Bhakti Voice
भगवती दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी)21 श्लोक

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (अयि गिरिनन्दिनि) — आदि शंकराचार्य कृत २१ श्लोक, हिंदी अर्थ एवं नवरात्रि पाठ

The Mahishasura Mardini Stotram (महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्), popularly known by its opening phrase 'Aigiri Nandini' (अयि गिरिनन्दिनि), is an ecstatic 21-verse hymn composed by Jagadguru Adi Shankaracharya celebrating Goddess Durga's glorious triumph over the demon Mahishasura. Its rhythmic tempo mirrors the cosmic battlefield where the Divine Mother rides Her lion, severing the roots of ignorance, ego, and despair. Chanting it awakens vibrant female cosmic energy (Shakti), dispels deep-seated sorrow, and fills the home with unyielding courage.

दृश्य:
base
रचयिता / ऋषिआदि शंकराचार्य
मूल शास्त्र / स्रोतदेवी माहात्म्य / मार्कण्डेय पुराण
शुभ दिन व समयमंगलवार, शुक्रवार, अष्टमी, नवमी एवं नवरात्र
कुल श्लोक संख्या21 श्लोक

दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर

सुझाव: नित्य 1 recitation with energetic vocal rhythm पाठ करें। प्रत्येक पाठ के बाद 'गिनें' पर टैप करें।

पाठ संख्या0
ॐ

॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥

पाठ से पूर्व ध्यान

विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् । हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥

Vidyud-dāma-sama-prabhāṁ mṛga-pati-skandha-sthitāṁ bhīṣaṇāṁ Kanyābhiḥ karavāla-kheṭa-vilasad-dhastābhir-āsevitām | Hastaiś-cakra-gadāsi-kheṭa-viśikhāṁś-cāpaṁ guṇaṁ tarjanīṁ Bibhrāṇām-analātmikāṁ śaśi-dharāṁ durgāṁ trinetrāṁ bhaje ||

भावार्थ:

जिनकी कांति बिजली की माला के समान देदीप्यमान है, जो सिंह के कंधों पर विराजमान हैं, जिनका स्वरूप भयंकर है, तलवार और ढाल लिए हुए कन्याएं जिनकी सेवा कर रही हैं, जो अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किए हुए हैं, अग्नि स्वरूपा, मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाली, त्रिनेत्रधारी भगवती दुर्गा का मैं भजन करता हूं।

श्लोक1

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दसुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

Ayi giri-nandini nandita-medini viśva-vinodini nanda-sute Giri-vara-vindhya-śiro'dhi-nivāsini viṣṇu-vilāsini jiṣṇu-nute | Bhagavati he śitikaṇṭha-kuṭumbini bhūri-kuṭumbini bhūri-kṛte Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 1 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री! संपूर्ण पृथ्वी को आनंदित करने वाली, समस्त ब्रह्मांड को अपनी लीला से हर्षित करने वाली, नंदबाबा की कन्या के रूप में अवतरित! विंध्याचल के शिखर पर निवास करने वाली, भगवान विष्णु को आह्लादित करने वाली, इंद्र द्वारा स्तुति की गई! हे भगवान शिव की अर्धांगिनी, संपूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करने वाले विराट कुटुंब वाली, हे सुंदर जटाओं वाली महिषासुरमर्दिनी शैलपुत्री! आपकी नित्य जय हो, जय हो!

श्लोक2

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते । दनुजकदर्शिणि दुर्मदशोषिणि दुष्टनिरोषिणि दितिसुतरुषे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

Sura-vara-varṣiṇi durdhara-dharṣiṇi durmukha-marṣiṇi harṣa-rate Tribhuvana-poṣiṇi śaṅkara-toṣiṇi kilbiṣa-moṣiṇi ghoṣa-rate | Danuja-kadarśiṇi durmada-śoṣiṇi duṣṭa-niroṣiṇi diti-suta-ruṣe Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 2 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

देवताओं पर वरदानों की वर्षा करने वाली, दुर्धर्ष दैत्यों का दमन करने वाली, दुर्मुख आदि राक्षसों को दंडित करने वाली, आनंद में मग्न रहने वाली! तीनों लोकों का पोषण करने वाली, भगवान शंकर को संतुष्ट करने वाली, पापों को हरने वाली और विजय-घोष से गुंजायमान! राक्षसों को प्रताड़ित करने वाली, उनके अहंकार को सुखा देने वाली, हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी नित्य जय हो!

श्लोक3

अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्डमृगाधिपते । निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

Ayi śata-khaṇḍa-vikhaṇḍita-ruṇḍa-vituṇḍita-śuṇḍa-gajādhipate Ripu-gaja-gaṇḍa-vidāraṇa-caṇḍa-parākrama-śuṇḍa-mṛgādhipate | Nija-bhuja-daṇḍa-nipātita-khaṇḍa-vipātita-muṇḍa-bhaṭādhipate Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 3 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

शत्रुओं के मतवाले हाथियों की सूंडों और शरीरों को सैकड़ों टुकड़ों में काट डालने वाली, अपने सिंह की भयंकर गर्जना से शत्रु-गजराजों के कुंभस्थल को विदीर्ण करने वाली, अपनी शक्तिशाली भुजाओं के प्रहार से दैत्य सेनापतियों के सिर काटने वाली, हे महिषासुरमर्दिनी, सुंदर जटाधारिणी शैलपुत्री! आपकी जय हो!

श्लोक4

अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते । दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

Ayi raṇa-durmada-śatru-vadhodita-durdhara-nirjara-śakti-bhṛte Catura-vicāra-dhurīṇa-mahā-śiva-dūta-kṛta-pramathādhipate | Durita-durīha-durāśaya-durmati-dānava-dūta-kṛtānta-mate Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 4 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

युद्ध में उन्मत्त असुरों के संहार हेतु समस्त देव-शक्तियों को धारण करने वाली, परम चतुर देवाधिदेव शिव को अपना दूत बनाकर भेजने वाली, दुष्ट विचार वाले दानव दूतों के लिए साक्षात यमराज बनने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक5

अयि शरणागतवैरिवधूबरवीरवराभयदायकरे त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिकशूलोत्कृतशूलकरे । दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहोमुखरीकृतदिङ्निकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

Ayi śaraṇāgata-vairi-vadhū-vara-vīra-varābhaya-dāya-kare Tribhuvana-mastaka-śūla-virodhika-śūlotkṛta-śūla-kare | Dumi-dumitāmara-dundubhi-nāda-maho-mukharī-kṛta-diṅ-nikare Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 5 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

शरण में आए शत्रुओं की पत्नियों और वीरों को भी अभयदान देने वाले हाथों वाली, तीनों लोकों को पीड़ा देने वाले दुष्टों के वध हेतु हाथ में त्रिशूल धारण करने वाली, देव-दुंदुभियों की 'दुमि-दुमि' ध्वनि से दिशाओं को गुंजायमान करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक6

अयि निजहुंकृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते । शिवशिवशुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

Ayi nija-huṅkṛti-mātra-nirākṛta-dhūmra-vilocana-dhūmra-śate Samara-viśoṣita-śoṇita-bīja-samudbhava-śoṇita-bīja-late | Śiva-śiva-śumbha-niśumbha-mahāhava-tarpita-bhūta-piśāca-rate Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 6 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

केवल अपनी एक 'हुंकार' मात्र से धूम्रलोचन दैत्य और उसकी विशाल सेना को भस्म करने वाली, युद्ध में रक्तबीज के रक्त की प्रत्येक बूंद को सुखाकर उसका संहार करने वाली, शुंभ-निशुंभ के महायुद्ध में भूत-पिशाचों को तृप्त करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक7

धनुरनुसङ्गरणक्षणसङ्गपरस्फुरदङ्गनटत्कटके कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गवसद्भटशृङ्गहताबटुके । कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

Dhanur-anusaṅga-raṇa-kṣaṇa-saṅga-parasphurad-aṅga-naṭat-kaṭake Kanaka-piśaṅga-pṛṣatka-niṣaṅga-vasad-bhaṭa-śṛṅga-hatābaṭuke | Kṛta-caturaṅga-bala-kṣiti-raṅga-ghaṭad-bahu-raṅga-raṭad-baṭuke Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 7 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ाते समय जिनकी कलाइयों के कंगन रणभूमि में झनझना उठते हैं, तरकश से निकले स्वर्ण-बाणों से असुर वीरों के शिरोभाग को भेदने वाली, रणभूमि रूपी रंगमंच पर चतुरंगिणी सेना का संहार करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक8

अयि बहुलद्युतिमिञ्जितचाकचकत्कुचकुम्भपटीररुचे सुरललताततिसङ्गतसङ्करसम्मदसम्मतमन्दगते । धृतसितपुष्करमण्डनखण्डितचण्डकरद्युतिसारवपुः जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

Ayi bahula-dyuti-miñjita-cākacakat-kuca-kumbha-paṭīra-ruce Sura-lalatāti-saṅgata-saṅgara-sammada-sammata-manda-gate | Dhṛta-sita-puṣkara-maṇḍana-khaṇḍita-caṇḍa-kara-dyuti-sāra-vapuḥ Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 8 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

चंदन के लेप से सुशोभित देदीप्यमान रूप वाली, देवांगनाओं द्वारा गाए जाने वाले गीतों के बीच मंद-मंथल राजहंस की चाल चलने वाली, श्वेत कमलों से अलंकृत और करोड़ों सूर्यों के तेज को भी लजाने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक9

जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते भण भण भञ्जितशिञ्जितनूपुरसिञ्चितमोहितभूतपते । नटितनटार्धनटीनटनाटकनाटितनाट्यरसे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

Jaya jaya japya-jaye jaya-śabda-parastuti-tatpara-viśva-nute Bhaṇa bhaṇa bhañjita-śiñjita-nūpura-siñcita-mohita-bhūta-pate | Naṭita-naṭārdha-naṭī-naṭanāṭaka-nāṭita-nāṭya-rase Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 9 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे जपने योग्य विजयस्वरूपा! संपूर्ण ब्रह्मांड द्वारा 'जय-जय' शब्दों से स्तुति की जाने वाली, चरणों के घुंघरुओं की 'झण-झण' ध्वनि से देवाधिदेव शिव को मुग्ध करने वाली, अर्धनारीश्वर रूप में नटराज के साथ दिव्य नृत्य का रस रचने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक10

अयि सुमनःसुमनःसुमनःसुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

Ayi sumanaḥ-sumanaḥ-sumanaḥ-sumanaḥ-sumanohara-kānti-yute Śrita-rajanī-rajanī-rajanī-rajanī-rajanī-kara-vaktra-vṛte | Sunayana-vibhramara-bhramara-bhramara-bhramara-bhramarādhipate Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 10 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

देवताओं के सुंदर मन को हरने वाली अनुपम कांति से युक्त, पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सौम्य व शीतल मुखमंडल वाली, भंवरों के समान काले और चंचल सुंदर नेत्रों वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक11

सहितमहाहवमल्लमथल्लिकमल्लितरल्लकमल्लरते विरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते । शितकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवपादयुगे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

Sahita-mahāhava-malla-mathallika-mallita-rallaka-malla-rate Viracita-vallika-pallika-mallika-jhillika-bhillika-varga-vṛte | Śita-kṛta-phulla-samullasitāruṇa-tallaja-pallava-pāda-yuge Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 11 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

महायुद्ध में आए बलवान असुर मल्ल-योद्धाओं को सहज ही पराजित करने वाली, वन की लताओं और भील-कन्याओं से घिरी रहने वाली, खिले हुए लाल कमल के समान कोमल और अरुण चरणकमलों वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक12

अविरलगण्डगलन्मदमेदुरमत्तमत्तङ्गजराजपते त्रिभुवनभूषणभूतकलानिधिरूपपयोनिधिराजसुते । अयि सुदतीजनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

Avirala-gaṇḍa-galan-mada-medura-matta-mataṅgaja-rāja-pate Tribhuvana-bhūṣaṇa-bhūta-kalā-nidhi-rūpa-payonidhi-rāja-sute | Ayi sudatī-jana-lālasa-mānasa-mohana-manmatha-rāja-sute Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 12 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

मदजल बहाते हुए मतवाले ऐरावत गजराज पर शोभा पाने वाली, तीनों लोकों के आभूषण रूप क्षीरसागर की राजपुत्री महालक्ष्मी स्वरूपा, मन को मोहने वाले कामदेव के गर्व को भी चूर करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक13

कमलदलामलकोमलकान्तिकलाकलितामलभालतले सकलविलासकलानिलयक्रमकेलिचलत्कलहंसकुले । अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डलमौलिलसद्धटितालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

Kamala-dalāmala-komala-kānti-kalā-kalitāmala-bhāla-tale Sakala-vilāsa-kalā-nilaya-krama-keli-calat-kala-haṁsa-kule | Ali-kula-saṅkula-kuvalaya-maṇḍala-mauli-lasad-ghaṭitāli-kule Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 13 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

कमल की पंखुड़ी जैसी निर्मल, कोमल और कांतिमान ललाट वाली, समस्त ललित कलाओं की स्वामिनी और हंसों के समान मोहक चाल चलने वाली, भौंरों से घिरे नीले कमलों जैसे केशों वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक14

करमुरलीरववीजितकूजितकोकिलमञ्जुलमञ्जुमते मिलितपुलिन्दमनोहरगुञ्जितरञ्जितशैलनिकुञ्जगते । निजगुणभूतमनोज्ञशतामृतवर्षिणि संशितशोकनुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

Kara-muralī-rava-vījita-kūjita-kokila-mañjula-mañju-mate Milita-pulinda-manohara-guñjita-rañjita-śaila-nikuñja-gate | Nija-guṇa-bhūta-manojña-śatāmṛta-varṣiṇi saṁśita-śoka-nute Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 14 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हाथ में बंसी की मीठी धुन से कोयल को भी लजाने वाली, पर्वत की कुंजों में भील-जनों को आनंदित करने वाली, अपने सद्गुणों से सैकड़ों अमृत की वर्षा करने वाली और समस्त दुःखों को हरने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक15

कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचन्द्ररुचे प्रणतसुरासुरमौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे । जितकनकाचलमौलिसदोर्जितनिर्भरकुञ्जरकुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

Kaṭi-taṭa-pīta-dukūla-vicitra-mayūkha-tiraskṛta-candra-ruce Praṇata-surāsura-mauli-maṇi-sphurad-aṁśu-lasann-akha-candra-ruce | Jita-kanakācala-mauli-sadorjita-nirbhara-kuñjara-kumbha-kuce Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 15 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

कमर में बंधी पीतांबरी की स्वर्णिम किरणों से चंद्रमा की चमक को भी मात देने वाली, नतमस्तक देव-दानवों के मुकुट-रत्नों से जिनके चरण-नखों की चंद्रिका चमक उठती है, सुमेरु पर्वत जैसी अडिग गरिमा वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक16

विजितसहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकरैकनुते कृतसुरतारकसङ्गरतारकसङ्गरतारकसूनुसुते । सुरथसमाधिसमानसमाधिसमाधिसमाधिसुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

Vijita-sahasra-karaika-sahasra-karaika-sahasra-karaika-nute Kṛta-sura-tāraka-saṅgara-tāraka-saṅgara-tāraka-sūnu-sute | Suratha-samādhi-samāna-samādhi-samādhi-samādhi-sujāta-rate Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 16 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हजारों सूर्यों के तेज को जीतने वाली, सहस्रों देव-करकमलों द्वारा पूजित, तारकासुर के संहारक कार्तिकेय की माता, राजा सुरथ और वैश्य समाधि को परम आत्मज्ञान और मोक्ष प्रदान करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक17

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

Pada-kamalaṁ karuṇā-nilaye varivasyati yo'nudinaṁ suśive Ayi kamale kamalā-nilaye kamalā-nilayaḥ sa kathaṁ na bhavet | Tava padam-eva param-padam-ity-anuśīlayato mama kiṁ na śive Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 17 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे करुणामयी शिवे! जो भक्त आपके पावन चरणकमलों की प्रतिदिन सेवा करता है, वह स्वयं लक्ष्मी का स्थायी निवास (धनवान व सौभाग्यशाली) क्यों न हो जाए? और जो आपके चरणों को ही परमपद मानता है, उसे समस्त कल्याण क्यों न प्राप्त हों?

श्लोक18

कनकविचित्रकलानिधिवक्त्रलसद्विमलालिकुलादरिते पदनखचन्द्रकिरणपरिमण्डलमण्डितपादयुगे । जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

Kanaka-vicitra-kalā-nidhi-vaktra-lasad-vimalāli-kulādarite Pada-nakha-candra-kiraṇa-parimaṇḍala-maṇḍita-pāda-yuge | Jaya jaya japya-jaye jaya-śabda-parastuti-tatpara-viśva-nute Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 18 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

स्वर्ण के समान मनोहर और चंद्रमा जैसी निर्मल मुखकांति वाली, जिनके पावन चरणों के नखों से चंद्र-किरणों का दिव्य मंडल फूटता है, जो 'जय-जय' मंत्रोच्चार से संपूर्ण जगत द्वारा पूजित हैं, हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!

श्लोक19

कमलानिलये कमले कमनीयकलानिलये कुरु मयि कृपां सकलं दुरितं दलयन् जननी मम पाहि सदा शरणागतकम् । भवसागरतारिणि मातस्त्वमेव गतिर्मम पारमपारपदं जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

Kamalā-nilaye kamale kamanīya-kalā-nilaye kuru mayi kṛpāṁ Sakalaṁ duritaṁ dalayan jananī mama pāhi sadā śaraṇāgatam | Bhava-sāgara-tāriṇi mātas-tvam-eva gatir-mama pāram-apāra-padaṁ Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 19 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे कमलालया! समस्त कलाओं की स्वामिनी! मुझ पर अपनी करुणा कीजिए। मेरे सारे पापों व कष्टों को नष्ट कर मुझ शरणागत की सदा रक्षा कीजिए। हे भवसागर से पार उतारने वाली माता! आप ही मेरी एकमात्र परम गति हैं!

श्लोक20

अयि मयि दीनदयालुदये कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुरुतासि मयि । यदचितं यदयुक्तमिदं ननु तत्त्वमपाकरुरुद्यतये जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

Ayi mayi dīna-dayālu-daye kṛpayaiva tvayā bhavitavyam-ume Ayi jagato jananī kṛpayāsi yathāsi tathā-nurutāsi mayi | Yad-acitaṁ yad-ayuktam-idaṁ nanu tat-tvam-apākurur-udyataye Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 20 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

हे उमा! दीनों पर दया बरसाने वाली! आप मुझ पर कृपा कीजिए। आप संपूर्ण जगत की माता हैं, अपनी स्वाभाविक करुणा से मुझे संभालिए। मुझसे जो भी भूल या अयोग्यता हुई हो, उसे क्षमा कर मेरा उद्धार कीजिए!

श्लोक21

तव विमलेन्दुकुलं वदनं दमलं कलयन्ननुशीलयति किमु पुरुहूतपुरन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमु न क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

Tava vimalendu-kulaṁ vadanaṁ damalaṁ kalayan-nanuśīlayati Kimu puruhūta-purandu-mukhī sumukhībhir-asau vimukhī-kriyate | Mama tu mataṁ śiva-nāma-dhane bhavatī kṛpayā kimu na kriyate Jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute || 21 ||

सरल हिंदी भावार्थ:

शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान आपके पावन मुखमंडल का जो ध्यान करता है, क्या वह स्वर्ग की अप्सराओं के मोहजाल में कभी फंसेगा? कदापि नहीं! हे शिवप्रिया! आपका कृपापात्र भक्त संसार के समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है। हे महिषासुरमर्दिनी, सुंदर जटाधारिणी शैलपुत्री! आपकी सदा-सदा जय हो!

फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)

जो भक्त नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह जीवन के हर क्षेत्र में विजयी होता है और अंत में मां भगवती के पावन चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

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