देवी दुर्गा एवं क्षेत्रीय उत्सव
बथुकम्मा संपूर्ण मार्गदर्शिका: प्रकृति के पुष्पों से माता गौरी की आराधना
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यह महालया अमावस्या से शुरू होकर आश्विन शुक्ल अष्टमी तक चलता है।
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बथुकम्मा तेलंगाना की महिलाओं द्वारा शारदीय नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला नौ दिवसीय एक अद्वितीय पुष्प उत्सव है। इसकी शुरुआत महालया अमावस्या (पितृ मोक्ष अमावस्या) से होती है और समापन दुर्गाष्टमी (सद्धुला बथुकम्मा) पर होता है। तेलुगु में 'बथुकम्मा' का अर्थ है 'हे माता, जीवन दो!' इस पर्व में महिलाएं औषधीय गुणों वाले रंग-बिरंगे मौसमी फूलों (जैसे गुनुगु, तंगेडु, गेंदा) को गोलाकार और शंक्वाकार रूप में सजाकर माता गौरी का स्वरूप बनाती हैं। फिर इसके चारों ओर वृत्ताकार में पारंपरिक लोकगीत गाते हुए नृत्य करती हैं।
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Frequently asked questions
बथुकम्मा की पुष्प सज्जा कैसे की जाती है?
पीतल या स्टील की थाली (तांबलम) पर फूलों को परतों में गोलाकार सजाया जाता है। यह आकार में ऊपर की ओर शंक्वाकार (गोपुरम जैसा) होता है, जिसके शिखर पर हल्दी से बनी माता गौरी (गौरीम्मा) विराजमान होती हैं।
अंतिम दिन 'सद्धुला बथुकम्मा' पर क्या होता है?
नौवें दिन (दुर्गाष्टमी पर) बहुत बड़ी और भव्य बथुकम्मा बनाई जाती हैं। महिलाएं शाम तक नृत्य करती हैं और फिर उन्हें स्थानीय तालाबों या झीलों में विसर्जित (निमर्जनम) कर देती हैं।
बथुकम्मा में विशेष जंगली फूलों का प्रयोग क्यों किया जाता है?
तंगेडु, गुनुगु और गेंदे जैसे फूलों में प्राकृतिक औषधीय और जल-शोधक (water purifying) गुण होते हैं। इन्हें झीलों में विसर्जित करने से मानसून के बाद जल स्रोत शुद्ध हो जाते हैं।
