बजरंग बाण — गोस्वामी तुलसीदास कृत, सम्पूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ, कड़े नियम एवं लाभ
The Bajrang Baan (बजरंग बाण) is an intensely powerful Awadhi hymn attributed to Goswami Tulsidas that acts as an infallible spiritual arrow (Baan) of Lord Hanuman. Unlike the gentle, nurturing devotional tone of the Hanuman Chalisa, the Bajrang Baan is an emergency spiritual weapon invoked when an individual is trapped in severe crises, surrounded by malevolent occult energies (Tantra/Buri Nazar), haunted by inexplicable terrors, or battling insurmountable adversity. Because it invokes Lord Hanuman through solemn oaths of Lord Rama and Mother Sita, it must be recited with absolute purity, humility, and strict discipline.
दैनिक पाठ एवं माला ट्रैकर
सुझाव: नित्य 1, 3, or 7 times during critical distress पाठ करें। प्रत्येक पाठ के बाद 'गिनें' पर टैप करें।
॥ ध्यानम् (प्रार्थना) ॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
Mano-javaṁ māruta-tulya-vegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham | Vātātmajaṁ vānara-yūtha-mukhyaṁ śrī-rāma-dūtaṁ śaraṇaṁ prapadye ||
मन के समान तीव्र गति वाले, वायु के समान वेगवान, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को पूर्णतः वश में कर लिया है, बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानर सेना के प्रमुख और भगवान श्री राम के परम दूत श्री हनुमान जी के चरणों में मैं शरण लेता हूं।
॥ दोहा ॥ निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान । तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥
|| Dohā || Niścaya prema pratīti te, binaya karaiṁ sanamāna | Tehi ke kāraja sakala śubha, siddha karaiṁ hanumāna ||
जो मनुष्य दृढ़ विश्वास, प्रगाढ़ प्रेम और आदर-सत्कार के साथ श्री हनुमान जी से प्रार्थना करता है, उसके समस्त शुभ और कल्याणकारी कार्यों को स्वयं श्री हनुमान जी सिद्ध करते हैं।
॥ चौपाई ॥ जय हनुमंत संत हितकारी । सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥ जन के काज बिलंब न कीजै । आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥
|| Chaupāī || Jaya hanumanta santa hitakārī | Suni lījai prabhu araja hamārī || Jana ke kāja bilamba na kījai | Ātura dauri mahā sukha dījai ||
हे संतों और सज्जनों का कल्याण करने वाले हनुमान जी! आपकी जय हो। हे प्रभु, मेरी विनम्र प्रार्थना सुन लीजिए। अपने सेवक के कार्य को सिद्ध करने में तनिक भी विलंब न कीजिए और शीघ्र दौड़कर मुझे परम सुख प्रदान कीजिए।
जैसे कूदि सिंधु महिपारा । सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥ आगे जाइ लंकिनी रोकी । मारेहु लात गई सुरलोकी ॥
Jaise kūdi sindhu mahipārā | Surasā badana paiṭhi bistārā || Āge jāi laṅkinī rokī | Mārehu lāta gaī suralokī ||
जिस प्रकार आपने छलांग लगाकर विशाल समुद्र को पार कर लिया था, सुरसा के मुख में प्रवेश कर अपनी बुद्धि से बाहर निकल आए थे, और आगे लंका की रक्षिका लंकिनी ने जब आपको रोका तो एक ही प्रहार से उसे परास्त कर दिया था...
जाय विभीषन को सुख दीन्हा । सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥ बाग उजारि सिंधु महँ बोरा । अति आतुर जमकातर तोरा ॥
Jāya vibhīṣana ko sukha dīnhā | Sītā nirakhi paramapada līnhā || Bāga ujāri sindhu mahañ borā | Ati ātura jamakātara torā ||
लंका में जाकर विभीषण को सुख प्रदान किया, माता सीता के दर्शन कर परम सौभाग्य प्राप्त किया, अशोक वाटिका को तहस-नहस किया और रावण के दूतों का मानमर्दन किया...
इन्हिं बान सौं मारु तिन्हें तुम । जो जन को दुख देहिं निरंतर ॥ उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई । पाँय परौं कर जोरि मनाई ॥
Inhiṁ bāna sauṁ māru tinheṁ tuma | Jo jana ko dukha dehiṁ nirantara || Uṭhu uṭhu calu tohi rāma duhāī | Pāñya parauṁ kara jori manāī ||
हे वीर हनुमान! अपने इसी अमोघ बाण से उन दुष्टों और बाधाओं का संहार कीजिए जो आपके भक्त को निरंतर कष्ट दे रहे हैं। मैं हाथ जोड़कर आपके चरणों में शीश झुकाता हूं, आपको प्रभु श्री राम की दुहाई है, शीघ्र उठकर चलिए और रक्षा कीजिए!
जनकसुता हरि धूप दिजावै । ताके काज बिलम्ब न लावै ॥ जै जै जै कपि केसरी नन्दन । तेहि के काज संवारहु बन्दन ॥ ६ ॥
Janaka-sutā hari dhūpa dijāvai | Tāke kāja bilamba na lāvai || Jai jai jai kapi kesarī nandana | Tehi ke kāja saṁvārahu bandana || 6 ||
जो भक्त माता जानकी और प्रभु श्रीराम के नाम से धूप-दीप जलाकर आपकी स्तुति करे, उसके कार्यों को सिद्ध करने में तनिक भी देर न लगाएं। हे केसरीनंदन कपिराज! आपकी जय-जयकार हो, अपने दास के कार्यों को सुधारें।
अंजनि पूत पवनसुत नामा । तव बल लखि कांपै यम धामा ॥ जय जय जय धुनि होत अकाशा । सुमिरत होत दुसह दुख नाशा ॥ ७ ॥
Añjani pūta pavana-suta nāmā | Tava bala lakhi kāṁpai yama dhāmā || Jaya jaya jaya dhuni hota akāśā | Sumirata hota dusaha dukha nāśā || 7 ||
माता अंजनी के पुत्र और पवनसुत आपके नाम हैं। आपके असीम बल को देखकर यमलोक भी थर-थर कांपता है। आकाश में आपकी जय-जयकार की ध्वनि गूंजती है, और आपका स्मरण करते ही असहनीय दुःखों का नाश हो जाता है।
चरण शरण कर जोरि मनावौं । यहि अवसर केहि काज गोहरावौं ॥ उठु उठु चलु तोहिं राम दोहाई । पांय परौं कर जोरि मनाई ॥ ८ ॥
Caraṇa śaraṇa kara jori manāvauṁ | Yahi avasara kehi kāja goharāvauṁ || Uṭhu uṭhu calu tohiṁ rāma dohāī | Pāṁya parauṁ kara jori manāī || 8 ||
हाथ जोड़कर मैं आपके चरणों की शरण में प्रार्थना करता हूं। इस विपत्ति के समय मैं किसे पुकारूं? हे हनुमान जी! आपको प्रभु श्रीराम की सौगंध है, उठिए और संकट दूर करने चलिए; मैं हाथ जोड़कर आपके पैरों पड़ता हूं।
ओम चं चं चं चपला चलन्ता । ओम हनु हनु हनु हनुमन्ता ॥ ओम हं हं हांक देत कपि चंचल । ओम सं सं सहमि पराने खल-दल ॥ ९ ॥
Om caṁ caṁ caṁ capalā calantā | Om hanu hanu hanu hanumantā || Om haṁ haṁ hāṁka deta kapi cañcala | Om saṁ saṁ sahami parāne khala-dala || 9 ||
बिजली के समान तीव्र गति से चलने वाले हे हनुमान जी! हुंकार भरते हुए शत्रुओं का संहार कीजिए। आपकी गर्जना सुनते ही समस्त दुष्ट, दानव और पिशाच भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं।
अपने जन को तुरत उबारहु । सुमिरत होय आनंद हमारहु ॥ यह बजरंग बाण जेहि मारे । ताहि कहौ फिरि कवन उबारे ॥ १० ॥
Apane jana ko turata ubārahu | Sumirata hoya ānanda hamārahu || Yaha bajaranga bāṇa jehi māre | Tāhi kahau phiri kavana ubāre || 10 ||
अपने इस सेवक को संकट से तुरंत उबारिए; आपके स्मरण से हमारे हृदय में परमानंद छा जाता है। आपके इस 'बजरंग बाण' का प्रहार जिस दुष्ट पर हो जाए, फिर संसार में उसे कौन बचा सकता है?
पाठ करै बजरंग बाण की । हनुमत रक्षा करैं प्रान की ॥ डीठि मूठि टोना अरु टाना । भूत प्रेत सब मिटै बिलाना ॥ ११ ॥
Pāṭha karai bajaranga bāṇa kī | Hanumata rakṣaiṁ prāna kī || Ḍīṭhi mūṭhi ṭonā aru ṭānā | Bhūta preta saba miṭai bilānā || 11 ||
जो मनुष्य इस बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी स्वयं उसके प्राणों की रक्षा करते हैं। बुरी नजर, तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका, भूत-प्रेत और सब प्रकार की नकारात्मक शक्तियां तत्काल नष्ट हो जाती हैं।
भक्ति भाव करि जो जन ध्यावै । ताके कारज सकल सुहावै ॥ पुत्र पौत्र धन धान्य बढ़ावै । निश्चय सुख सम्पति घर आवै ॥ १२ ॥
Bhakti bhāva kari jo jana dhyāvai | Tāke kāraja sakala suhāvai || Putra pautra dhana dhānya baṛhāvai | Niścaya sukha sampati ghara āvai || 12 ||
जो मनुष्य शुद्ध भक्तिभाव से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसके समस्त कार्य सिद्ध और सुंदर हो जाते हैं। उसके कुल में पुत्र-पौत्र, धन-धान्य की वृद्धि होती है और घर में सुख-संपत्ति का वास होता है।
शत्रु शमन अरु विपति निवारा । सदा करैं कपिराज सहारा ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ १३ ॥
Śatru śamana aru vipati nivārā | Sadā karaiṁ kapi-rāja sahārā || Saṅkaṭa kaṭai miṭai saba pīrā | Jo sumirai hanumata bala-bīrā || 13 ||
कपिराज हनुमान जी शत्रुओं का शमन करते हैं और समस्त विपत्तियों का निवारण करते हैं। जो कोई महावीर बलवान हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ाएं मिट जाती हैं।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै । आरती करि कपि के गुण गावै ॥ सो नर पावै परम अनन्दा । काटैं फंद सकल कपि चन्दा ॥ १४ ॥
Dhūpa dīpa naivedya caṛhāvai | Āratī kari kapi ke guṇa gāvai || So nara pāvai parama anandā | Kāṭaiṁ phanda sakala kapi candā || 14 ||
जो भक्त धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर आरती करते हुए कपिराज के गुणों का गान करता है, वह मनुष्य परमानंद को प्राप्त करता है और हनुमान जी उसके समस्त सांसारिक बंधनों को काट देते हैं।
भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥ नाशै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ १५ ॥
Bhūta piśāca nikaṭa nahiṁ āvai | Mahābīra jaba nāma sunāvai || Nāśai roga harai saba pīrā | Japata nirantara hanumata bīrā || 15 ||
महावीर हनुमान जी का नाम जहां सुनाया जाता है, वहां भूत-पिशाच निकट भी नहीं फटक सकते। वीर हनुमान जी के नाम का निरंतर जप करने से समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं और सारी पीड़ाएं हर ली जाती हैं।
दोहा : प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान । तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीबजरंग बाण सम्पूर्णम् ॥
Dohā : Prema pratītihi kapi bhajai, sadā dharai ura dhyāna | Tehi ke kāraja sakala śubha, siddha karaiṁ hanumāna || 16 || || Iti Śrī Bajaranga Bāṇa Sampūrṇam ||
दोधे का भावार्थ: जो मनुष्य प्रेम और पूर्ण विश्वास के साथ हनुमान जी का भजन करता है और हृदय में उनका ध्यान धरता है, उसके समस्त शुभ कार्यों को स्वयं श्री हनुमान जी सिद्ध कर देते हैं। इस प्रकार बजरंग बाण संपूर्ण हुआ।
फलश्रुति (शास्त्रोक्त फल)
जो भक्त सत्य, निष्ठा और समर्पण के साथ संकट काल में बजरंग बाण का आश्रय लेता है, स्वयं पवनपुत्र हनुमान उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं और उसके समस्त कष्टों को हर लेते हैं।
नित्य पाठ करें और आत्मिक शांति प्राप्त करें
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अन्य कल्याणकारी स्तोत्र
अपनी नित्य पूजा और साधना के लिए अन्य पावन स्तोत्रों का पाठ करें।
