttamaḥ pātu rakṣaḥ-kula-vināśa-kṛt || 8 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की रक्षा करें, हनुमान जी के प्रभु मेरे नितंबों की रक्षा करें, और राक्षस कुल का संहार करने वाले रघुकुल श्रेष्ठ श्री राम मेरी जांघों की रक्षा करें।

श्लोक9

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः । पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ९ ॥

Jānunī setu-kṛt-pātu jaṅghe daśa-mukhāntakaḥ | Pādau vibhīṣaṇa-śrīdaḥ pātu rāmo'khilaṁ vapuḥ || 9 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

समुद्र पर सेतु बांधने वाले मेरे घुटनों की रक्षा करें, दस मुख वाले रावण का अंत करने वाले मेरी पिंडलियों की रक्षा करें, विभीषण को राज्य और ऐश्वर्य देने वाले मेरे दोनों चरणों की रक्षा करें और इस प्रकार सम्पूर्ण शरीर की रक्षा भगवान श्री राम करें।

श्लोक10

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् । स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ १० ॥

Etāṁ rāma-balopetāṁ rakṣāṁ yaḥ sukṛtī paṭhet | Sa cirāyuḥ sukhī putrī vijayī vinayī bhavet || 10 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जो पुण्यवान मनुष्य श्री राम के असीम बल से युक्त इस रक्षा कवच का नित्य पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, उत्तम संतानों से युक्त, सर्वत्र विजयी और विनयशील होता है।

श्लोक11

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः । न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ ११ ॥

Pātāla-bhūtala-vyoma-cāriṇaś-chadma-cāriṇaḥ | Na draṣṭum-api śaktās-te rakṣitaṁ rāma-nāmabhiḥ || 11 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरने वाले अथवा छद्म रूप धारण करने वाले दुष्ट भूत, प्रेत और पिशाच आदि उस व्यक्ति को देख भी नहीं सकते, जिसकी रक्षा श्री राम के पवित्र नामों द्वारा हो रही हो।

श्लोक12

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् । नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२ ॥

Rāmeti rāmabhadreti rāmacandreti vā smaran | Naro na lipyate pāpair-bhuktiṁ muktiṁ ca vindati || 12 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य 'राम', 'रामभद्र' अथवा 'रामचन्द्र' इन पावन नामों का प्रेमपूर्वक स्मरण करता है, वह पापों से कभी लिप्त नहीं होता तथा संसार के समस्त सुखों (भोग) को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।

श्लोक13

इमं कल्पितमेतस्य रक्षां यः सुकृती पठेत् । स लभेत्परमां सिद्धिं रामचन्द्रप्रसादतः ॥ १३ ॥

Imaṁ kalpitam-etasya rakṣāṁ yaḥ sukṛtī paṭhet | Sa labhet-paramāṁ siddhiṁ rāmacandra-prasādataḥ || 13 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

बुधकौशिक ऋषि द्वारा रचित इस दिव्य रामरक्षा कवच का जो पुण्यात्मा मनुष्य नित्य पाठ करता है, वह भगवान रामचंद्र जी के अनुग्रह से परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक14

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ १४ ॥

Āpadām-apahartāraṁ dātāraṁ sarva-sampadām | Lokābhirāmaṁ śrī-rāmaṁ bhūyo bhūyo namāmy-aham || 14 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

समस्त विपत्तियों को हरने वाले, सब प्रकार की संपदाएं प्रदान करने वाले तथा समस्त लोकों को आनंद देने वाले श्री रामचंद्र जी को मैं बारंबार नमस्कार करता हूं।

श्लोक15

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥ १५ ॥

Bharjanaṁ bhava-bījānām-arjanaṁ sukha-sampadām | Tarjanaṁ yama-dūtānāṁ rāma-rāmeti garjanam || 15 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

'राम-राम' नाम की गर्जना संसार-बंधन रूपी बीजों को भून डालने वाली (नष्ट करने वाली), समस्त सुख-संपत्तियों को अर्जित कराने वाली और यमदूतों को भयभीत कर भगाने वाली है।

श्लोक16

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः । रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ १६ ॥

Rāmo rāja-maṇiḥ sadā vijayate rāmaṁ rameśaṁ bhaje Rāmeṇābhihatā niśācara-camū rāmāya tasmai namaḥ | Rāmān-nāsti parāyaṇaṁ parataraṁ rāmasya dāso'smy-ahaṁ Rāme citta-layaḥ sadā bhavatu me bho rāma mām-uddhara || 16 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

राजाओं में श्रेष्ठ श्री रामचंद्र जी सदैव विजयी हों! मैं लक्ष्मीपति श्रीराम का भजन करता हूं। श्रीराम द्वारा राक्षसों की सेना नष्ट कर दी गई, उन श्रीराम को नमस्कार है। श्रीराम से बढ़कर कोई दूसरा आश्रय नहीं है, मैं श्रीराम का दास हूं। मेरा चित्त सदा श्रीराम में लीन रहे। हे राम! मेरा उद्धार कीजिए।

श्लोक17

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ १७ ॥

Rāma rāmeti rāmeti rame rāme manorame | Sahasra-nāma tat-tulyaṁ rāma-nāma varānane || 17 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं: हे सुमुखि! मैं 'राम-राम-राम' इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही निरंतर रमण करता हूं। श्रीराम का एक नाम विष्णु के सहस्र (एक हजार) नामों के समान फल देने वाला है।

श्लोक18

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे मध्येपुष्पकमासने मणिमये वीरासने सुस्थितम् । अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं व्याख्यातं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजे श्यामलम् ॥ १८ ॥

Vaidehī-sahitaṁ sura-druma-tale haime mahā-maṇḍape Madhye-puṣpakam-āsane maṇi-maye vīrāsane susthitam | Agre vācayati prabhañjana-sute tattvaṁ munibhyaḥ paraṁ Vyākhyātaṁ bharatādibhiḥ parivṛtaṁ rāmaṁ bhaje śyāmalam || 18 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

कल्पवृक्ष के नीचे स्वर्ण मंडप में, मणियों से जड़े पुष्पक विमान में वीरासन में विराजमान, माता सीता सहित, जिनके सम्मुख हनुमान जी मुनियों को तत्वज्ञान सुना रहे हैं, और भरत आदि भाइयों से घिरे श्यामवर्ण श्रीराम का मैं भजन करता हूं।

श्लोक19

अग्रे वामकरेण कार्मुकवरं बद्ध्वा शरं दक्षिणे तूणीरेण समन्वितेन दधतं वीरासने संस्थितम् । रत्नोज्ज्वलकुण्डलं रुचिरसत्पीताम्बरं सस्मितं वन्दे राममनन्यभक्तसुखदं वीरासनस्थं प्रभुम् ॥ १९ ॥

Agre vāma-kareṇa kārmuka-varaṁ baddhvā śaraṁ dakṣiṇe Tūṇīreṇa samanvitena dadhataṁ vīrāsane saṁsthitam | Ratnojjvala-kuṇḍalaṁ rucira-sat-pītāmbaraṁ sasmitam Vande rāmam-ananya-bhakta-sukhadaṁ vīrāsana-sthaṁ prabhum || 19 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

बाएं हाथ में दिव्य धनुष और दाएं हाथ में बाण धारण किए, पीठ पर तरकश बांधे, वीरासन में स्थित, रत्नों के कुंडल पहने, सुंदर पीतांबरधारी, मंद मुस्कान युक्त और अनन्य भक्तों को सुख देने वाले वीर प्रभु श्रीराम को मैं नमन करता हूं।

श्लोक20

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा । गच्छन् ममाग्रतो नित्यं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ २० ॥

Sannaddhaḥ kavacī khaḍgī cāpa-bāṇa-dharo yuvā | Gacchan mamāgrato nityaṁ rāmaḥ pātu sa-lakṣmaṇaḥ || 20 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

कवच पहने, तलवार लिए, धनुष-बाण धारण किए, सदा तत्पर और युवा रूप में लक्ष्मण सहित श्रीराम सदैव मेरे आगे-आगे चलकर मेरी रक्षा करें।

श्लोक21

अच्युतः कल्पवृक्षश्च सद्धर्मप्रतिपालकः । सर्वलोकैकशरण्यो रामो जयतु राघवः ॥ २१ ॥

Acyutaḥ kalpa-vṛkṣaś-ca sad-dharma-pratipālakaḥ | Sarva-lokaika-śaraṇyo rāmo jayatu rāghavaḥ || 21 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अविनाशी, भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान फलदाता, सनातन धर्म के रक्षक और संपूर्ण लोकों के एकमात्र आश्रयदाता रघुकुलभूषण श्रीराम सदा विजयी हों।

श्लोक22

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥ २२ ॥

Rāmo dāśarathiḥ śūro lakṣmaṇānucaro balī | Kākutsthaḥ puruṣaḥ pūrṇaḥ kausalyeyo raghūttamaḥ || 22 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

राम, दशरथपुत्र, शूरवीर, जिनके पीछे लक्ष्मण चलते हैं, बलवान, ककुत्स्थवंशी, पूर्णपुरुष, कौशल्यानंदन और रघुकुल में श्रेष्ठ...

श्लोक23

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः । जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ २३ ॥

Vedānta-vedyo yajñeśaḥ purāṇa-puruṣottamaḥ | Jānakī-vallabhaḥ śrīmān-aprameya-parākramaḥ || 23 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

वेदांत द्वारा जानने योग्य, यज्ञों के स्वामी, पुराणपुरुषोत्तम, जानकीनाथ, श्रीसंपन्न और अप्रमेय (असीमित) पराक्रम वाले भगवान राम...

श्लोक24

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः । अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥ २४ ॥

Ity-etāni japan-nityaṁ mad-bhaktaḥ śraddhayānvitaḥ | Aśvamedhādhikaṁ puṇyaṁ samprāpnoti na saṁśayaḥ || 24 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इन नामों का जो मेरा भक्त प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक जप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक महान पुण्य को प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक25

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् । स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥ २५ ॥

Rāmaṁ dūrvā-dala-śyāmaṁ padmākṣaṁ pīta-vāsasam | Stuvanti nāmabhir-divyair-na te saṁsāriṇo naraḥ || 25 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

दूर्वादल के समान श्यामल वर्ण, कमलनयन और पीतांबरधारी श्रीराम की जो मनुष्य इन दिव्य नामों द्वारा स्तुति करते हैं, वे फिर इस नश्वर संसार के आवागमन (जन्म-मरण) के बंधन में नहीं पड़ते।

श्लोक26

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् । राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥ २६ ॥

Rāmaṁ lakṣmaṇa-pūrvajaṁ raghu-varaṁ sītā-patiṁ sundaraṁ Kākutsthaṁ karuṇārṇavaṁ guṇa-nidhiṁ vipra-priyaṁ dhārmikam | Rājendraṁ satya-sandhaṁ daśaratha-tanayaṁ śyāmalaṁ śānta-mūrtiṁ Vande lokābhirāmaṁ raghu-kula-tilakaṁ rāghavaṁ rāvaṇārim || 26 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

लक्ष्मण के अग्रज, रघुकुलश्रेष्ठ, सीतापति, परम सुंदर, ककुत्स्थवंशी, दया के सागर, सद्गुणों के भंडार, ब्राह्मणप्रिय, धर्मनिष्ठ, राजाओं के अधिपति, सत्यप्रतिज्ञ, दशरथनंदन, श्यामवर्ण, शांतस्वरूप, लोकों को आनंद देने वाले, रघुकुलभूषण, रावण के शत्रु राघव को मैं प्रणाम करता हूं।

श्लोक27

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ २७ ॥

Rāmāya rāmabhadrāya rāmacandrāya vedhase | Raghunāthāya nāthāya sītāyāḥ pataye namaḥ || 27 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

कल्याणदाता राम, मंगलकारी रामभद्र, सर्वज्ञ रामचंद्र, रघुकुलनाथ, संपूर्ण चराचर के स्वामी और माता सीता के पति भगवान राम को मेरा कोटि-कोटि नमन है।

श्लोक28

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ २८ ॥

Śrī-rāma rāma raghu-nandana rāma rāma Śrī-rāma rāma bharatāgraja rāma rāma | Śrī-rāma rāma raṇa-karkaśa rāma rāma Śrī-rāma rāma śaraṇaṁ bhava rāma rāma || 28 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे श्रीराम! हे रघुनंदन राम! हे भरत के अग्रज राम! हे युद्ध में अजेय-पराक्रमी श्रीराम! हे राम! आप ही मुझे अपनी दिव्य शरण में लीजिए।

श्लोक29

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ २९ ॥

Śrī-rāmacandra-caraṇau manasā smarāmi Śrī-rāmacandra-caraṇau vacasā gṛṇāmi | Śrī-rāmacandra-caraṇau śirasā namāmi Śrī-rāmacandra-caraṇau śaraṇaṁ prapadye || 29 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

मैं श्रीरामचंद्र जी के युगल चरणकमलों का मन से स्मरण करता हूं, वाणी से उनकी महिमा का गुणगान करता हूं, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करता हूं और उन पावन चरणों की शरण ग्रहण करता हूं।

श्लोक30

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः । सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु- र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥ ३० ॥

Mātā rāmo mat-pitā rāmacandraḥ Svāmī rāmo mat-sakhā rāmacandraḥ | Sarvasvaṁ me rāmacandro dayālu- -rnānyaṁ jāne naiva jāne na jāne || 30 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

श्रीराम ही मेरी माता हैं, श्रीराम ही मेरे पिता हैं, श्रीराम ही मेरे स्वामी हैं और श्रीराम ही मेरे परम सखा हैं। दयालु श्रीरामचंद्र ही मेरा सर्वस्व हैं; उनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं जानता, बिल्कुल नहीं जानता!

श्लोक31

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥ ३१ ॥

Dakṣiṇe lakṣmaṇo yasya vāme ca janakātmajā | Purato mārutir-yasya taṁ vande raghu-nandanam || 31 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जिनके दक्षिण (दाहिनी) ओर लक्ष्मण, बाईं ओर जनकपुत्री सीता और सम्मुख हनुमान जी विराजमान हैं, उन रघुनंदन श्रीराम की मैं वंदना करता हूं।

श्लोक32

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥ ३२ ॥

Lokābhirāmaṁ raṇa-raṅga-dhīraṁ Rājīva-netraṁ raghu-vaṁśa-nātham | Kāruṇya-rūpaṁ karuṇākaraṁ taṁ Śrī-rāmacandraṁ śaraṇaṁ prapadye || 32 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

समस्त लोकों में सुंदर, रणभूमि में अत्यंत धीर, कमलनयन, रघुकुल के स्वामी, करुणा की साक्षात मूर्ति और कृपा की खान भगवान श्री रामचंद्र की मैं शरण लेता हूं।

श्लोक33

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥ ३३ ॥

Manojavaṁ māruta-tulya-vegaṁ Jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham | Vātātmajaṁ vānara-yūtha-mukhyaṁ Śrī-rāma-dūtaṁ śaraṇaṁ prapadye || 33 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

मन के समान वेगवान, वायु के समान पराक्रमी, समस्त इंद्रियों को वश में करने वाले, बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानर सेना के प्रमुख श्री रामदूत हनुमान जी की मैं शरण लेता हूं।

श्लोक34

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥ ३४ ॥

Kūjantaṁ rāma-rāmeti madhuraṁ madhurākṣaram | Āruhya kavitā-śākhāṁ vande vālmīki-kokilam || 34 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

कविता रूपी वृक्ष की डाल पर बैठकर 'राम-राम' रूपी मधुर और अमूल्य अक्षरों की मधुर कूकने वाले वाल्मीकि रूपी कोकिल को मैं वंदन करता हूं।

श्लोक35

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ३५ ॥

Āpadām-apahartāraṁ dātāraṁ sarva-sampadām | Lokābhirāmaṁ śrī-rāmaṁ bhūyo bhūyo namāmy-aham || 35 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सब प्रकार की विपत्तियों को दूर करने वाले, समस्त संपदाएं देने वाले और तीनों लोकों को आनंदित करने वाले भगवान श्रीराम को बारंबार मेरा प्रणाम।

श्लोक36

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥ ३६ ॥

Bharjanaṁ bhava-bījānām-arjanaṁ sukha-sampadām | Tarjanaṁ yama-dūtānāṁ rāma-rāmeti garjanam || 36 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

संसार के जन्म-मरण रूपी बीजों को भस्म करने वाली, समस्त सुख-संपदा प्रदान करने वाली तथा यमराज के दूतों को भयभीत करने वाली 'राम-राम' की दिव्य ध्वनि है।

श्लोक37

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः । रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ ३७ ॥

Rāmo rāja-maṇiḥ sadā vijayate rāmaṁ rameśaṁ bhaje Rāmeṇābhihatā niśācara-camū rāmāya tasmai namaḥ | Rāmān-nāsti parāyaṇaṁ parataraṁ rāmasya dāso'smy-ahaṁ Rāme citta-layaḥ sadā bhavatu me bho rāma mām-uddhara || 37 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजयी हों! मैं लक्ष्मीपति राम का भजन करता हूं। राक्षसों की सेना का नाश करने वाले श्रीराम को नमन। श्रीराम से बड़ा कोई नहीं, मैं उनका दास हूं। मेरा मन सदा श्रीराम में लीन रहे। हे राम, मेरा उद्धार करो!

श्लोक38

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ ॥ ॐ तत्सत् ॥

Iti śrī-budha-kauśika-viracitaṁ śrī-rāma-rakṣā-stotraṁ sampūrṇam || || Om Tat Sat ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इस प्रकार बुधकौशिक ऋषि द्वारा विरचित श्री रामरक्षास्तोत्र संपूर्ण हुआ। ॐ तत् सत्। भगवान श्रीराम सबके संकट हरें और सबका कल्याण करें।

फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)

भगवान शिव के वचनानुसार जो भक्त नित्य श्रद्धापूर्वक रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, उसे तीनों लोकों में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।

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