दक्षिण भारतीय कृष्ण मठ
उडुपी श्री कृष्ण मठ गाइड: कनक की खिड़की से दर्शन, अष्ट मठ और अन्नदान

- Deity
- कडगोलु कृष्ण (मथनी लिए बालकृष्ण)
- Location
- कार स्ट्रीट, उडुपी, कर्नाटक
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कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में स्थित उडुपी श्री कृष्ण मठ द्वैत वेदांत दर्शन का प्रमुख केंद्र है, जिसकी स्थापना 13वीं शताब्दी में जगद्गुरु मध्वाचार्य जी ने की थी। इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां भगवान के सीधे दर्शन नहीं होते, बल्कि 9 छेदों वाली 'कनकन किंडी' (खिड़की) से दर्शन किए जाते हैं। यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं को निःशुल्क स्वादिष्ट सात्विक अन्नदान कराया जाता है।
History
13वीं सदी में जगद्गुरु मध्वाचार्य ने मालपे तट पर तूफान में फंसे एक जहाज की रक्षा की। व्यापारी ने कृतज्ञता में गोपीचंदन की शिला भेंट की, जिसमें से भगवान कृष्ण का यह पावन विग्रह प्रकट हुआ, जिसे द्वापर युग में देवी रुक्मिणी ने पूजा था।
Architecture
तुलुनाडु पारंपरिक काष्ठ एवं पत्थर स्थापत्य। मध्य में पवित्र मध्व सरोवर और मुख्य मंदिर के ऊपर स्वर्ण कलश व नक्काशीदार चांदी की कनकन किंडी स्थापित है।
Best time
अक्टूबर से मार्च का समय सबसे अच्छा है। सम वर्षों में 18 जनवरी को आयोजित होने वाला 'पर्याय उत्सव' अत्यंत भव्य होता है।
Timings
दर्शन प्रातः 05:00 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक निरंतर सुलभ रहते हैं। दोपहर में 11:45 से 02:00 बजे तक महापूजा व भव्य महाप्रसाद भोजन होता है।
Darshan
गर्भगृह के आंतरिक प्रांगण में प्रवेश के लिए पुरुषों को शर्ट/बनियान उतारना आवश्यक है। यहां दैनिक निःशुल्क महाप्रसाद भोजन अवश्य ग्रहण करें।
How to reach
उडुपी रेलवे स्टेशन मंदिर से 4 किमी दूर है। निकटतम हवाई अड्डा मंगलुरु (58 किमी) है, जहां से सीधी टैक्सी और बसें चलती हैं।
Nearby
- अनंतेश्वर शिव मंदिर
- चंद्रमौलेश्वर मंदिर
- मालपे बीच
- सेंट मैरी द्वीप
- आनेगुद्दे विनायक मंदिर
Frequently asked questions
उडुपी में खिड़की (कनकन किंडी) से दर्शन करने का क्या कारण है?
संत कनकदास को जब मंदिर में प्रवेश नहीं मिला, तब वे दीवार के पीछे बैठकर भक्तिभाव से गाने लगे। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह स्वयं पश्चिम की ओर घूम गया और दीवार में दरार बनाकर दर्शन दिए।
उडुपी का 'पर्याय महोत्सव' क्या है?
प्रत्येक दो वर्ष में जनवरी माह में आयोजित होने वाला यह भव्य उत्सव है, जिसमें मध्वाचार्य जी द्वारा स्थापित 8 मठों के मठाधीशों के बीच पूजा का दायित्व चक्रानुक्रम में सौंपा जाता है।
