Bhakti Voice
परम पुरुष (नारायण / विष्णु)16 श्लोक

पुरुष सूक्तम् — ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ९०, सम्पूर्ण १६ मन्त्र, हिंदी अर्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

The Purusha Suktam (पुरुष सूक्तम्) is one of the most revered and foundational hymns in the entire Vedic canon, found in the Rigveda (Mandala 10, Sukta 90) as well as the Shukla Yajurveda. It envisions the entire cosmos as the living, interconnected body of the Supreme Cosmic Being (Purusha). In 16 profound mantras, the Vedic seers explain how all worlds, stars, seasons, flora, fauna, and human faculties originated from the cosmic sacrifice (Yajna) of the Divine. Chanting this hymn harmonizes the individual soul (Jivatma) with universal cosmic consciousness (Paramatma).

दृश्य:
base
रचयिता / ऋषिऋषि नारायण
मूल शास्त्र / स्रोतऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त ९०) एवं शुक्लयजुर्वेद
शुभ दिन व समयगुरुवार, एकादशी, पूर्णिमा एवं नित्य पूजा
कुल श्लोक संख्या16 श्लोक

दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर

सुझाव: नित्य 1 recitation during temple/home Abhishekam पाठ करें। प्रत्येक पाठ के बाद 'गिनें' पर टैप करें।

पाठ संख्या0
ॐ

॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥

पाठ से पूर्व ध्यान

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Śāntākāraṁ bhujaga-śayanaṁ padma-nābhaṁ sureśaṁ Viśvādhāraṁ gagana-sadṛśaṁ megha-varṇaṁ śubhāṅgam | Lakṣmī-kāntaṁ kamala-nayanaṁ yogibhir-dhyāna-gamyaṁ Vande viṣṇuṁ bhava-bhaya-haraṁ sarva-lokaika-nātham ||

भावार्थ:

जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी, संपूर्ण विश्व के आधार, आकाश के समान सर्वव्यापी, मेघ के समान श्याम वर्ण वाले, सुंदर अंगों वाले, लक्ष्मीपति, कमल नयन, योगियों द्वारा ध्यान में जानने योग्य, संसार के भय को हरने वाले और संपूर्ण लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु की मैं वंदना करता हूं।

श्लोक1

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥

Oṁ sahasra-śīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasra-pāt | Sa bhūmiṁ viśvato vṛtvātyatiṣṭhad-daśāṅgulam || 1 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

वह विराट परम पुरुष हजारों सिरों वाले, हजारों नेत्रों वाले और हजारों चरणों वाले हैं। वे इस संपूर्ण ब्रह्मांड को सब ओर से व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल ऊपर (परे) स्थित हैं।

श्लोक2

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ २ ॥

Puruṣa evedaṁ sarvaṁ yad-bhūtaṁ yacca bhavyam | Utāmṛtatvasyeśāno yad-annenātirohati || 2 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जो कुछ बीत चुका है और जो कुछ भविष्य में होने वाला है, वह सब केवल वही विराट पुरुष हैं। वे अमृतत्व (मोक्ष) के भी स्वामी हैं, और जो कुछ अन्न (भौतिक पदार्थ) के द्वारा बढ़ता है, उसके भी वे ही अधिपति हैं।

श्लोक3

एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ३ ॥

Etāvānasya mahimāto jyāyāṁśca pūruṣaḥ | Pādo'sya viśvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṁ divi || 3 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

यह दृश्यमान जगत तो केवल उनकी महिमा का एक अंश है; वह परम पुरुष इससे भी कहीं अधिक महान हैं। यह संपूर्ण ब्रह्मांड और समस्त प्राणी उनका केवल एक चरण (चौथाई भाग) हैं; उनके तीन चरण अमृत स्वरूप होकर दिव्य परमधाम में स्थित हैं।

श्लोक4

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाऽभवात्पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ ४ ॥

Tripād-ūrdhva udait-puruṣaḥ pādo'syehā'bhavāt-punaḥ | Tato viṣvaṅ vyakrāmat-sāśanānaśane abhi || 4 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

वह परम पुरुष अपने तीन पादों (भागों) के साथ इस नश्वर संसार से ऊपर दिव्य अमृत लोक में स्थित है। उसका केवल एक पाद ही यहां बारंबार जगत के रूप में प्रकट होता है। इसके बाद वह चेतना (साशन) और जड़ (अनशन) संपूर्ण प्रपंच में सर्वत्र व्याप्त हो गया।

श्लोक5

तस्माद्विराडजायत्त विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ ५ ॥

Tasmād-virāḍ-ajāyata virājo adhi pūruṣaḥ | Sa jāto aty-aricyata paścād-bhūmim-atho puraḥ || 5 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उस आदि पुरुष से ब्रह्मांडीय विराट स्वरूप की उत्पत्ति हुई। उस विराट से पुनः विशेष पुरुष (जीवात्मा व देवता) प्रकट हुए। प्रकट होने के बाद वह भूमि से आगे और पीछे संपूर्ण दिशाओं में फैल गया।

श्लोक6

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ ६ ॥

Yat-puruṣeṇa haviṣā devā yajñam-atanvata | Vasanto asyāsīd-ājyaṁ grīṣma idhmaḥ śarad-dhaviḥ || 6 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जब देवताओं ने उस विराट पुरुष को ही आहुति (हवि) बनाकर मानसिक सृष्टि-यज्ञ का विस्तार किया, तब वसंत ऋतु उस यज्ञ का घी बनी, ग्रीष्म ऋतु समिधा बनी और शरद ऋतु पावन हविष्य बनी।

श्लोक7

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ ७ ॥

Taṁ yajñaṁ barhiṣi praukṣan puruṣaṁ jātam-agrataḥ | Tena devā ayajanta sādhyā ṛṣayaśca ye || 7 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

सर्वप्रथम प्रकट हुए उस यज्ञरूप परम पुरुष को कुशासन (बर्हि) पर प्रतिष्ठित कर प्रोक्षण किया गया। देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने उसी पुरुष के माध्यम से सृष्टि-यज्ञ संपन्न किया।

श्लोक8

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् । पशून् तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥ ८ ॥

Tasmād-yajñāt-sarvahutaḥ sambhṛtaṁ pṛṣad-ājyam | Paśūn tāṁś-cakre vāyavyān-āraṇyān grāmyāśca ye || 8 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उस सर्वहुत महायज्ञ से दही-मिश्रित घी (दधि-घृत) उत्पन्न हुआ। उसी से वायु में उड़ने वाले पक्षी, वन में रहने वाले वन्य जीव और गांवों में पलने वाले पालतू पशु उत्पन्न हुए।

श्लोक9

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ ९ ॥

Tasmād-yajñāt-sarvahuta ṛcaḥ sāmāni jajñire | Chandāṁsi jajñire tasmād-yajus-tasmād-ajāyata || 9 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उस सर्वहुत विराट यज्ञ से ऋग्वेद की ऋचाएं और सामवेद के गान प्रकट हुए। उसी से गायत्री आदि वैदिक छंद उत्पन्न हुए और उसी से यजुर्वेद का प्राकट्य हुआ।

श्लोक10

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः ॥ १० ॥

Tasmād-aśvā ajāyanta ye ke cobhayādataḥ | Gāvo ha jajñire tasmāt tasmāj-jātā ajāvayaḥ || 10 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उसी से घोड़े और वे सभी पशु उत्पन्न हुए जिनके ऊपर-नीचे दोनों तरफ दांत होते हैं। उसी महायज्ञ से गौएं उत्पन्न हुईं, और उसी से बकरियां व भेड़ें उत्पन्न हुईं।

श्लोक11

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥ ११ ॥

Yat-puruṣaṁ vyadadhuḥ katidhā vyakalpayan | Mukhaṁ kim-asya kau bāhū kā ūrū pādā ucyete || 11 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

जब ऋषियों-देवताओं ने उस विराट पुरुष का संकल्पना-युक्त विभाजन किया, तब उन्होंने उसे कितने रूपों में कल्पित किया? उसका मुख क्या बना? उसकी भुजाएं क्या बनीं? और उसकी जंघाएं व पैर क्या कहे गए?

श्लोक12

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ १२ ॥

Brāhmaṇo'sya mukham-āsīd bāhū rājanyaḥ kṛtaḥ | Ūrū tad-asya yad-vaiśyaḥ padbhyāṁ śūdro ajāyata || 12 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

ब्राह्मण (ज्ञानी व शिक्षक) उस विराट पुरुष का मुख बने; क्षत्रिय (रक्षक व शासक) उसकी भुजाएं बने; वैश्य (व्यापारी व कृषक) उसकी जंघाएं बने; और श्रमिक समाज उसके चरणों से उत्पन्न हुए।

श्लोक13

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥ १३ ॥

Candramā manaso jātaś-cakṣoḥ sūryo ajāyata | Mukhād-indraścāgniśca prāṇād-vāyur-ajāyata || 13 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उस विराट पुरुष के मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, उसके नेत्रों से सूर्य प्रकट हुआ। उसके मुख से इंद्र और अग्नि देव उत्पन्न हुए तथा उसके प्राणों से वायु देव का प्राकट्य हुआ।

श्लोक14

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ १४ ॥

Nābhyā āsīd-antarikṣaṁ śīrṣṇo dyauḥ samavartata | Padbhyāṁ bhūmir-diśaḥ śrotrāt-tathā lokāam-akalpayan || 14 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

उसकी नाभि से अंतरिक्ष लोक प्रकट हुआ, उसके सिर से द्युलोक (स्वर्ग) उत्पन्न हुआ, उसके चरणों से पृथ्वी तथा उसके कानों से समस्त दिशाएं प्रकट हुईं। इस प्रकार ऋषियों ने संपूर्ण लोकों की रचना की।

श्लोक15

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ १५ ॥

Saptāsyāsan paridhayas-triḥ sapta samidhaḥ kṛtāḥ | Devā yad-yajñaṁ tanvānā abadhnan puruṣaṁ paśum || 15 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

इस सृष्टि-यज्ञ में सात समुद्र सात परिधियां बने, इक्कीस (२१) तत्व तीन गुना सात समिधाएं बने, जब देवताओं ने यज्ञ का विस्तार करते हुए उस विराट पुरुष को ही यज्ञीय हवि के रूप में समर्पित किया।

श्लोक16

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ १६ ॥

Yajñena yajñam-ayajanta devās-tāni dharmāṇi prathamāny-āsan | Te ha nākaṁ mahimānaḥ sacanta yatra pūrve sādhyāḥ santi devāḥ || 16 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

देवताओं ने इस यज्ञ द्वारा ही यज्ञस्वरूप परमेश्वर का यजन किया। वे ही सृष्टि के सर्वप्रथम सनातन धर्म (विधान) बने। वे महिमामयी साधक उस परम स्वर्गलोक (परमधाम) को प्राप्त होते हैं जहां पुरातन साध्य और दिव्य देवता निवास करते हैं।

फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)

जो साधक पुरुष सूक्त का नित्य श्रवण अथवा पाठ करता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।

नित्य पाठ करें और आत्मिक शांति प्राप्त करें

हमारे डिजिटल नाम जाप काउंटर से अपने मंत्र जप और साधना को ट्रैक करें।

डिजिटल नाम जाप शुरू करें

अन्य कल्याणकारी स्तोत्र

अपनी नित्य पूजा और साधना के लिए अन्य पावन स्तोत्रों का पाठ करें।