Bhakti Voice
Sacred ghats and temples

सनातन व्रत, उपवास एवं पारण निर्देशिका 2026

सभी २४ एकादशी, सटीक पारण समय, प्रदोष व्रत, संकष्टी चतुर्थी, पूर्णिमा, अमावस्या, नवरात्रि एवं वैदिक उपवास विधान। 100% प्रामाणिक शास्त्र सम्मत जानकारी।

आज की तिथि एवं सक्रिय व्रत वेला

Delhi (Delhi) • Dwadashi (shukla पक्ष)

शुद्ध वैदिक पंचांग
दैनिक तिथि

द्वादशी

पक्ष: शुक्ल पक्ष

सूर्योदय व चंद्रास्त

सूर्योदय: 12:39 AM

सूर्यास्त: 12:46 PM

मास संवत

भाद्रपद मास

विक्रम संवत 2083

आगामी महापर्व

एकादशी / प्रदोष व्रत

सम्पूर्ण पर्व सूची →

२४ एकादशी व्रत एवं पारण समय

प्रत्येक पक्ष की ११वीं तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित एकादशी व्रत। निर्जला, मोक्षदा, देवशयनी, देवप्रबोधिनी सहित सभी २४ एकादशियों के सटीक तिथिकाल एवं द्वादशी पारण समय का पालन अनिवार्य है।

श्रीहरि विष्णु उपासनाएकादशी तिथियाँ →

प्रदोष व्रत (त्रयोदशी शिव पूजा)

प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की त्रयोदशी को प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा। सोम प्रदोष, भौम प्रदोष और शनि प्रदोष का विशेष फल माना गया है।

प्रदोष काल व्यापिनी पूजाप्रदोष तिथियाँ →

संकष्टी चतुर्थी (चंद्रोदय गणेश व्रत)

कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विघ्नहर्ता भगवान गणेश का व्रत। रात्रि में चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने के पश्चात ही व्रत खोला जाता है। मंगलवार को पड़ने वाली अंगारकी चतुर्थी महापुण्यदायी होती है।

चंद्रोदय समय अनिवार्यसंकष्टी तिथियाँ →

मासिक शिवरात्रि व्रत विधान

प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को निशीथ काल (मध्यरात्रि) में भगवान शिव की आराधना। महाशिवरात्रि के समान ही प्रत्येक माह की शिवरात्रि आत्म-शुद्धि एवं मोक्ष प्रदायिनी है।

निशीथ काल पूजाशिवरात्रि तिथियाँ →

पूर्णिमा व्रत एवं सत्यनारायण कथा

शुक्ल पक्ष की १५वीं तिथि पूर्णिमा पर श्री सत्यनारायण भगवान की पावन कथा, पंचामृत भोग, और सायं काल चंद्रमा को अर्घ्य। यह व्रत परिवार में शांति, समृद्धि और आरोग्य की वृद्धि करता है।

पूर्ण चंद्र दर्शन व अर्घ्यपूर्णिमा तिथियाँ →

अमावस्या एवं पितृ तर्पण श्राद्ध

कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या पर पूर्वजों (पितृगण) की शांति हेतु तिल-जल तर्पण, पिंडदान एवं ब्राह्मण भोजन। सोमवती अमावस्या और मौनी अमावस्या का स्नान-दान अत्यंत फलदायी है।

पितृ दोष निवारणअमावस्या तिथियाँ →

रोहिणी व्रत एवं जैन पच्चक्खाण

जैन समुदाय में रोहिणी नक्षत्र के उदय पर भगवान वासुपूज्य स्वामी की आराधना और पूर्ण उपवास। दांपत्य जीवन की रक्षा, पति की दीर्घायु और आत्मिक शांति के लिए यह व्रत अत्यंत आदरणीय है।

रोहिणी नक्षत्र उदयरोहिणी तिथियाँ →

व्रत फलाहार एवं सात्विक आहार नियम

उपवास में शरीर और मन को हल्का रखने के लिए सात्विक फलाहार के नियम: कूटू, मखाना, फल, दूध और सेंधा नमक। तामसिक भोज्य पदार्थों (अन्न, मैदा, साधारण नमक, लहसुन) का सर्वथा निषेध।

सात्विक आहार विज्ञानआहार ज्ञान पढ़ें →

सनातन व्रत-उपवास का आध्यात्मिक एवं खगोलीय विज्ञान — सम्पूर्ण संहिता

सनातन धर्म में 'उपवास' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: 'उप' + 'वास' अर्थात् ईश्वर के निकट वास करना। केवल अन्न का परित्याग कर देना व्रत नहीं है, अपितु अपनी इंद्रियों, मन और वाणी को संयमित कर परम चेतना में स्थिर करना ही सच्चा तप है।

१. एकादशी और मानवीय शरीर-विज्ञान (चंद्र कला प्रभाव)

आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के जल एवं महासागरों में ज्वार-भाटा उत्पन्न करता है। मानवीय शरीर में भी ७०% से अधिक जल तत्व है। एकादशी तिथि (पूर्णिमा और अमावस्या से ४ दिन पूर्व) पर हमारे शरीर का जल संतुलन संवेदनशील होता है। इस दिन उपवास रखने से पाचन तंत्र को पूर्ण विश्राम मिलता है, शरीर से विषाक्त तत्व (Toxins) निष्कासित होते हैं, और मस्तिष्क में सत्व गुण की वृद्धि होती है।

२. पारण के सूक्ष्म नियम (द्वादशी पारण)

पद्म पुराण में स्पष्ट निर्देश है कि एकादशी का पारण सदैव सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पूर्व करना चाहिए। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए, तो सूर्योदय के ठीक बाद पारण किया जाता है। हरिवासर (द्वादशी का प्रथम चौथाई भाग) के समय पारण करने से व्रत का फल निष्फल हो जाता है, अतः हरिवासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

सनातन व्रत व उपवास से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

Frequently asked questions

एकादशी व्रत में 'पारण समय' का क्या महत्व है?

शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब द्वादशी तिथि के भीतर और सूर्योदय के बाद शुद्ध काल में पारण (व्रत खोलना) किया जाए। यदि द्वादशी के प्रथम चरण में 'हरिवासर' लगा हो, तो उस समय पारण सर्वथा वर्जित होता है।

प्रदोष व्रत किस समय संपन्न किया जाता है?

प्रदोष व्रत प्रत्येक माह के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इसकी मुख्य पूजा सूर्यास्त के लगभग ४५ मिनट पूर्व से ४५ मिनट पश्चात् (प्रदोष काल) में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती व अभिषेक के साथ की जाती है।

संकष्टी चतुर्थी में चंद्रमा को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

संकष्टी चतुर्थी भगवान श्री गणेश के विघ्नविनाशक स्वरूप को समर्पित है। रात्रि में चंद्रोदय के समय कच्चे दूध, दुर्वा और जल से चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है।

व्रत के दौरान फलाहार के क्या शास्त्रीय नियम हैं?

व्रत में अन्न, दालें, प्याज, लहसुन, और साधारण समुद्री नमक वर्जित होते हैं। कूटू, सिंघाड़ा, साबूदाना, मखाना, ताजे फल, दूध, दही और सेंधा नमक (रॉक साल्ट) का उपयोग शास्त्र सम्मत माना गया है।