प्राचीन गौड़ीय कृष्ण मंदिर
राधा रमण मंदिर वृंदावन दर्शन गाइड: 500 वर्ष पुरानी अखंड अग्नि, रहस्य और सेवा

- Deity
- श्री राधा रमण देव जी
- Location
- राधा रमण घेरा, निधिवन के समीप, वृंदावन, उत्तर प्रदेश
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वृंदावन स्थित श्री राधा रमण मंदिर षड्-गोस्वामियों द्वारा स्थापित सप्त देवालयों में सबसे पावन और अखंड परंपरा वाला धाम है। यहां भगवान श्रीकृष्ण 'राधा रमण' के रूप में विराजते हैं। यह दिव्य विग्रह सन् 1542 की वैशाख पूर्णिमा को श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के अनन्य प्रेम से एक दामोदर शालिग्राम शिला से स्वतः प्रकट हुआ था। यहां राधा रानी का अलग विग्रह नहीं है, बल्कि प्रभु के बाईं ओर उनका पवित्र मुकुट विराजित रहता है।
History
चैतन्य महाप्रभु के प्रिय शिष्य श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी जी नेपाल की गंडकी नदी से 12 शालिग्राम शिलाएं लाए थे। उनकी उत्कट भक्ति से प्रसन्न होकर एक दामोदर शिला सन् 1542 में स्वयं त्रिभंग ललित मुद्रा वाले राधा रमण विग्रह में रूपांतरित हो गई।
Architecture
पारंपरिक ब्रज स्थापत्य शैली में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित। यहां लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं होता; केवल शास्त्रीय ध्रुपद और अष्टछाप पदों के गायन से सेवा होती है।
Best time
अक्टूबर से मार्च का समय सर्वोत्तम है। वैशाख पूर्णिमा (मई) को होने वाला प्राकट्य महोत्सव अत्यंत दिव्य और दर्शनीय होता है।
Timings
प्रातः कालीन दर्शन: सुबह 08:00 से दोपहर 12:30 बजे तक (राजभोग आरती 12:15 पर); सांध्य दर्शन: सायं 06:00 से रात्रि 09:30 बजे तक।
Darshan
मंदिर में शांति बनाए रखें। गर्भगृह की फोटो खींचना सख्त मना है। शालीन व पारंपरिक वस्त्र पहनकर दर्शन करें।
How to reach
वृंदावन के पुराने क्षेत्र में निधिवन के समीप स्थित है। मथुरा जंक्शन से ई-रिक्शा द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
Nearby
- निधिवन
- राधा दामोदर मंदिर
- राधा गोकुलानंद मंदिर
- गोपेश्वर महादेव मंदिर
- शाहजी मंदिर
Frequently asked questions
राधा रमण जी की रसोई की अखंड अग्नि का क्या रहस्य है?
मंदिर की रसोई में जल रही अग्नि को 480 से अधिक वर्ष पूर्व गोपाल भट्ट गोस्वामी जी ने पवित्र अरणि-मंथन (वैदिक मंत्रों) द्वारा प्रकट किया था। यह पावन अग्नि आज तक निरंतर प्रज्वलित है और यहां कभी माचिस का प्रयोग नहीं होता।
राधा रमण जी के साथ राधा रानी का अलग विग्रह क्यों नहीं है?
यह विग्रह युगल स्वरूप का साक्षात प्रकटीकरण है, इसलिए राधा जी के प्रतीक रूप में उनके मुकुट और पट्टिका की पूजा प्रभु के पार्श्व में की जाती है।
