प्रमुख सनातन पर्व
दीपावली महापर्व मार्गदर्शिका: धनतेरस से भाई दूज, लक्ष्मी-गणेश पूजन एवं वास्तु उपाय
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भक्ति वॉइस
यह पर्व कार्तिक अमावस्या को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में मनाया जाता है।
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कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला दीपावली का पावन पर्व अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का शाश्वत संदेश देता है। यह महापर्व धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक पांच दिनों तक हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन प्रदोष काल और स्थिर लग्न में माता लक्ष्मी, भगवान श्री गणेश और कुबेर देव का विधि-विधान से पूजन कर घर-आंगन को दीपों से आलोकित किया जाता है।
The story
Traditions
- शुद्ध सरसों के तेल और गाय के घी के मिट्टी के दीयों की कतारें प्रज्वलित करना
- मुख्य द्वार पर चावल के आटे और रंगों से शुभ रंगोली व स्वास्तिक बनाना
- बही-खाता, तिजोरी, स्वर्ण सिक्के और कुबेर यंत्र का विधिपूर्वक पूजन
- परिजनों और मित्रों में मिठाइयों व उपहारों का परस्पर आदान-प्रदान
- घर की मुंडेरों पर आकाशदीप लगाना और प्रकाशोत्सव मनाना
Puja at home
Frequently asked questions
दीपावली पर प्रदोष काल और स्थिर लग्न में पूजा क्यों की जाती है?
प्रदोष काल और स्थिर लग्न (जैसे वृषभ लग्न) में पूजा करने से माता लक्ष्मी का घर में स्थायी वास होता है और सुख-समृद्धि स्थिर रहती है।
दिवाली पूजा के लिए सबसे उत्तम दिशा कौन सी मानी जाती है?
पूजा की चौकी उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में स्थापित करनी चाहिए, क्योंकि उत्तर दिशा कुबेर और धन की दिशा है।
लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों आवश्यक है?
बिना सद्बुद्धि के धन का सदुपयोग संभव नहीं है। गणेश जी विवेक और बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे लक्ष्मी का सदुपयोग और स्थायित्व बना रहे।
