श्री कृष्ण उत्सव
श्री कृष्ण जन्माष्टमी संपूर्ण मार्गदर्शिका: पूजा विधि, व्रत नियम और पावन कथा
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भक्ति वॉइस
जन्माष्टमी की तिथि का निर्धारण स्थानीय सूर्योदय और मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र के संयोग पर निर्भर करता है।
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भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के पावन संयोग में भगवान विष्णु के आठवें पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। जन्माष्टमी अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं, मध्यरात्रि में निशिता काल में बाल गोपाल का पंचामृत अभिषेक करते हैं और माखन-मिश्री का भोग लगाकर 'हरे कृष्ण' महामंत्र का संकीर्तन करते हैं।
The story
Traditions
- पंचामृत से मध्यरात्रि में लड्डू गोपाल का दिव्य अभिषेक
- सजे हुए झूले में बाल गोपाल को विराजमान कर झूला झुलाना
- घर के मुख्य द्वार से पूजा स्थल तक बाल कृष्ण के चरण चिह्न बनाना
- छप्पन भोग और विशेष धनिए की पंजीरी का प्रसाद तैयार करना
- माखन चोरी की लीला को दर्शाने वाला दही हांडी उत्सव
Puja at home
Frequently asked questions
जन्माष्टमी पूजा का सबसे शुभ समय कौन सा होता है?
जन्माष्टमी की मुख्य पूजा मध्यरात्रि के निशिता काल में की जाती है, जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनता है।
जन्माष्टमी व्रत के मुख्य नियम क्या हैं?
भक्त दिनभर फलाहार या निर्जला व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में बाल गोपाल के जन्मोत्सव एवं आरती के पश्चात या अगले दिन पारण करते हैं।
जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को किसका भोग लगाना चाहिए?
ताजा मक्खन, मिश्री, धनिए की पंजीरी, पंचामृत और तुलसी दल युक्त पंचमेवा का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
