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भद्रा कब है — आज की भद्रा स्थिति व समय सारणी

आज भद्रा कब से कब तक है? जानें भद्रा वास (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल), मुख एवं पुच्छ समय तथा रक्षाबंधन के विशेष शास्त्रीय नियम।

वर्तमान भद्रा स्थितिभद्रा सक्रिय है (पाताल लोक)

भद्रा वास: पाताल लोक

भद्रा वर्तमान में सक्रिय अवश्य है, किंतु इसका वास पाताल लोक में है। शास्त्रीय मतानुसार पृथ्वी के कार्यों पर इसका दोष न्यून रहता है।

भद्रा आरंभ
4:03 am
भद्रा समाप्ति
4:03 pm
भद्रा पुच्छ (पुच्छ काल)
2:51 pm - 4:03 pm
भद्रा मुख (वर्जित)
4:03 am - 6:03 am

भद्रा वास का शास्त्रीय नियम (स्वर्ग, पृथ्वी एवं पाताल)

मुहूर्त चिंतामणि अनुसार चंद्रमा की राशि तय करती है कि भद्रा का वास किस लोक में है

1. स्वर्ग लोक वास (शुभ)

मेष, वृषभ, मिथुन, वृश्चिक

जब चंद्रमा इन राशियों में होता है, तो भद्रा स्वर्ग में निवास करती है। इसका विष स्वर्ग में ही रहता है, अतः पृथ्वी पर किए जाने वाले सभी शुभ व मांगलिक कार्य निर्दोष माने जाते हैं।

2. पृथ्वी लोक वास (अति अशुभ)

कर्क, सिंह, कन्या, तुला

जब चंद्रमा इन राशियों में होता है, तो भद्रा मृत्युलोक (पृथ्वी) पर निवास करती है। यह सर्वाधिक अमंगलकारी अवस्था है। इसमें राखी बांधना, होलिका दहन, विवाह व गृह प्रवेश सर्वथा वर्जित हैं।

3. पाताल लोक वास (धनप्रद)

धनु, मकर, कुंभ, मीन

जब चंद्रमा इन राशियों में होता है, तो भद्रा पाताल में रहती है। पाताल वासिनी भद्रा पृथ्वी वासियों के लिए धन-धान्य की वृद्धि एवं व्यापारिक सौदों में विजय प्रदान करने वाली कही गई है।

भद्रा मुख एवं भद्रा पुच्छ का रहस्य

भद्रा के मुख भाग में समस्त विघ्न और विनाश का वास होता है, अतः मुख काल (आरंभ की 5 घटियां) में कोई भी कार्य करना सर्वनाशकारी माना गया है। इसके विपरीत भद्रा के पुच्छ भाग (अंतिम 3 घटियां) में विजय और सिद्धि का वास होता है। अपरिहार्य परिस्थितियों में भद्रा पुच्छ काल में शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

रक्षाबंधन एवं होलिका दहन में भद्रा का महत्व

पौराणिक मान्यता है कि लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा ने भद्रा काल में ही रावण को रक्षासूत्र बांधा था, जिससे रावण के कुल का विनाश हुआ। इसलिए रक्षाबंधन पर भद्रा समाप्ति के उपरांत ही राखी बांधी जाती है। इसी प्रकार फाल्गुन पूर्णिमा को प्रदोष काल में भद्रा रहित समय में ही होलिका दहन का विधान है।

भद्रा से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भद्रा कौन हैं और वैदिक ज्योतिष में इसका क्या महत्व है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा भगवान सूर्यदेव और माता छाया की पुत्री तथा शनिदेव की सगी बहन हैं। ज्योतिष में 'विष्टि करण' को ही भद्रा कहा जाता है। अपने उग्र स्वभाव के कारण भद्रा काल में शुभ व मांगलिक कार्य सर्वथा वर्जित माने गए हैं।

भद्रा वास क्या होता है और इसका पृथ्वी पर क्या असर पड़ता है?

चंद्रमा की राशि के अनुसार भद्रा का वास तीन लोकों में होता है: 1. स्वर्ग लोक (मेष, वृषभ, मिथुन, वृश्चिक) — पृथ्वी पर शुभ; 2. पाताल लोक (धनु, मकर, कुंभ, मीन) — व्यापार व धन हेतु लाभप्रद; 3. मृत्युलोक / पृथ्वी (कर्क, सिंह, कन्या, तुला) — अत्यंत घातक व अशुभ, जिसमें समस्त मांगलिक कार्य वर्जित हैं।

क्या भद्रा पुच्छ काल में शुभ कार्य किया जा सकता है?

हां। अत्यंत अपरिहार्य स्थिति में यदि कोई कार्य टालना संभव न हो, तो भद्रा के पुच्छ भाग (अंतिम 3 घटियों) में कार्य संपन्न किया जा सकता है। परंतु भद्रा मुख काल (आरंभ की 5 घटियां) में कार्य करने से सर्वनाश का भय रहता है।