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भगवान श्री गणेश8 श्लोक

संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् — नारद पुराण, १२ पावन नाम, हिंदी अर्थ एवं संकट निवारण विधि

The Sankat Nashan Ganesha Stotram (संकटनाशन गणेश स्तोत्रम्) is an ancient, potent prayer found in the sacred Narada Purana, composed by Devarshi Narada. This hymn invokes Lord Ganesha through His twelve timeless divine names, each corresponding to a specific cosmic aspect of removing obstacles (Vighnaharta). Whether embarking on a new business, buying a property, facing legal turbulence, or struggling with chronic health hurdles, reciting these 12 names with unwavering faith dissolves all obstructions within six months.

दृश्य:
base
रचयिता / ऋषिदेवर्षि नारद
मूल शास्त्र / स्रोतनारद पुराण
शुभ दिन व समयबुधवार, संकष्टी चतुर्थी, विनायक चतुर्थी एवं गणेशोत्सव
कुल श्लोक संख्या8 श्लोक

दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर

सुझाव: नित्य 3 recitations daily (morning, noon, evening) पाठ करें। प्रत्येक पाठ के बाद 'गिनें' पर टैप करें।

पाठ संख्या0
ॐ

॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥

पाठ से पूर्व ध्यान

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

Śuklāmbara-dharaṁ viṣṇuṁ śaśi-varṇaṁ catur-bhujam | Prasanna-vadanaṁ dhyāyet sarva-vighnopaśāntaye ||

भावार्थ:

श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, सर्वव्यापी, चंद्रमा के समान शुभ्र वर्ण वाले, चार भुजाओं से सुशोभित और प्रसन्नमुख भगवान श्री गणेश का हमें समस्त विघ्नों की शांति के लिए ध्यान करना चाहिए।

श्लोक1

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥ १ ॥

Praṇamya śirasā devaṁ gaurī-putraṁ vināyakam | Bhaktāvāsaṁ smaren-nityam-āyuḥ-kāmārtha-siddhaye || 1 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

माता गौरी के पुत्र भगवान श्री विनायक को सिर झुकाकर प्रणाम करके, भक्तों के हृदय में सदैव निवास करने वाले प्रभु का अपनी आयु, अभीष्ट कामनाओं और अर्थ (धन-संपत्ति) की सिद्धि के लिए नित्य स्मरण करना चाहिए।

श्लोक2

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २ ॥

Prathamaṁ vakratuṇḍaṁ ca ekadantaṁ dvitīyakam | Tṛtīyaṁ kṛṣṇa-piṅgākṣaṁ gajavaktraṁ caturthakam || 2 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

पहला नाम 'वक्रतुण्ड' (घुमावदार सूंड वाले), दूसरा नाम 'एकदन्त' (एक दांत वाले), तीसरा नाम 'कृष्णपिङ्गाक्ष' (काली और भूरी आंखों वाले) और चौथा नाम 'गजवक्त्र' (हाथी के मुख वाले) है।

श्लोक3

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च । सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३ ॥

Lambodaraṁ pañcamaṁ ca ṣaṣṭhaṁ vikaṭam-eva ca | Saptamaṁ vighnarājendraṁ dhūmravarṇaṁ tathāṣṭamam || 3 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

पांचवां नाम 'लम्बोदर' (बड़े उदर वाले), छठा नाम 'विकट' (विशाल एवं भयानक स्वरूप वाले), सातवां नाम 'विघ्नराजेन्द्र' (विघ्नों के अधिपति) और आठवां नाम 'धूम्रवर्ण' (धुएं के समान वर्ण वाले) है।

श्लोक4

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् । एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४ ॥

Navamaṁ bhālacandraṁ ca daśamaṁ tu vināyakam | Ekādaśaṁ gaṇapatiṁ dvādaśaṁ tu gajānanam || 4 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

नवां नाम 'भालचन्द्र' (जिनके ललाट पर चंद्रमा सुशोभित है), दसवां नाम 'विनायक' (सर्वश्रेष्ठ नायक), ग्यारहवां नाम 'गणपति' (गणों के स्वामी) और बारहवां नाम 'गजानन' (हाथी के मुख वाले) है।

श्लोक5

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः । न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥ ५ ॥

Dvādaśaitāni nāmāni tri-sandhyaṁ yaḥ paṭhen-naraḥ | Na ca vighna-bhayaṁ tasya sarva-siddhi-karaṁ prabho || 5 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य प्रातः, दोपहर और संध्या—तीनों कालों में इन बारह पावन नामों का पाठ करता है, उसे किसी भी प्रकार के विघ्न का भय नहीं रहता। यह पाठ समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।

श्लोक6

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् । पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६ ॥

Vidyārthī labhate vidyāṁ dhanārthī labhate dhanam | Putrārthī labhate putrān mokṣārthī labhate gatim || 6 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इस स्तोत्र के पाठ से विद्या चाहने वाले को उत्तम विद्या, धन चाहने वाले को धन, संतान चाहने वाले को संतान और मोक्ष चाहने वाले को परम गति प्राप्त होती है।

श्लोक7

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् । संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७ ॥

Japed-gaṇapati-stotraṁ ṣaḍbhir-māsaiḥ phalaṁ labhet | Saṁvatsareṇa siddhiṁ ca labhate nātra saṁśayaḥ || 7 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इस गणपति स्तोत्र का नित्य जप करने से छह महीने में अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है और एक वर्ष में पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

श्लोक8

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् । तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥

Aṣṭabhyo brāhmaṇebhyaśca likhitvā yaḥ samarpayet | Tasya vidyā bhavet-sarvā gaṇeśasya prasādataḥ || 8 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों (सज्जनों/साधकों) को समर्पित करता है, भगवान श्री गणेश की कृपा से उसे समस्त विद्याओं और कलाओं की प्राप्ति होती है।

फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)

नारद पुराण के अनुसार जो साधक नित्य इन बारह पावन नामों का पाठ करता है, उसे छह माह में अभीष्ट सिद्धि और एक वर्ष में समस्त कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है।

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