माता लक्ष्मी उत्सव
वरलक्ष्मी व्रत संपूर्ण गाइड: कलश अलंकरण, रक्षा सूत्र बंधन एवं अष्टलक्ष्मी पूजन विधि
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भक्ति वॉइस
यह व्रत श्रावण पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार को रखा जाता है।
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वरलक्ष्मी व्रतम दक्षिण भारत (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक एवं तमिलनाडु) की महिलाओं द्वारा अत्यंत निष्ठा से किया जाने वाला पावन व्रत है। यह व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार को रखा जाता है। 'वरलक्ष्मी' का अर्थ है वरदान देने वाली माता महालक्ष्मी। मान्यता है कि इस एक व्रत को करने से अष्टलक्ष्मी (धन, धान्य, संतान, विजय, विद्या, ऐश्वर्य, धैर्य और आदि लक्ष्मी) की सम्मिलित कृपा प्राप्त होती है और परिवार में अखंड सौभाग्य का वास होता है।
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Frequently asked questions
वरलक्ष्मी व्रत में 'तोरम' बांधने का क्या नियम है?
हल्दी में रंगे 9 गांठों वाले पवित्र धागे (तोरम) की पूजा की जाती है और व्रत पूर्ण होने पर महिलाएं इसे अपनी दाहिनी कलाई पर धारण करती हैं।
वरलक्ष्मी कलश के भीतर क्या सामग्री डाली जाती है?
चांदी या तांबे के कलश में अक्षत, सिक्का, सुपारी, हल्दी की गांठ और सूखे मेवे भरे जाते हैं, फिर आम के पत्तों और हल्दी-सिंदूर लगे श्रीफल से कलश को सजाया जाता है।
क्या कुंवारी कन्याएं भी वरलक्ष्मी व्रत कर सकती हैं?
हां, कन्याएं सुयोग्य वर, उत्तम स्वास्थ्य और सद्बुद्धि की प्राप्ति के लिए अपनी माता के साथ यह व्रत श्रद्धापूर्वक कर सकती हैं।
