सौभाग्य एवं व्रत उत्सव
अहोई अष्टमी संपूर्ण मार्गदर्शिका: संतान की दीर्घायु के लिए व्रत, साही माता पूजा व कथा
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भक्ति वॉइस
करवा चौथ के चार दिन बाद अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है।
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कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (दीपावली से ठीक आठ दिन पूर्व) को अहोई अष्टमी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर तारों (या चंद्र दर्शन) तक कठोर निर्जला उपवास रखती हैं। संध्या काल में गेरू से दीवार पर अहोई माता और सेह (साही) की आकृति बनाकर उनका विधि-विधान से पूजन किया जाता है। पूजा के पश्चात आकाश में तारों को अर्घ्य देकर माताएं अपना व्रत खोलती हैं।
The story
Traditions
Puja at home
Frequently asked questions
अहोई माता के साथ सेह (साही) क्यों बनाई जाती है?
कथा के अनुसार एक साहूकार की पत्नी से अनजाने में साही के बच्चों की मृत्यु हो गई थी, जिससे उसके बच्चे भी नहीं बचे। साही की सेवा और अहोई माता की कृपा से उसे अपनी संतान पुनः प्राप्त हुई। इसलिए सेह की पूजा होती है।
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे खोला जाता है?
अधिकतर माताएं संध्याकाल में तारों को देखकर और अर्घ्य देकर व्रत खोल लेती हैं। परंतु कुछ पारिवारिक परंपराओं में देर रात चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
चांदी की अहोई (स्याहु) की माला का क्या महत्व है?
माताएं चांदी की अहोई और मोतियों की माला पहनती हैं। जब भी घर में कोई संतान जन्म लेती है या विवाह होता है, तो माला में चांदी का नया मोती पिरोया जाता है, जो वंश वृद्धि का प्रतीक है।
