दैनिक चौघड़िया, शुभ ग्रह होरा, अभिजित मुहूर्त, विवाह मुहूर्त, गृह प्रवेश, संपत्ति व वाहन क्रय के सटीक एवं शास्त्रोक्त मुहूर्त। 100% प्रामाणिक दृक सिद्धान्त गणना।
आज के प्रमुख काल एवं मुहूर्त
Delhi (Delhi) • मंगलवार, 22 सितंबर 2026
दृक गणित सम्मत
परम शुभ काल
अभिजित मुहूर्त
06:19 AM – 07:08 AM
सभी मांगलिक कार्यों एवं विजय प्राप्ति हेतु श्रेष्ठ।
अमृत वेला
अमृत काल
06:59 AM – 08:29 AM
आरोग्य, मंत्र सिद्धि व महत्वपूर्ण अनुष्ठान हेतु।
साधना काल
ब्रह्म मुहूर्त
11:03 PM – 11:51 PM
योग, प्राणायाम, ध्यान एवं भगवन्नाम जप के लिए।
अशुभ वेला (त्याज्य)
राहु काल
09:45 AM – 11:16 AM
नए अनुबंध, यात्रा व धन लेनदेन से परहेज करें।
दिन व रात का चौघड़िया
दिनमान और रात्रिमान को आठ बराबर भागों में बाँटकर अमृत, शुभ, लाभ, चर (शुभ) तथा रोग, काल, उद्वेग (अशुभ) वेलाओं का निर्णय। किसी भी आकस्मिक कार्य के लिए चौघड़िया सर्वोत्तम मार्गदर्शक है।
सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक २४ घंटों में प्रत्येक घंटे का आधिपत्य एक विशिष्ट ग्रह के अधीन होता है। गुरु होरा में विद्या-अध्ययन, शुक्र होरा में आभूषण व कला, तथा सूर्य होरा में सरकारी कार्य सिद्ध होते हैं।
शास्त्र सम्मत त्रिबल शुद्धि (सूर्य, चंद्र, गुरु बल), बाण दोष रहित शुद्ध लग्न, गुरु-शुक्र अस्त काल (तारा डूबना) का परिहार, और देवशयनी एकादशी से चातुर्मास के नियमों का पूर्ण पालन।
नवीन निर्मित भवन में प्रवेश (अपूर्व), पुनर्निर्मित गृह में प्रवेश (सपूर्व), तथा यात्रा उपरांत प्रवेश (द्वंद्व)। वास्तु चक्र के अनुकूल उत्तरायण काल एवं स्थिर लग्न में गृह प्रवेश परम कल्याणकारी है।
भूमि, प्लॉट, फ्लैट अथवा व्यावसायिक संपत्ति के बयाना, अनुबंध एवं रजिस्ट्री हेतु शुभ नक्षत्र (मृगशिरा, पुनर्वसु, मघा, विशाखा, अनुराधा, शतभिषा, रेवती) एवं रिक्ता तिथि परिहार।
कार, दोपहिया अथवा व्यावसायिक वाहन क्रय करने एवं शोरूम से डिलीवरी लेने हेतु शुभ चर नक्षत्र (स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा) और चंद्रमा का चतुर्थ भाव में दोषमुक्त होना।
पूर्वांचल क्षितिज पर २४ घंटे में १२ राशियों का उदय होता है जिसे 'लग्न' कहते हैं। चर, स्थिर एवं द्विस्वभाव लग्न के आधार पर कर्म की प्रकृति तय होती है। स्थिर लग्न दीर्घकालिक कार्यों हेतु सर्वोत्तम है।
दक्षिण भारत की अत्यंत प्रतिष्ठित पद्धति जिसमें दिन और रात को अमृत, उति, लाभ, शुभ, रोग, विषम, चोर और बंध के आठ घटकों में विभाजित किया जाता है। त्वरित यात्रा एवं महत्वपूर्ण बैठक हेतु उत्तम।
जैन दर्शन के पावन तप-त्याग नियम: नवकारशी (सूर्योदय के ४८ मिनट बाद), पोरसी (३ घंटे बाद), एकासणा, बियासणा, आयंबिल, तथा चौविहार उपवास के सूर्योदय-सूर्यास्त आधारित सटीक गणितीय समय।
प्रत्येक दिन का १/८वां भाग राहु काल कहलाता है। इसमें कोई भी शुभ कार्य, नवीन व्यापार अनुबंध या मांगलिक यात्रा नहीं की जाती। यमगण्ड में भी सावधानी रखी जाती है।
वार और विशिष्ट नक्षत्रों के दिव्य संयोग से 'सर्वार्थ सिद्धि योग' और 'अमृत सिद्धि योग' का निर्माण होता है। इन योगों में प्रारंभ किया गया कोई भी कार्य निर्विघ्न रूप से पूर्ण एवं सिद्ध होता है।
तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न की संख्याओं का योग कर ९ से भाग देने पर बचने वाले शेष से मृत्यु, अग्नि, राज, चोर और रोग पंचक का विचार किया जाता है। शून्य या शुभ शेष रहने पर 'पंचक रहित' श्रेष्ठ मुहूर्त बनता है।
वैदिक मुहूर्त शास्त्र का सम्पूर्ण वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक रहस्य — प्रामाणिक शोध
सनातन धर्म में समय केवल क्षणों का व्यतीत होना नहीं, बल्कि एक दिव्य एवं चेतन शक्ति है। हमारे ऋषियों ने आकाशमण्डल के सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों एवं ग्रहों के परिभ्रमण को देखकर काल-विज्ञान का ऐसा सूक्ष्म गणित रचा, जो सहस्रों वर्षों से अक्षुण्ण है।
१. मुहूर्त के पाँच अनिवार्य स्तम्भ (पंचांग शुद्धि)
मुहूर्त निर्णय में पंचांग के पाँच अंगों का विचार सर्वोपरि होता है:
तिथि शुद्धि: रिक्ता तिथियों (४, ९, १४) का त्याग कर नंदा (१, ६, ११), भद्रा (२, ७, १२), जया (३, ८, १३), और पूर्णा (५, १०, १५) का चयन।
वार शुद्धि: सौम्य ग्रहों (चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र) के वारों का अधिकांश संस्कारों में चयन, तथा क्रूर वारों (मंगल, शनि) का विशेष कार्यों में उपयोग।
नक्षत्र शुद्धि: साधक के जन्म नक्षत्र से अनुकूल ताराबल (संपत, क्षेम, साधन, मित्र, परम मित्र) का मिलान।
योग शुद्धि: २७ योगों में से अशुभ योगों (विष्कम्भ, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ, वैधृति) के त्याज्य अंशों का परिहार।
करण शुद्धि: भद्रा (विष्टि करण) का पूर्ण परिहार, जिसमें कोई भी मांगलिक कार्य सर्वथा वर्जित माना गया है।
२. अभिजित मुहूर्त — भगवान विष्णु का सर्वदोषहर्ता चक्र
महर्षि वसिष्ठ का वचन है कि यदि किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए उपयुक्त लग्न या तिथि न मिल पा रही हो, तो मध्याह्न काल में अभिजित मुहूर्त में कार्य प्रारंभ किया जा सकता है। यह कालखंड आकाश के केंद्र में सूर्य के स्थित होने पर बनता है और सभी सामान्य दिशाशूल व ग्रह दोषों का शमन कर देता है।
शुभ मुहूर्त से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Frequently asked questions
मुहूर्त क्या है और इसका दैनिक जीवन में क्या महत्व है?
वैदिक काल गणना में ४८ मिनट की कालावधि को एक 'मुहूर्त' कहा जाता है (दिन और रात में कुल ३० मुहूर्त होते हैं)। किसी भी महत्वपूर्ण कार्य, संस्कार अथवा व्यावसायिक यात्रा को ब्रह्मांडीय अनुकूलता के क्षण में आरंभ करने से विघ्न टलते हैं और अभीष्ट सफलता मिलती है।
चौघड़िया में कौन-से समय शुभ और कौन-से त्याज्य माने गए हैं?
चौघड़िया के सात प्रकारों में 'अमृत' (सर्वोत्तम), 'शुभ' (मांगलिक), 'लाभ' (व्यापारिक उन्नति), और 'चर' (यात्रा व गतिशीलता) को शुभ माना गया है। जबकि 'रोग', 'काल' और 'उद्वेग' को अशुभ मानकर इन अवधियों में नए कार्यों का आरंभ त्याज्य कहा गया है।
अभिजित मुहूर्त को सर्वदोष निवारक क्यों माना गया है?
अभिजित मुहूर्त प्रतिदिन मध्याह्न काल के लगभग २४ मिनट पूर्व से २४ मिनट पश्चात् तक (सूर्य के उच्चतम बिंदु पर) रहता है। इसे भगवान श्रीहरि विष्णु के सुदर्शन चक्र का सुरक्षा कवच प्राप्त है, जिससे अधिकांश सामान्य ग्रह-दोष स्वतः शांत हो जाते हैं।
विवाह एवं गृह प्रवेश मुहूर्त में त्रिबल शुद्धि क्या है?
वर-वधू के लिए सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति का गोचर में अनुकूल होना 'त्रिबल शुद्धि' कहलाता है। सूर्य से आत्मबल, चन्द्र से मानसिक शांति, और गुरु से दांपत्य व संतति का सुख सिद्ध होता है।