कनकधारा स्तोत्रम् — आदि शंकराचार्य कृत, सम्पूर्ण श्लोक, हिंदी अर्थ एवं लक्ष्मी कृपा विधि
The Kanakadhara Stotram (कनकधारा स्तोत्रम्) is a legendary hymn composed by the young Jagadguru Adi Shankaracharya when he was begging for alms as a Brahmachari. Moved to tears by an impoverished elderly woman who had nothing to eat yet offered him her last withered Amla (gooseberry) with pure devotion, Shankara spontaneously sang 21 exquisite verses praising Goddess Mahalakshmi. Overjoyed by his selfless compassion, the Divine Mother showered a torrent of pure golden gooseberries (Kanakadhara) into the poor woman's hut. Reciting this hymn eradicates generational financial debt and invites sustainable prosperity.
दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर
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॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥
वन्दे पद्मकरां प्रसन्नवदनां सौभाग्यदां भाग्यदां हस्ताभ्यामभयप्रदां मणिकणैर्नानाविधैर्भूषिताम् । भक्ताभीष्टफलप्रदां हरिसखीं नीलोत्पलज्येष्ठिकां श्रीमद्भाग्यवतीं प्रसन्नहृदयां देवीं परां देवताम् ॥
Vande padma-karāṁ prasanna-vadanāṁ saubhāgyadāṁ bhāgyadāṁ Hastābhyām-abhaya-pradāṁ maṇi-gaṇair-nānā-vidhair-bhūṣitām | Bhaktābhīṣṭa-phala-pradāṁ hari-sakhīṁ nīlotpala-jyeṣṭhikāṁ Śrīmad-bhāgyavatīṁ prasanna-hṛdayāṁ devīṁ parāṁ devatām ||
जिनके करकमलों में कमल पुष्प सुशोभित हैं, जिनका मुखमंडल अत्यंत प्रसन्न है, जो सौभाग्य और ऐश्वर्य देने वाली हैं, दोनों हाथों से अभय और वरदान प्रदान करती हैं, नाना प्रकार के मणियों से विभूषित हैं, भक्तों की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली भगवान श्री हरि विष्णु की नित्य प्रिया हैं, उन परम करुणामयी भगवती महालक्ष्मी की मैं वंदना करता हूं।
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् । अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १ ॥
Aṅgaṁ hareḥ pulaka-bhūṣaṇam-āśrayantī Bhṛṅgāṅganeva mukulābharaṇaṁ tamālam | Aṅgīkṛtākhila-vibhūtir-apāṅga-līlā Māṅgalyadāstu mama maṅgala-devatāyāḥ || 1 ||
जैसे भंवरी अधखिले फूलों से लदे हुए तमाल वृक्ष पर मंडराती है, वैसे ही जो भगवान श्री हरि के रोमांचित नीलवर्ण श्रीअंगों पर निरंतर विचरती रहती हैं, और जिनकी कृपादृष्टि समस्त ऐश्वर्यों की खान है, वे परम मंगलमयी भगवती महालक्ष्मी की कटाक्ष-लीला मेरे लिए मंगलकारी हो।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि । माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः ॥ २ ॥
Mugdhā muhur-vidadhatī vadane murāreḥ Prema-trapā-praṇihitāni gatāgatāni | Mālā dṛśor-madhukarīva mahotpale yā Sā me śriyaṁ diśatu sāgara-sambhavāyāḥ || 2 ||
जो प्रेम और लज्जा से भरकर भगवान श्री मुरारी (विष्णु) के मुखकमल पर बार-बार जाकर लौट आती हैं, जैसे कोई भंवरी विशाल नीलकमल के ऊपर चक्कर काटती हो, क्षीरसागर से प्रकट होने वाली भगवती लक्ष्मी की वह मनोहर दृष्टि मुझे धन और ऐश्वर्य प्रदान करे।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम् आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् । आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ३ ॥
Āmīlitākṣam-adhigamya mudā mukundam Ānanda-kandam-animeṣam-anaṅga-tantram | Ākekara-sthita-kanīnika-pakṣma-netraṁ Bhūtyai bhaven-mama bhujaṅga-śayāṅganāyāḥ || 3 ||
जो आनंदकंद भगवान मुकुंद को आनंदित देखकर स्वयं मुग्ध हो जाती हैं, शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले भगवान नारायण की उस दिव्य अर्धांगिनी भगवती लक्ष्मी के अर्धोन्मीलित नेत्रों का पावन कटाक्ष मेरे संपूर्ण ऐश्वर्य और कल्याण का कारक बने।
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति । कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ४ ॥
Bāhv-antare madhu-jitaḥ śrita-kaustubhe yā Hārāvalīva hari-nīla-mayī vibhāti | Kāma-pradā bhagavato'pi kaṭākṣa-mālā Kalyāṇam-āvahatu me kamalālayāyāḥ || 4 ||
कौस्तुभ मणि से सुशोभित भगवान मधुसूदन के वक्षःस्थल पर नीलमणि की माला की भांति जो शोभायमान होती हैं, तथा जो स्वयं सर्वसमर्थ भगवान के मन में भी प्रेम-कामना उत्पन्न करने वाली हैं, उन कमलनिकेतना महालक्ष्मी की कृपा-कटाक्ष माला मेरा परम कल्याण करे।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्- धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव । मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्- भद्राणि मे दिशतु भार्గवनन्दनायाः ॥ ५ ॥
Kālāmbu-dāli-lalitorasi kaiṭabhārer- -dhārā-dhare sphurati yā taḍid-aṅganeva | Mātuḥ samasta-jagatāṁ mahanīya-mūrtir- -bhadrāṇi me diśatu bhārgava-nandanāyāḥ || 5 ||
सघन श्याम मेघमाला के समान भगवान कैटभारी (विष्णु) के सुंदर वक्षःस्थल पर जो विद्युत-प्रभा (बिजली) की भांति चमकती हैं, संपूर्ण चराचर जगत की माता उन महनीय भृगुकन्या महालक्ष्मी की पावन मूर्ति मुझे सब प्रकार के कल्याण प्रदान करे।
प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ६ ॥
Prāptaṁ padaṁ prathamataḥ khalu yat-prabhāvāt Māṅgalya-bhāji madhu-māthini manmathena | Mayy-āpatet-tad-iha mantharam-īkṣaṇārdhaṁ Mandālasaṁ ca makarālaya-kanyakāyāḥ || 6 ||
जिसके प्रभाव से कामदेव ने परम मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में भी सर्वोपरि स्थान प्राप्त किया, समुद्रतनया महालक्ष्मी की वह मंद, अलस और प्रेम-पूरित आधी दृष्टि आज मुझ दीन भक्त पर भी पड़े।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम् आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि । ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम् इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ७ ॥
Viśvāmarendra-pada-vibhrama-dāna-dakṣam Ānanda-hetur-adhikaṁ mura-vidviṣo'pi | Īṣan-niṣīdatu mayi kṣaṇam-īkṣaṇārdham Indīvarodara-sahodaram-indirāyāḥ || 7 ||
जो देवराज इंद्र के पद और संपूर्ण वैभव को क्षणमात्र में देने में समर्थ है, तथा जो भगवान मुरारि के लिए भी असीम परमानंद का हेतु है, नीलकमल के भीतरी दल जैसी उस इंदिरा (लक्ष्मी) की कृपा-दृष्टि एक क्षण के लिए मुझ पर स्थिर हो जाए।
इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र- दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते । दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ८ ॥
Iṣṭā viśiṣṭa-matayo'pi yayā dayārdra- -dṛṣṭyā triviṣṭapa-padaṁ sulabhaṁ labhante | Dṛṣṭiḥ prahṛṣṭa-kamalodara-dīptir-iṣṭāṁ Puṣṭiṁ kṛṣīṣṭa mama puṣkara-viṣṭarāyāḥ || 8 ||
जिस दयार्द्र दृष्टि के लेशमात्र से बड़े-बड़े ज्ञानी-तपस्वी भी स्वर्ग के सर्वोच्च पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, प्रफुल्लित कमल के समान कांतिमान, कमल पर विराजने वाली महालक्ष्मी की वह दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि और समृद्धि प्रदान करे।
दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम् अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे । दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ९ ॥
Dadyād dayānu-pavano draviṇāmbu-dhārām Asminn-akiñcana-vihaṅga-śiśau viṣaṇṇe | Duṣkarma-gharmam-apanīya cirāya dūraṁ Nārāyaṇa-praṇayinī-nayanāmbu-vāhaḥ || 9 ||
जिस प्रकार वर्षा का मेघ चातक शिशु पर जल बरसाता है, उसी प्रकार भगवान नारायण की प्राणप्रिया लक्ष्मी के नेत्र रूपी मेघ दया की वायु से प्रेरित होकर, मेरे पूर्वजन्मों के पाप रूपी ताप को दूर कर मुझ अत्यंत निर्धन एवं दुःखी भक्त पर धन की अजस्र अमृत-धारा बरसाएं!
गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति । सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १० ॥
Gīr-devateti garuḍa-dhvaja-sundarīti Śākambharīti śaśi-śekhara-vallabheti | Sṛṣṭi-sthiti-pralaya-keliṣu saṁsthitāyai Tasyai namas-tribhuvanaika-guros-taruṇyai || 10 ||
सृष्टि के समय जो सरस्वती (गीर्देवता), पालन के समय जो विष्णुप्रिया (गरुड़ध्वज सुंदरी), पोषण के समय जो शाकंभरी और प्रलय के समय जो शिवप्रिया पार्वती हैं, उन तीनों लोकों के परमगुरु नारायण की नित्य यौवनशालिनी शक्ति महालक्ष्मी को मेरा नमन है।
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै । शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११ ॥
Śrutyai namo'stu śubha-karma-phala-prasūtyai Ratyai namo'stu ramaṇīya-guṇārṇavāyai | Śaktyai namo'stu śata-patra-niketanāyai Puṣṭyai namo'stu puruṣottama-vallabhāyai || 11 ||
वेदरूपा और शुभ कर्मों के उत्तम फल देने वाली आपको नमस्कार! रमणीय सद्गुणों के महासागर स्वरूपा रति को नमस्कार! कमल-आवासिनी पराशक्ति को नमस्कार! और पुरुषोत्तम भगवान विष्णु की प्राणप्रिया पुष्टि स्वरूपा महालक्ष्मी को बारंबार नमस्कार!
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै । नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२ ॥
Namo'stu nālīka-nibhānanāyai Namo'stu dugdhodadhi-janma-bhūmyai | Namo'stu somāmṛta-sodarāyai Namo'stu nārāyaṇa-vallabhāyai || 12 ||
कमल के समान परम सुंदर मुखमंडल वाली देवी को नमस्कार! क्षीरसागर से प्रादुर्भूत होने वाली को नमस्कार! चंद्रमा और अमरत्वदायी अमृत की सहोदरा को नमस्कार! और भगवान श्रीनारायण की प्राणवल्लभा को कोटि-कोटि नमस्कार!
नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै । नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १३ ॥
Namo'stu hemāmbuja-pīṭhikāyai Namo'stu bhū-maṇḍala-nāyikāyai | Namo'stu devādi-dayā-parāyai Namo'stu śārṅgāyudha-vallabhāyai || 13 ||
स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान होने वाली को नमस्कार! संपूर्ण भूमंडल की अधीश्वरी को नमस्कार! देवताओं पर दया बरसाने वाली कृपामयी को नमस्कार! और शार्ङ्गधनुर्धारी श्रीविष्णु की अर्धांगिनी को नमस्कार!
नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै । नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ १४ ॥
Namo'stu devyai bhṛgu-nandanāyai Namo'stu viṣṇor-urasi sthitāyai | Namo'stu lakṣmyai kamalālayāyai Namo'stu dāmodara-vallabhāyai || 14 ||
भृगुमुनि की पुत्री देवी को नमस्कार! भगवान विष्णु के वक्षःस्थल पर सदैव विराजने वाली को नमस्कार! कमल-निवासिनी महालक्ष्मी को नमस्कार! और दामोदर भगवान की प्रियतमा को सादर नमस्कार!
नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै । नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५ ॥
Namo'stu kāntyai kamalekṣaṇāyai Namo'stu bhūtyai bhuvana-prasūtyai | Namo'stu devādibhir-arcitāyai Namo'stu nandātmaja-vallabhāyai || 15 ||
कमलनयनी कांतिस्वरूपा को नमस्कार! ऐश्वर्य और संपूर्ण भुवनों को उत्पन्न करने वाली जगन्माता को नमस्कार! इंद्रादि देवताओं द्वारा पूजिता को नमस्कार! और नंदनंदन श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया को बार-बार नमस्कार!
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदाननिरतानि सरोरुहाक्षि । त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातुरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १६ ॥
Sampat-karāṇi sakalendriya-nandanāni Sāmrājya-dāna-niratāni saroruhākṣi | Tvad-vandanāni duritāharaṇodyatāni Mām-eva mātur-aniśaṁ kalayantu mānye || 16 ||
हे कमलनयनी! आपकी वंदना समस्त संपत्तियां देने वाली, सभी इंद्रियों को आनंदित करने वाली, साम्राज्य प्रदान करने वाली और घोर पापों को नष्ट करने वाली है। हे पूज्य मात! आपके चरणों की यह स्तुति मुझे निरंतर आपके ध्यान में लीन रखे।
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः । संतनोति वचनाङ्गमानसैस्- त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७ ॥
Yat-kaṭākṣa-samupāsanā-vidhiḥ Sevakasya sakalārtha-sampadaḥ | Saṁtanoti vacanāṅga-mānasais- -tvāṁ murāri-hṛdayeśvarīṁ bhaje || 17 ||
जिनके कृपा-कटाक्ष की उपासना करने से भक्त को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी समस्त संपदाएं प्राप्त हो जाती हैं, उन भगवान मुरारि के हृदय की स्वामिनी महालक्ष्मी का मैं वाणी, देह और मन से भजन करता हूं।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १८ ॥
Sarāsija-nilaye saroja-haste Dhavalatām-aṁśuka-gandha-mālya-śobhe | Bhagavati hari-vallabhe manojñe Tribhuvana-bhūtikari prasīda mahyam || 18 ||
कमल के वन में निवास करने वाली, हाथ में कमल धारण करने वाली, अत्यंत श्वेत व सुगंधित वस्त्र-मालाओं से सुशोभित, भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय, मनमोहक और तीनों लोकों को वैभव प्रदान करने वाली हे भगवती! मुझ पर प्रसन्न होइए।
दिङ्मातङ्गैः कनककलशामर्जितास्वच्छतोयैर्- आसूक्ताभिः स्वजनिरमणीं भूरिमायूरकौपीम् । प्रातर्लक्ष्मीं जलधिकुलपुत्रीं विष्णुपत्नीं लोकामातुः प्रणमत जननीं मङ्गलं मङ्गलानाम् ॥ १९ ॥
Diṅ-mātaṅgaiḥ kanaka-kalaśām-arjitā-svaccha-toyoer- -āsūktābhiḥ sva-jani-ramaṇīṁ bhūri-māyūra-kaupīm | Prātar-lakṣmīṁ jaladhi-kula-putrīṁ viṣṇu-patnīṁ Lokā-mātuḥ praṇamata jananīṁ maṅgalaṁ maṅgalānām || 19 ||
दिग्गजों द्वारा स्वर्ण-कलशों में लाए गए स्वच्छ अमृत-जल से जिनका प्रातःकाल अभिषेक किया जाता है, जो समुद्र की राजपुत्री, भगवान विष्णु की पटरानी और समस्त मंगलों की भी परम मंगल स्वरूपा हैं, उन जगन्माता लक्ष्मी को हम सब प्रणाम करते हैं।
कमले कमलावतांसकाङ्क्षी करुणाम्भोजसहोदराक्षिपद्मे । कमलासनवन्दिताङ्घ्रिपद्मे कमलानिधिं कुरु मे कृपारसेन ॥ २० ॥
Kamale kamalāvatāṁsa-kāṅkṣī Karuṇāmbhoja-sahodarākṣi-padme | Kamalāsana-vanditāṅghri-padme Kamalānidhiṁ kuru me kṛpā-rasena || 20 ||
हे कमल-निवासिनी! कमल के समान करुणापूर्ण नयनों वाली! ब्रह्माजी द्वारा पूजित चरणकमलों वाली हे देवी! अपने दयारस से मुझे अष्टलक्ष्मी और सकल संपदाओं का निधि (खजाना) बना दीजिए।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूमन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि भुवि भोगशालिनः ॥ २१ ॥
Stuvanti ye stutibhir-amūm-anvahaṁ Trayī-mayīṁ tribhuvana-mātaraṁ ramām | Guṇādhikā gurutara-bhāgya-bhāgino Bhavanti te bhuvi bhuvi bhoga-śālinaḥ || 21 ||
जो मनुष्य वेदमयी, तीनों लोकों की माता रमा (महालक्ष्मी) की इस पावन कनकधारा स्तुति द्वारा नित्य स्तुति करते हैं, वे इस पृथ्वी पर अनुपम सद्गुणों से संपन्न, महान भाग्यशाली और समस्त सुख-वैभवों के स्वामी बन जाते हैं।
फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)
आदि शंकराचार्य जी की निःस्वार्थ भक्ति और करुणा से प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने स्वर्ण के आंवलों की वर्षा कर दी थी। जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके घर में कभी अन्न और धन का अभाव नहीं रहता।
नित्य पाठ करें और आत्मिक शांति प्राप्त करें
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अन्य कल्याणकारी स्तोत्र
अपनी नित्य पूजा और साधना के लिए अन्य पावन स्तोत्रों का पाठ करें।
