वैदिक एवं आध्यात्मिक महापर्व
गुरु पूर्णिमा संपूर्ण मार्गदर्शिका: महर्षि वेदव्यास जयंती, पादुका पूजन और गुरु वंदना
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यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को सूर्योदय व्यापिनी मुहूर्त में मनाया जाता है।
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आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को सनातन संस्कृति में 'गुरु पूर्णिमा' या 'व्यास पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। 'गु' का अर्थ है अंधकार और 'रु' का अर्थ है उसका निवारण करने वाला—अर्थात जो अज्ञान रूपी अंधकार से मुक्त कर ज्ञान का प्रकाश दिखाए, वही गुरु है। यह पावन दिन चारों वेदों के विभाजक, 18 पुराणों और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्मदिवस है। इस दिन साधक अपने गुरुदेव के श्रीचरणों और पादुकाओं का पूजन करते हैं, गुरु मंत्र का जप करते हैं और चार माह के चातुर्मास व्रत का संकल्प लेते हैं।
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Frequently asked questions
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसी दिन वेदों को चार भागों में विभाजित करने वाले आदिगुरु महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी का प्राकट्य हुआ था।
घर पर गुरु पादुका पूजन कैसे किया जाता है?
गुरुदेव के चित्र या काष्ठ पादुकाओं को गंगाजल से स्वच्छ कर चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें, घी का दीपक जलाकर 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु' मंत्र का जाप करें।
गुरु पूर्णिमा और चातुर्मास का क्या संबंध है?
गुरु पूर्णिमा के दिन से ही संन्यासी और साधुजन चार महीनों के लिए एक स्थान पर रहकर स्वाध्याय और ध्यान करने का 'चातुर्मास' व्रत प्रारंभ करते हैं।
