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भगवान महाविष्णु (नारायण)86 श्लोक

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् — महाभारत अनुशासन पर्व, १००० दिव्य नाम, हिंदी अर्थ एवं पाठ विधि

The Sri Vishnu Sahasranamam Stotram (श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम्) is the crown jewel of the Mahabharata (Anushasana Parva, Chapter 149). As Bhishma Pitamaha lay upon the bed of arrows awaiting Uttarayana, King Yudhishthira approached him and asked: 'Who is the one supreme deity in all the worlds? By praising whom does a human being attain auspiciousness and liberation?' In reply, with tears of divine love, Bhishma revealed the one thousand transcendent names of Lord Maha Vishnu in the presence of Lord Krishna Himself. Reciting this stotra cures deep karmic distress, bestows peace of mind, grants longevity, and fulfills all righteous aspirations.

दृश्य:
base
रचयिता / ऋषिभीष्म पितामह एवं महर्षि वेदव्यास
मूल शास्त्र / स्रोतमहाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय १४९)
शुभ दिन व समयगुरुवार, एकादशी, पूर्णिमा एवं वैकुंठ एकादशी
कुल श्लोक संख्या86 श्लोक

दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर

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पाठ संख्या0
ॐ

॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥

पाठ से पूर्व ध्यान

क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां मालाक्लृप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षै- रानन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥

Kṣīrodanvat-pradeśe śuci-maṇi-vilasat-saikate mauktikānāṁ Mālā-klptāsana-sthaḥ sphaṭika-maṇi-nibhair-mauktikair-maṇḍitāṅgaḥ | Śubhrair-abhrair-adabhrair-upari-viracitair-mukta-pīyūṣa-varṣair- Ānandī naḥ punīyād-ari-nalina-gadā-śaṅkha-pāṇir-mukundaḥ ||

भावार्थ:

क्षीरसागर के प्रदेश में, स्वच्छ मणियों से चमकते हुए बालू के तट पर, मोतियों की माला से सजे आसन पर विराजमान, स्फटिक मणि के समान श्वेत मोतियों के आभूषणों से अलंकृत, ऊपर उमड़ते हुए श्वेत मेघों से अमृत की वर्षा का आनंद लेते हुए, अपने हाथों में चक्र, कमल, गदा और शंख धारण करने वाले भगवान मुकुंद हम सबको पवित्र करें।

श्लोक1

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १ ॥

Viśvaṁ viṣṇur-vaṣaṭkāro bhūta-bhavya-bhavat-prabhuḥ | Bhūta-kṛd-bhūta-bhṛd-bhāvo bhūtātmā bhūta-bhāvanaḥ || 1 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

१. विश्वम् (जो स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड स्वरूप हैं), २. विष्णुः (जो सर्वव्यापी हैं), ३. वषट्कारः (यज्ञों में जिनके निमित्त वषट् आहुति दी जाती है), ४. भूतभव्यभवत्प्रभुः (भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों के स्वामी), ५. भूतकृत् (समस्त प्राणियों के सृजनकर्ता), ६. भूतभृत् (समस्त जीवों का भरण-पोषण करने वाले), ७. भावः (शुद्ध सत्ता स्वरूप), ८. भूतात्मा (समस्त जीवों की अंतरात्मा), ९. भूतभावनः (समस्त जीवों का कल्याण और प्रगति करने वाले)।

श्लोक2

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥

Pūtātmā paramātmā ca muktānāṁ paramā gatiḥ | Avyayaḥ puruṣaḥ sākṣī kṣetrajño'kṣara eva ca || 2 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

१०. पूतात्मा (परम शुद्ध आत्मा), ११. परमात्मा (सर्वोच्च चेतना), १२. मुक्तानां परमा गतिः (मुक्त पुरुषों के परम आश्रय और लक्ष्य), १३. अव्ययः (अविनाशी जिनका कभी ह्रास नहीं होता), १४. पुरुषः (विराट पुरुष), १५. साक्षी (सबके कर्मों को देखने वाले), १६. क्षेत्रज्ञः (शरीर रूपी क्षेत्र को जानने वाले), १७. अक्षरः (क्षर-रहित, नित्य)।

श्लोक3

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥

Yogo yoga-vidāṁ netā pradhāna-puruṣeśvaraḥ | Nārasiṁha-vapuḥ śrīmān keśavaḥ puruṣottamaḥ || 3 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

१८. योगः (योग द्वारा प्राप्त होने वाले), १९. योगविदां नेता (योगियों का मार्गदर्शन करने वाले), २०. प्रधानपुरुषेश्वरः (प्रकृति और पुरुष दोनों के स्वामी), २१. नारसिंहवपुः (भक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु नृसिंह रूप धारण करने वाले), २२. श्रीमान् (सदा लक्ष्मी से युक्त), २३. केशवः (सुंदर केशों वाले / ब्रह्मा-विष्णु-शिव के स्वामी), २४. पुरुषोत्तमः (सर्वश्रेष्ठ पुरुष)।

श्लोक4

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ ४ ॥

Sarvagaḥ sarva-vid-bhānur-viṣvakseno janārdanaḥ | Vedo veda-vid-avyaṅgo vedāṅgo veda-vit kaviḥ || 4 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सर्वगः (सर्वव्यापी), सर्ववित् (सर्वज्ञ), भानुः (प्रकाशक), विष्वक्सेनः (दैत्यों की सेना भगाने वाले), जनार्दनः (दुष्टों को दंड देने वाले), वेदः (वेदस्वरूप), वेदवित् (वेदों को जानने वाले), अव्यङ्गः (दोषरहित), वेदाङ्गः (वेदांगस्वरूप), वेदवित् (वेदों के ज्ञाता), कविः (सर्वद्रष्टा)।

श्लोक5

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ ५ ॥

Lokādhyakṣaḥ surādhyakṣo dharmādhyakṣaḥ kṛtākṛtaḥ | Caturātmā catur-vyūhaś-catur-daṁṣṭraś-catur-bhujaḥ || 5 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

लोकाध्यक्षः (लोकों के स्वामी), सुराध्यक्षः (देवताओं के अध्यक्ष), धर्माध्यक्षः (धर्म के अध्यक्ष), कृताकृतः (कार्य और कारण रूप), चतुरात्मा (चार रूपों वाले), चतुर्व्यूहः (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध रूप), चतुर्दंष्ट्रः (नृसिंह रूप में चार दाढ़ों वाले), चतुर्भुजः (चार भुजाओं वाले)।

श्लोक6

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ ६ ॥

Bhrājiṣṇur-bhojanaṁ bhoktā sahiṣṇur-jagad-ādijaḥ | Anagho vijayo jetā viśva-yoniḥ punarvasuḥ || 6 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

भ्राजिष्णुः (प्रकाशमय), भोजनम् (प्रकृति रूप भोग्य), भोक्ता (पुरुष रूप भोक्ता), सहिष्णुः (सहनशील), जगदादिजः (जगत से पूर्व प्रकट होने वाले), अनघः (पापरहित), विजयः (विजय स्वरूप), जेता (सदा जीतने वाले), विश्वयोनिः (जगत के कारण), पुनर्वसुः (शरीरों में पुनः निवास करने वाले)।

श्लोक7

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ ७ ॥

Upendro vāmanaḥ prāṁśur-amoghaḥ śucir-ūrjitaḥ | Atīndraḥ saṅgrahaḥ sargo dhṛtātmā niyamo yamaḥ || 7 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उपेन्द्रः (इंद्र के अनुज), वामनः (वामन रूप), प्रांशुः (त्रिविक्रम विशाल रूप), अमोघः (सफल संकल्प वाले), शुचिः (परम पवित्र), ऊर्जितः (अति बलशाली), अतीन्द्रः (इंद्र से परे), संग्रहः (प्रलय में समेटने वाले), सर्गः (सृष्टिकर्ता), धृतात्मा (आत्मस्थ), नियमः (नियमकर्ता), यमः (नियंता)।

श्लोक8

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ ८ ॥

Vedyo vaidyaḥ sadā-yogī vīrahā mādhavo madhuḥ | Atīndriyo mahā-māyo mahotsāho mahā-balaḥ || 8 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

वेद्यः (जानने योग्य), वैद्यः (भव-रोग हरने वाले धन्वन्तरि), सदायोगी (सदा योगयुक्त), वीरहा (दुष्ट असुरों का नाश करने वाले), माधवः (लक्ष्मीपति), मधुः (मधुर), अतीन्द्रियः (इंद्रियों से अगोचर), महामायः (महामायावी), महोत्साहः (सृष्टि-पालन में उत्साही), महाबलः (अनंत बलशाली)।

श्लोक9

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ ९ ॥

Mahā-buddhir-mahā-vīryo mahā-śaktir-mahā-dyutiḥ | Anirdeśya-vapuḥ śrīmān-ameyātmā mahā-dri-dhṛk || 9 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

महाबुद्धिः (परम बुद्धिमान), महावीर्यः (अपरिमित सामर्थ्यवान), महाशक्तिः (सर्वशक्तिमान), महाद्युतिः (परम प्रकाशमान), अनिर्देश्यवपुः (वर्णनातीत दिव्य देह वाले), श्रीमान् (शोभा-संपन्न), अमेयात्मा (अज्ञेय बुद्धि वाले), महाद्रिधृक् (गोवर्धन व मंदराचल पर्वत धारण करने वाले)।

श्लोक10

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ १० ॥

Maheṣvāso mahī-bhartā śrīnivāsaḥ satāṁ gatiḥ | Aniruddhaḥ surānando govindo govidāṁ patiḥ || 10 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

महेष्वासः (महान धनुर्धर), महीभर्ता (पृथ्वी का भरण-पोषण करने वाले), श्रीनिवासः (वक्ष पर लक्ष्मी का निवास रखने वाले), सतां गतिः (सत्पुरुषों के परम आश्रय), अनिरुद्धः (अजेय), सुरानन्दः (देवताओं को आनंद देने वाले), गोविन्दः (वेद व गौओं के रक्षक), गोविदां पतिः (वाणी के ज्ञाताओं के स्वामी)।

श्लोक11

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ ११ ॥

Marīcir-damano haṁsaḥ suparṇo bhujagottamaḥ | Hiraṇya-nābhaḥ sutapāḥ padmanābhaḥ prajāpatiḥ || 11 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

मरीचिः (तेजस्वी), दमनः (दुष्टों का दमन करने वाले), हंसः (संसार-भय हरने वाले), सुपर्णः (सुंदर पंख वाले गरुड़ रूप), भुजगोत्तमः (शेषनाग रूप), हिरण्यनाभः (स्वर्ण नाभि वाले), सुतपाः (उत्कृष्ट तप वाले), पद्मनाभः (नाभिकमल वाले), प्रजापतिः (प्रजा के स्वामी)।

श्लोक12

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ १२ ॥

Amṛtyuḥ sarva-dṛk siṁhaḥ sandhātā sandhimān sthiraḥ | Ajo durmarṣaṇaḥ śāstā viśrutātmā surārihā || 12 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अमृत्युः (मृत्यु से रहित), सर्वदृक् (सब देखने वाले), सिंहः (सिंह रूपी पराक्रमी), सन्धाता (कर्मफल जोड़ने वाले), सन्धिमान् (फल भोगने वाले), स्थिरः (अटल), अजः (अजन्मा), दुर्मर्षणः (असह्य पराक्रमी), शास्ता (शासक), विश्रुतात्मा (विख्यात आत्मा), सुरारिहा (असुरों का नाश करने वाले)।

श्लोक13

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ १३ ॥

Gurur-gurutamo dhāma satyaḥ satya-parākramaḥ | Nimiṣo'nimiṣaḥ sragvī vācaspatir-udāra-dhīḥ || 13 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

गुरुः (जगत के गुरु), गुरुतमः (गुरुओं के भी गुरु), धाम (परम तेज व स्थान), सत्यः (सत्यस्वरूप), सत्यपराक्रमः (सत्य पराक्रम वाले), निमिषः (योगनिद्रा में पलकें मूंदने वाले), अनिमिषः (सदा जाग्रत), स्रग्वी (वैजयंती माला धारी), वाचस्पतिः (विद्या के स्वामी), उदारधीः (उदार बुद्धि वाले)।

श्लोक14

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ १४ ॥

Agraṇīr-grāmaṇīḥ śrīmān nyāyo netā samīraṇaḥ | Sahasra-mūrdhā viśvātmā sahasrākṣaḥ sahasra-pāt || 14 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अग्रणीः (मार्गदर्शक), ग्रामणीः (लोकों के नेता), श्रीमान् (ऐश्वर्यशाली), न्यायः (न्यायस्वरूप), नेता (संचालक), समीरणः (प्राणवायु), सहस्रमूर्धा (सहस्र मस्तक वाले), विश्वात्मा (विश्व की आत्मा), सहस्राक्षः (सहस्र नेत्र वाले), सहस्रपात् (सहस्र चरण वाले)।

श्लोक15

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ १५ ॥

Āvartano nivṛttātmā saṁvṛtaḥ sampramardanaḥ | Ahaḥ saṁvartako vahnir-anilo dharaṇīdharaḥ || 15 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

आवर्तनः (संसार-चक्र घुमाने वाले), निवृत्तात्मा (माया से विरक्त), संवृतः (अज्ञानियों से छिपे रहने वाले), सम्प्रमर्दनः (दुष्टों का मर्दन करने वाले), अहः संवर्तकः (दिन के प्रवर्तक सूर्य), वह्निः (अग्नि), अनिलः (वायु), धरणीधरः (शेष रूप में पृथ्वी धारण करने वाले)।

श्लोक16

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ १६ ॥

Suprasādaḥ prasannātmā viśva-dhṛg-viśva-bhug-vibhuḥ | Satkartā satkṛtaḥ sādhur-jahnur-nārāyaṇo naraḥ || 16 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सुप्रसादः (वरदाता), प्रसन्नात्मा (सदा प्रसन्न), विश्वधृक् (जगत को धारण करने वाले), विश्वभुक् (पालन करने वाले), विभुः (सर्वसमर्थ), सत्कर्ता (सत्पुरुषों का सत्कार करने वाले), सत्कृतः (पूजित), साधुः (धर्मपरायण), जह्नुः (संहारकर्ता), नारायणः (जलशायी), नरः (नेता)।

श्लोक17

असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ १७ ॥

Asaṅkhyeyo'prameyātmā viśiṣṭaḥ śiṣṭa-kṛc-chuciḥ | Siddhārthaḥ siddha-saṅkalpaḥ siddhi-daḥ siddhi-sādhanaḥ || 17 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

असंख्येयः (असंख्य नाम-रूप वाले), अप्रमेयात्मा (मापा न जा सकने वाला), विशिष्टः (सर्वोच्च), शिष्टकृत् (शिष्टों का पालन करने वाले), शुचिः (शुद्ध), सिद्धार्थः (पूर्णकाम), सिद्धसंकल्पः (सत्य संकल्प वाले), सिद्धिदः (सिद्धिदाता), सिद्धिसाधनः (साधना के साधन)।

श्लोक18

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ १८ ॥

Vṛṣāhī vṛṣabho viṣṇur-vṛṣaparvā vṛṣodaraḥ | Vardhano vardhamānaś-ca viviktaḥ śruti-sāgaraḥ || 18 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

वृषाही (धर्मरूपी दिन), वृषभः (इच्छाएं बरसाने वाले), विष्णुः (सर्वव्यापी), वृषपर्वा (धर्म की सीढ़ी), वृषोदरः (धर्म को उदर में रखने वाले), वर्धनः (वृद्धिदाता), वर्धमानः (सदा बढ़ने वाले), विविक्तः (एकांत स्वरूप), श्रुतिसागरः (वेदों के सागर)।

श्लोक19

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ १९ ॥

Subhujo durdharo vāgmī mahendro vasudo vasuḥ | Naikarūpo bṛhad-rūpaḥ śipiviṣṭaḥ prakāśanaḥ || 19 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सुभुजः (सुंदर भुजाओं वाले), दुर्धरः (धारण करने में कठिन), वाग्मी (सर्वश्रेष्ठ वक्ता), महेन्द्रः (महान ईश्वर), वसुदः (धनदाता), वसुः (सर्वत्र वास करने वाले), नैकरूपः (अनेक रूपों वाले), बृहद्रूपः (विराटरूप), शिपिविष्टः (यज्ञपुरुष), प्रकाशनः (प्रकाशक)।

श्लोक20

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ २० ॥

Ojas-tejo-dyuti-dharaḥ prakāśātmā pratāpanaḥ | Ṛddhaḥ spaṣṭākṣaro mantraś-candrāṁśur-bhāskara-dyutiḥ || 20 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ओजस्तेजोद्युतिधरः (बल, तेज व कांति धारक), प्रकाशात्मा (प्रकाश स्वरूप), प्रतापनः (सूर्य रूप में तपाने वाले), ऋद्धः (गुणसंपन्न), स्पष्टाक्षरः (ओंकार स्वरूप), मन्त्रः (मंत्र रूप), चन्द्रांशुः (चंद्रमा की शीतल किरणें), भास्करद्युतिः (सूर्य के समान दीप्तिमान)।

श्लोक21

विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ २१ ॥

Virāmo virajo mārgo neyo nayo'nayaḥ | Vīraḥ śaktimatāṁ śreṣṭho dharmo dharma-vid-uttamaḥ || 21 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

विरामः (परम विश्राम), विरजः (रजोगुण रहित), मार्गः (मुक्ति का मार्ग), नेयः (ज्ञानगम्य), नयः (सद्मार्ग प्रदर्शक), अनयः (अजेय), वीरः (महापराक्रमी), शक्तिमतां श्रेष्ठः (सर्वशक्तिमान), धर्मः (धर्मस्वरूप), धर्मविदुत्तमः (धर्म के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ)।

श्लोक22

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ २२ ॥

Vaikuṇṭhaḥ puruṣaḥ prāṇaḥ prāṇa-daḥ praṇavaḥ pṛthuḥ | Hiraṇyagarbhaḥ śatrughno vyāpto vāyur-adhokṣajaḥ || 22 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

वैकुण्ठः (वैकुंठनाथ), पुरुषः (सर्वव्यापी परमात्मा), प्राणः (प्राणस्वरूप), प्राणदः (प्राणदाता), प्रणवः (ओंकार), पृथुः (विस्तृत), हिरण्यगर्भः (ब्रह्मांड के कारण), शत्रुघ्नः (शत्रुनाशक), व्याप्तः (सर्वव्यापक), वायुः (वायु रूप), अधोक्षजः (इंद्रियों से परे)।

श्लोक23

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ २३ ॥

Ṛtuḥ sudarśanaḥ kālaḥ parameṣṭhī parigrahaḥ | Ugraḥ saṁvatsaro dakṣo viśrāmo viśva-dakṣiṇaḥ || 23 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ऋतुः (ऋतुस्वरूप काल), सुदर्शनः (शुभ दर्शन देने वाले), कालः (कालस्वरूप), परमेष्ठी (हृदय में स्थित), परिग्रहः (भक्तों को स्वीकारने वाले), उग्रः (भयानक नृसिंह रूप), संवत्सरः (वर्ष रूप काल), दक्षः (कार्यकुशल), विश्रामः (परम शांति), विश्वदक्षिणः (सबको फल देने में उदार)।

श्लोक24

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ २४ ॥

Vistāraḥ sthāvara-sthāṇuḥ pramāṇaṁ bījam-avyayam | Artho'nartho mahā-kośo mahā-bhogo mahā-dhanaḥ || 24 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

विस्तारः (विस्तृत ब्रह्मांड), स्थावरस्थाणुः (पर्वतादि रूप स्थिर), प्रमाणम् (प्रमाण स्वरूप ज्ञान), बीजमव्ययम् (अविनाशी बीज), अर्थः (सर्वकाम्य लक्ष्य), अनर्थः (निष्काम), महाकोशः (अन्नमयादि पंचकोश), महाभोगः (परमानंद भोग), महाधनः (परम ऐश्वर्यशाली)।

श्लोक25

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ २५ ॥

Anirviṇṇaḥ sthaviṣṭho'bhūr-dharma-yūpo mahā-makhaḥ | Nakṣatra-nemir-nakṣatrī kṣamaḥ kṣāmaḥ samīhanaḥ || 25 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

अनिर्विण्णः (उत्साहहीन न होने वाले), स्थविष्ठः (विराट रूप), अभूः (अजन्मा), धर्मयूपः (धर्म का आधार), महामखः (महायज्ञ रूप), नक्षत्रनेमिः (तारामंडल के केंद्र), नक्षत्री (चंद्र रूप), क्षमः (सर्वसमर्थ), क्षामः (प्रलय में क्षीण होने वाले), समीहनः (सृष्टि की इच्छा रखने वाले)।

श्लोक26

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ॥ 26 ॥

yajña ijyo mahejyaśca kratuḥ satraṁ satāṁ gatiḥ । sarvadarśī vimuktātmā sarvajño jñānamuttamam ॥ ॥ 26 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्

श्लोक27

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् । मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ॥ 27 ॥

suvrataḥ sumukhaḥ sūkṣmaḥ sughoṣaḥ sukhadaḥ suhṛt । manoharo jitakrodho vīrabāhurvidāraṇaḥ ॥ ॥ 27 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः

श्लोक28

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् । वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ॥ 28 ॥

svāpanaḥ svavaśo vyāpī naikātmā naikakarmakṛt । vatsaro vatsalo vatsī ratnagarbho dhaneśvaraḥ ॥ ॥ 28 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः

श्लोक29

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ॥ 29 ॥

dharmagubdharmakṛddharmī sadasatkṣaramakṣaram । avijñātā sahasrāṁśurvidhātā kṛtalakṣaṇaḥ ॥ ॥ 29 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः

श्लोक30

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ॥ 30 ॥

gabhastinemiḥ sattvasthaḥ siṁho bhūtamaheśvaraḥ । ādidevo mahādevo deveśo devabhṛdguruḥ ॥ ॥ 30 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः

श्लोक31

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ॥ 31 ॥

uttaro gopatirgoptā jñānagamyaḥ purātanaḥ । śarīrabhūtabhṛdbhoktā kapīndro bhūridakṣiṇaḥ ॥ ॥ 31 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः

श्लोक32

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः । विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्त्वताम्पतिः ॥ ॥ 32 ॥

somapo'mṛtapaḥ somaḥ purujitpurusattamaḥ । vinayo jayaḥ satyasaṁdho dāśārhaḥ sāttvatāmpatiḥ ॥ ॥ 32 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्त्वताम्पतिः

श्लोक33

जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ॥ 33 ॥

jīvo vinayitāsākṣī mukundo'mitavikramaḥ । ambhonidhiranantātmā mahodadhiśayo'ntakaḥ ॥ ॥ 33 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः

श्लोक34

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ॥ 34 ॥

ajo mahārhaḥ svābhāvyo jitāmitraḥ pramodanaḥ । ānando nandano nandaḥ satyadharmā trivikramaḥ ॥ ॥ 34 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः

श्लोक35

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ॥ 35 ॥

maharṣiḥ kapilācāryaḥ kṛtajño medinīpatiḥ । tripadastridaśādhyakṣo mahāśṛṅgaḥ kṛtāntakṛt ॥ ॥ 35 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्

श्लोक36

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी । गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ॥ 36 ॥

mahāvarāho govindaḥ suṣeṇaḥ kanakāṅgadī । guhyo gabhīro gahano guptaścakragadādharaḥ ॥ ॥ 36 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः

श्लोक37

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः । वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ॥ 37 ॥

vedhāḥ svāṅgo'jitaḥ kṛṣṇo dṛḍhaḥ saṁkarṣaṇo'cyutaḥ । varuṇo vāruṇo vṛkṣaḥ puṣkarākṣo mahāmanāḥ ॥ ॥ 37 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः

श्लोक38

भगवान् भगहा नन्दी वनमाली हलायुधः । आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ॥ 38 ॥

bhagavān bhagahā nandī vanamālī halāyudhaḥ । ādityo jyotirādityaḥ sahiṣṇurgatisattamaḥ ॥ ॥ 38 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: भगवान् भगहा नन्दी वनमाली हलायुधः आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः

श्लोक39

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ॥ 39 ॥

sudhanvā khaṇḍaparaśurdāruṇo draviṇapradaḥ । divispṛksarvadṛgvyāso vācaspatirayonijaḥ ॥ ॥ 39 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः

श्लोक40

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ॥ 40 ॥

trisāmā sāmagaḥ sāma nirvāṇaṁ bheṣajaṁ bhiṣak । saṁnyāsakṛcchamaḥ śānto niṣṭhā śāntiḥ parāyaṇam ॥ ॥ 40 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्

श्लोक41

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ॥ 41 ॥

śubhāṅgaḥ śāntidaḥ sraṣṭā kumudaḥ kuvaleśayaḥ । gohito gopatirgoptā vṛṣabhākṣo vṛṣapriyaḥ ॥ ॥ 41 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः

श्लोक42

अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ॥ ॥ 42 ॥

anivartī nivṛttātmā saṁkṣeptā kṣemakṛcchivaḥ । śrīvatsavakṣāḥ śrīvāsaḥ śrīpatiḥ śrīmatāṁ varaḥ ॥ ॥ 42 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः

श्लोक43

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ॥ 43 ॥

śrīdaḥ śrīśaḥ śrīnivāsaḥ śrīnidhiḥ śrīvibhāvanaḥ । śrīdharaḥ śrīkaraḥ śreyaḥ śrīmāँllokatrayāśrayaḥ ॥ ॥ 43 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः

श्लोक44

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ॥ 44 ॥

svakṣaḥ svaṅgaḥ śatānando nandirjyotirgaṇeśvaraḥ । vijitātmā'vidheyātmā satkīrtiśchinnasaṁśayaḥ ॥ ॥ 44 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः

श्लोक45

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ॥ 45 ॥

udīrṇaḥ sarvataścakṣuranīśaḥ śāśvatasthiraḥ । bhūśayo bhūṣaṇo bhūtirviśokaḥ śokanāśanaḥ ॥ ॥ 45 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः

श्लोक46

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः । अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ॥ 46 ॥

arciṣmānarcitaḥ kumbho viśuddhātmā viśodhanaḥ । aniruddho'pratirathaḥ pradyumno'mitavikramaḥ ॥ ॥ 46 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः

श्लोक47

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ॥ 47 ॥

kālaneminihā vīraḥ śauriḥ śūrajaneśvaraḥ । trilokātmā trilokeśaḥ keśavaḥ keśihā hariḥ ॥ ॥ 47 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः

श्लोक48

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः । अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ ॥ 48 ॥

kāmadevaḥ kāmapālaḥ kāmī kāntaḥ kṛtāgamaḥ । anirdeśyavapurviṣṇurvīro'nanto dhanañjayaḥ ॥ ॥ 48 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः

श्लोक49

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः । ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ॥ 49 ॥

brahmaṇyo brahmakṛdbrahmā brahma brahmavivardhanaḥ । brahmavidbrāhmaṇo brahmī brahmajño brāhmaṇapriyaḥ ॥ ॥ 49 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः

श्लोक50

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः । महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ॥ 50 ॥

mahākramo mahākarmā mahātejā mahoragaḥ । mahākraturmahāyajvā mahāyajño mahāhaviḥ ॥ ॥ 50 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः

श्लोक51

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः । पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ॥ 51 ॥

stavyaḥ stavapriyaḥ stotraṁ stutiḥ stotā raṇapriyaḥ । pūrṇaḥ pūrayitā puṇyaḥ puṇyakīrtiranāmayaḥ ॥ ॥ 51 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः

श्लोक52

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः । वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ॥ 52 ॥

manojavastīrthakaro vasuretā vasupradaḥ । vasuprado vāsudevo vasurvasumanā haviḥ ॥ ॥ 52 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः

श्लोक53

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः । शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ॥ 53 ॥

sadgatiḥ satkṛtiḥ sattā sadbhūtiḥ satparāyaṇaḥ । śūraseno yaduśreṣṭhaḥ sannivāsaḥ suyāmunaḥ ॥ ॥ 53 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः

श्लोक54

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः । दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ॥ 54 ॥

bhūtāvāso vāsudevaḥ sarvāsunilayo'nalaḥ । darpahā darpado dṛpto durdharo'thāparājitaḥ ॥ ॥ 54 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः

श्लोक55

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् । अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ॥ 55 ॥

viśvamūrtirmahāmūrtirdīptamūrtiramūrtimān । anekamūrtiravyaktaḥ śatamūrtiḥ śatānanaḥ ॥ ॥ 55 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः

श्लोक56

एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् । लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ॥ 56 ॥

eko naikaḥ savaḥ kaḥ kiṁ yattatpadamanuttamam । lokabandhurlokanātho mādhavo bhaktavatsalaḥ ॥ ॥ 56 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः

श्लोक57

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ॥ 57 ॥

suvarṇavarṇo hemāṅgo varāṅgaścandanāṅgadī । vīrahā viṣamaḥ śūnyo ghṛtāśīracalaścalaḥ ॥ ॥ 57 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः

श्लोक58

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् । सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ॥ 58 ॥

amānī mānado mānyo lokasvāmī trilokadhṛk । sumedhā medhajo dhanyaḥ satyamedhā dharādharaḥ ॥ ॥ 58 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः

श्लोक59

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः । प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ॥ 59 ॥

tejovṛṣo dyutidharaḥ sarvaśastrabhṛtāṁ varaḥ । pragraho nigraho vyagro naikaśṛṅgo gadāgrajaḥ ॥ ॥ 59 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः

श्लोक60

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ॥ 60 ॥

caturmūrtiścaturbāhuścaturvyūhaścaturgatiḥ । caturātmā caturbhāvaścaturvedavidekapāt ॥ ॥ 60 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्

श्लोक61

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ॥ 61 ॥

samāvarto'nivṛttātmā durjayo duratikramaḥ । durlabho durgamo durgo durāvāso durārihā ॥ ॥ 61 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा

श्लोक62

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ॥ 62 ॥

śubhāṅgo lokasāraṅgaḥ sutantustantuvardhanaḥ । indrakarmā mahākarmā kṛtakarmā kṛtāgamaḥ ॥ ॥ 62 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः

श्लोक63

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ॥ 63 ॥

udbhavaḥ sundaraḥ sundo ratnanābhaḥ sulocanaḥ । arko vājasanaḥ śṛṅgī jayantaḥ sarvavijjayī ॥ ॥ 63 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी

श्लोक64

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ॥ 64 ॥

suvarṇabindurakṣobhyaḥ sarvavāgīśvareśvaraḥ । mahāhrado mahāgarto mahābhūto mahānidhiḥ ॥ ॥ 64 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः

श्लोक65

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ ॥ 65 ॥

kumudaḥ kundaraḥ kundaḥ parjanyaḥ pāvano'nilaḥ । amṛtāśo'mṛtavapuḥ sarvajñaḥ sarvatomukhaḥ ॥ ॥ 65 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः

श्लोक66

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ ॥ 66 ॥

sulabhaḥ suvrataḥ siddhaḥ śatrujicchatrutāpanaḥ । nyagrodhodumbaro'śvatthaścāṇūrāndhraniṣūdanaḥ ॥ ॥ 66 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः

श्लोक67

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ ॥ 67 ॥

sahasrārciḥ saptajihvaḥ saptaidhāḥ saptavāhanaḥ । amūrtiranagho'cintyo bhayakṛdbhayanāśanaḥ ॥ ॥ 67 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः

श्लोक68

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् । अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ ॥ 68 ॥

aṇurbṛhatkṛśaḥ sthūlo guṇabhṛnnirguṇo mahān । adhṛtaḥ svadhṛtaḥ svāsyaḥ prāgvaṁśo vaṁśavardhanaḥ ॥ ॥ 68 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः

श्लोक69

भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ ॥ 69 ॥

bhārabhṛtkathito yogī yogīśaḥ sarvakāmadaḥ । āśramaḥ śramaṇaḥ kṣāmaḥ suparṇo vāyuvāhanaḥ ॥ ॥ 69 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः

श्लोक70

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ ॥ 70 ॥

dhanurdharo dhanurvedo daṇḍo damayitā damaḥ । aparājitaḥ sarvasaho niyantā'niyamo'yamaḥ ॥ ॥ 70 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः

श्लोक71

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥ ॥ 71 ॥

sattvavān sāttvikaḥ satyaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ । abhiprāyaḥ priyārho'rhaḥ priyakṛtprītivardhanaḥ ॥ ॥ 71 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः

श्लोक72

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः । रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ ॥ 72 ॥

vihāyasagatirjyotiḥ surucirhutabhugvibhuḥ । ravirvirocanaḥ sūryaḥ savitā ravilocanaḥ ॥ ॥ 72 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः

श्लोक73

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ॥ 73 ॥

ananto hutabhugbhoktā sukhado naikajo'grajaḥ । anirviṇṇaḥ sadāmarṣī lokādhiṣṭhānamadbhutaḥ ॥ ॥ 73 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः

श्लोक74

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः । स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ ॥ 74 ॥

sanātsanātanatamaḥ kapilaḥ kapiravyayaḥ । svastidaḥ svastikṛtsvasti svastibhuksvastidakṣiṇaḥ ॥ ॥ 74 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः

श्लोक75

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ॥ 75 ॥

araudraḥ kuṇḍalī cakrī vikramyūrjitaśāsanaḥ । śabdātigaḥ śabdasahaḥ śiśiraḥ śarvarīkaraḥ ॥ ॥ 75 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः

श्लोक76

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ॥ 76 ॥

akrūraḥ peśalo dakṣo dakṣiṇaḥ kṣamiṇāṁ varaḥ । vidvattamo vītabhayaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ ॥ ॥ 76 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः

श्लोक77

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ॥ 77 ॥

uttāraṇo duṣkṛtihā puṇyo duḥsvapnanāśanaḥ । vīrahā rakṣaṇaḥ santo jīvanaḥ paryavasthitaḥ ॥ ॥ 77 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः

श्लोक78

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः । चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ॥ 78 ॥

anantarūpo'nantaśrīrjitamanyurbhayāpahaḥ । caturaśro gabhīrātmā vidiśo vyādiśo diśaḥ ॥ ॥ 78 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः

श्लोक79

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ॥ 79 ॥

anādirbhūrbhuvo lakṣmīḥ suvīro rucirāṅgadaḥ । janano janajanmādirbhīmo bhīmaparākramaḥ ॥ ॥ 79 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः

श्लोक80

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ॥ 80 ॥

ādhāranilayo'dhātā puṣpahāsaḥ prajāgaraḥ । ūrdhvagaḥ satpathācāraḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ paṇaḥ ॥ ॥ 80 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः

श्लोक81

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ॥ 81 ॥

pramāṇaṁ prāṇanilayaḥ prāṇabhṛtprāṇajīvanaḥ । tattvaṁ tattvavidekātmā janmamṛtyujarātigaḥ ॥ ॥ 81 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः

श्लोक82

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ॥ 82 ॥

bhūrbhuvaḥsvastarustāraḥ savitā prapitāmahaḥ । yajño yajñapatiryajvā yajñāṅgo yajñavāhanaḥ ॥ ॥ 82 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः

श्लोक83

यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः । यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ ॥ 83 ॥

yajñabhṛdyajñakṛdyajñī yajñabhugyajñasādhanaḥ । yajñāntakṛdyajñaguhyamannamannāda eva ca ॥ ॥ 83 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च

श्लोक84

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ ॥ 84 ॥

ātmayoniḥ svayaṁjāto vaikhānaḥ sāmagāyanaḥ । devakīnandanaḥ sraṣṭā kṣitīśaḥ pāpanāśanaḥ ॥ ॥ 84 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः

श्लोक85

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ ॥ 85 ॥

śaṅkhabhṛnnandakī cakrī śārṅgadhanvā gadādharaḥ । rathāṅgapāṇirakṣobhyaḥ sarvapraharaṇāyudhaḥ ॥ ॥ 85 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः

श्लोक86

सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति । वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी । श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ ॥ 86 ॥

sarvapraharaṇāyudha Oṁ nama iti । vanamālī gadī śārṅgī śaṅkhī cakrī ca nandakī । śrīmānnārāyaṇo viṣṇurvāsudevo'bhirakṣatu ॥ ॥ 86 ॥

सरल हिंदी भावार्थ:

श्री विष्णु के पवित्र नाम: सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु

फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा: 'जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का श्रवण या पाठ करता है, उसका कभी कोई अमंगल नहीं होता। वह इस लोक में यश, धन और आरोग्य पाकर अंत में परम पद को प्राप्त करता है।'

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