श्री कृष्ण उत्सव
गोवर्धन पूजा संपूर्ण मार्गदर्शिका: गिरिराज धारण, अन्नकूट महोत्सव एवं पूजा विधि
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दीपावली अमावस्या के ठीक अगले दिन प्रतिपदा तिथि में यह पर्व मनाया जाता है।
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दीपावली के ठीक अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को 'गोवर्धन पूजा' या 'अन्नकूट महोत्सव' मनाया जाता है। यह प्रकृति प्रेम, गोवंश के संरक्षण और भगवान श्री कृष्ण की असीम कृपा का उत्सव है। इसी दिन बाल कृष्ण ने देवराज इंद्र के अहंकार को चूर करने और ब्रजवासियों को प्रलयंकारी वर्षा से बचाने के लिए अपनी छोटी उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। श्रद्धालु अपने घरों के आंगन में गाय के गोबर से गिरिराज गोवर्धन की आकृति बनाकर उनकी परिक्रमा करते हैं और भगवान को 'छप्पन भोग' (अन्नकूट) अर्पित करते हैं।
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Frequently asked questions
गोवर्धन पूजा प्रकृति पूजा का प्रतीक कैसे है?
श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को सिखाया कि जो पर्वत, वन और नदियां हमारे पशुओं को चारा और हमें जीवन देते हैं, उनकी पूजा करना ही हमारा वास्तविक धर्म है, न कि भयवश इंद्र की पूजा करना।
पूजा में गाय के गोबर से गोवर्धन क्यों बनाया जाता है?
सनातन धर्म में गाय के गोबर को अत्यंत पवित्र और कृषि-समृद्धि का प्रतीक माना गया है। भगवान श्री कृष्ण (गोपाल) का गोवंश से अटूट प्रेम इसी से परिलक्षित होता है।
अन्नकूट में 'छप्पन भोग' का क्या अर्थ है?
भगवान कृष्ण ने 7 दिन तक बिना कुछ खाए पर्वत उठाया था। वे दिन में 8 प्रहर भोजन करते थे, इसलिए कृतज्ञ ब्रजवासियों ने (7 x 8 = 56) प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों का 'अन्नकूट' (अन्न का पहाड़) बनाकर उन्हें अर्पित किया था।
