श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय 'सांख्ययोग' संपूर्ण गीता का प्राण और सार माना जाता है। 72 श्लोकों में समाहित यह अध्याय मनुष्य को विषाद और मोह के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के परम प्रकाश की ओर ले जाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के हृदय की दुर्बलता को दूर करते हुए अमर आत्मा (आत्म-तत्त्व) का रहस्योद्घाटन करते हैं, 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' के माध्यम से निष्काम कर्मयोग का सार्वभौमिक सिद्धांत स्थापित करते हैं और अंत में स्थितप्रज्ञ (समत्व बुद्धि वाले सिद्ध पुरुष) के दिव्य लक्षणों का वर्णन कर 'ब्राह्मी स्थिति' प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
श्लोक 2.1: शोकाकुल अर्जुन के प्रति श्रीकृष्ण का रुख
संस्कृत:
सञ्जय उवाच |
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः || १ ||
पदच्छेद व अन्वय:
सञ्जयः उवाच, तम् तथा कृपया आविष्टम् अश्रु-पूर्ण-आकुल-ईक्षणम् विषीदन्तम् इदम् वाक्यम् उवाच मधुसूदनः।
हिंदी भावार्थ:
संजय ने कहा: उस प्रकार करुणा से व्याप्त, आंसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले और शोक करते हुए अर्जुन से भगवान मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ने ये वचन कहे।
विस्तृत व्याख्या:
संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन अत्यधिक मोह और आंसुओं में डूबे हुए हैं। भगवान 'मधुसूदन' (असुरों का संहार करने वाले) अब अर्जुन के अंतर्मन में बैठे अज्ञान रूपी असुर को नष्ट करने के लिए अमृतवाणी प्रारंभ करते हैं।
श्लोक 2.2: भगवान की प्रथम डांट: 'यह कायरता कहाँ से आई?'
संस्कृत:
श्रीभगवानुवाच |
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || २ ||
पदच्छेद व अन्वय:
श्री-भगवान् उवाच, कुतः त्वा कश्मलम् इदम् विषमे समुपस्थितम् अनार्य-जुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्ति-करम् अर्जुन।
हिंदी भावार्थ:
श्रीभगवान ने कहा: हे अर्जुन! इस विषम संकट के समय तुम्हारे मन में यह मोह और दुर्बलता कहाँ से आ गई? यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य है, न स्वर्ग दिलाने वाली है और न ही कीर्ति करने वाली है।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण अर्जुन की भावुकता को सीधे 'कश्मलम्' (मानसिक मैल/अज्ञान) कहते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कर्तव्य के क्षण में पलायन करना धर्म नहीं, बल्कि अपकीर्ति और पतन का कारण है।
श्लोक 2.3: कायरता त्यागने और उठ खड़े होने का महामंत्र
संस्कृत:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || ३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
क्लैब्यम् मा स्म गमः पार्थ न एतत् त्वयि उपपद्यते क्षुद्रम् हृदय-दौर्बल्यम् त्यक्त्वा उत्तिष्ठ परन्तप।
हिंदी भावार्थ:
हे पार्थ! नपुंसकता (कायरता) को प्राप्त मत हो, यह तुम्हारे योग्य नहीं है। हे परंतप (शत्रुतापन अर्जुन)! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए उठ खड़े होओ!
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह को 'क्लैब्यम्' (नपुंसकता) और 'क्षुद्र हृदय-दौर्बल्य' कहकर झकझोरते हैं तथा उन्हें अपने क्षत्रिय स्वरूप का स्मरण कराते हुए उठने का आदेश देते हैं।
श्लोक 2.4: भीष्म और द्रोण पर बाण चलाने में अर्जुन का संकोच
संस्कृत:
अर्जुन उवाच |
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन |
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || ४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अर्जुनः उवाच, कथम् भीष्मम् अहम् सङ्ख्ये द्रोणम् च मधुसूदन इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हौ अरि-सूदन।
हिंदी भावार्थ:
अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध बाणों से कैसे युद्ध करूँ? हे अरिसूदन! वे दोनों तो मेरे परम पूजनीय हैं।
विस्तृत व्याख्या:
अर्जुन अपनी व्यथा रखते हैं कि जिन गुरुजनों और पितामह के चरणों में पुष्प अर्पित करने चाहिए, उन पर मैं तीखे बाण कैसे चला सकता हूँ।
श्लोक 2.5: गुरुजनों को मारने से भिक्षा मांगना श्रेष्ठ
संस्कृत:
गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || ५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
गुरुन् अहतवा हि महानुभावान् श्रेयः भोक्तुम् भैक्ष्यम् अपि इह लोके हत्वा अर्थ-कामान् तु गुरुन् इह एव भुञ्जीय भोगान् रुधिर-प्रदिग्धान्।
हिंदी भावार्थ:
इन महानुभाव गुरुजनों को मारने की अपेक्षा इस संसार में भिक्षा मांगकर खाना भी कहीं अधिक कल्याणकारी है। क्योंकि गुरुजनों को मारकर इस लोक में रक्त से सने हुए धन और भोगों को ही तो भोगना पड़ेगा।
विस्तृत व्याख्या:
अर्जुन कहते हैं कि पूज्य गुरुजनों की हत्या करके प्राप्त होने वाला राज्य और ऐश्वर्य लहूलुहान (रुधिरप्रदिग्ध) होगा, इससे तो भिक्षा मांगकर जीवन बिताना श्रेयस्कर है।
श्लोक 2.6: असमंजस: विजय और पराजय में क्या श्रेष्ठ?
संस्कृत:
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः |
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः || ६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
न च एतत् विद्मः कतरत् नः गरीयः यत् वा जयेम यदि वा नः जयेयुः यान् एव हत्वा न जिजीविषामः ते अवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।
हिंदी भावार्थ:
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अधिक श्रेष्ठ है—हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीवित भी नहीं रहना चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।
विस्तृत व्याख्या:
अर्जुन की निर्णय क्षमता पूर्णतः समाप्त हो चुकी है। वे समझ नहीं पा रहे कि युद्ध में जीतना अच्छा है या हार जाना, क्योंकि स्वजनों की मृत्यु के बाद जीवन निरर्थक लगता है।
श्लोक 2.7: अर्जुन का शिष्य रूप में पूर्ण आत्मसमर्पण
संस्कृत:
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः |
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || ७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
कार्पण्य-दोष-उपहत-स्वभावः पृच्छामि त्वाम् धर्म-सम्मूढ-चेताः यत् श्रेयः स्यात् निश्चितम् ब्रूहि तत् मे शिष्यः ते अहम् शाधि माम् त्वाम् प्रपन्नम्।
हिंदी भावार्थ:
कायरता रूपी दोष से मेरा स्वभाव नष्ट हो गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त भ्रमित है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि जो मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी (श्रेय) हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपके शरणागत हुए मुझको शिक्षा दीजिए।
विस्तृत व्याख्या:
यह गीता का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। अर्जुन अपने अज्ञान को स्वीकार करते हैं और श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानकर 'शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्' कहकर पूर्ण शरणागति लेते हैं।
श्लोक 2.8: त्रैलोक्य का राज्य भी मेरे शोक को नहीं मिटा सकता
संस्कृत:
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || ८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
न हि प्रपश्यामि मम अपनुद्यात् यत् शोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् अवाप्य भूमौ असपत्नम् ऋद्धम् राज्यम् सुराणाम् अपि च आधिपत्यम्।
हिंदी भावार्थ:
पृथ्वी पर निष्कंटक, धन-धान्य संपन्न राज्य पाकर अथवा देवताओं का स्वामित्व पाकर भी मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।
विस्तृत व्याख्या:
अर्जुन स्पष्ट करते हैं कि भौतिक धन, पृथ्वी का अखंड राज्य या स्वर्ग का सिंहासन भी उनके आंतरिक संताप और मानसिक अवसाद को दूर नहीं कर सकता।
श्लोक 2.9: 'मैं युद्ध नहीं करूंगा' कहकर अर्जुन का मौन होना
संस्कृत:
सञ्जय उवाच |
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः |
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || ९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
सञ्जयः उवाच, एवम् उक्त्वा हृषीकेशम् गुडाकेशः परन्तपः न योत्स्ये इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीम् बभूव ह।
हिंदी भावार्थ:
संजय ने कहा: अंतर्यामी श्रीकृष्ण से ऐसा कहकर शत्रुतापन गुड़ाकेश (अर्जुन) ने गोविंद से 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कह दिया और वे चुप हो गए।
विस्तृत व्याख्या:
अर्जुन अपनी विवशता व्यक्त करते हुए 'न योत्स्ये' (मैं युद्ध नहीं करूंगा) कहते हैं और सर्वथा मौन होकर रथ में बैठ जाते हैं।
श्लोक 2.10: श्रीकृष्ण की मंद मुस्कान और उपदेश का आरंभ
संस्कृत:
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः || १० ||
पदच्छेद व अन्वय:
तम् उवाच हृषीकेशः प्रहसन् इव भारत सेनयोः उभयोः मध्ये विषीदन्तम् इदम् वचः।
हिंदी भावार्थ:
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य में शोक करते हुए उस अर्जुन के प्रति हृषीकेश श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए यह वचन कहे।
विस्तृत व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण व्याकुल नहीं होते, बल्कि मुस्कुराते हैं ('प्रहसन्निव')। उनकी यह मुस्कान दर्शाती है कि अर्जुन का यह महान संकट मात्र एक मानसिक भ्रम है, जिसका निवारण आत्मज्ञान से तुरंत हो जाएगा।
श्लोक 2.11: ज्ञानी जन मृत या जीवित किसी के लिए शोक नहीं करते
संस्कृत:
श्रीभगवानुवाच |
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः || ११ ||
पदच्छेद व अन्वय:
श्री-भगवान् उवाच, अशोच्यान् अन्वशोचः त्वम् प्रज्ञा-वादान् च भाषसे गतासून् अगतासून् च न अनुशोचन्ति पण्डिताः।
हिंदी भावार्थ:
श्रीभगवान ने कहा: तुम न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करते हो और ज्ञानियों जैसी बातें करते हो! परंतु जो ज्ञानी (पंडित) होते हैं, वे न तो जीवितों के लिए और न ही मृतकों के लिए शोक करते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण सांख्य दर्शन का पहला सूत्र देते हैं: जो देह नाशवान है, वह शोक के योग्य नहीं; और जो आत्मा अमर है, उसका कभी विनाश नहीं होता। अतः ज्ञानी किसी भी अवस्था में शोक नहीं करते।
श्लोक 2.12: आत्मा का सनातन और शाश्वत अस्तित्व
संस्कृत:
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः |
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् || १२ ||
पदच्छेद व अन्वय:
न तु एव अहम् जातु न आसम् न त्वम् न इमे जनाधिपाः न च एव न भविष्यामः सर्वे वयम् अतः परम्।
हिंदी भावार्थ:
वास्तव में ऐसा कभी नहीं था कि मैं किसी काल में नहीं था, अथवा तुम नहीं थे, अथवा ये समस्त राजा नहीं थे; और न ही ऐसा है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण चेतना की अमरता स्थापित करते हैं। आत्मा का न कभी आदि था और न अंत। हम सभी भूतकाल में भी थे, वर्तमान में भी हैं और भविष्य में भी सदैव रहेंगे।
श्लोक 2.13: बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था और देहांतरण
संस्कृत:
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || १३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
देहिनः अस्मिन् यथा देहे कौमारम् यौवनम् जरा तथा देह-अन्तर-प्राप्तिः धीरः तत्र न मुह्यति।
हिंदी भावार्थ:
जैसे जीवात्मा की इस देह में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य देह की प्राप्ति भी होती है। धैर्यवान (धीर) पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होते।
विस्तृत व्याख्या:
जिस प्रकार बालक से युवा और वृद्ध होने पर भी 'मैं' वही रहता हूं, उसी प्रकार मृत्यु केवल पुराने वस्त्र रूपी शरीर को बदलकर नया शरीर धारण करने की स्वाभाविक क्रिया है।
श्लोक 2.14: इंद्रियों के विषय क्षणभंगुर हैं—उन्हें सहन करो
संस्कृत:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
मात्रा-स्पर्शाः तु कौन्तेय शीत-उष्ण-सुख-दुःख-दाः आगम-अपायिनः अनित्याः तान् तितिक्षस्व भारत।
हिंदी भावार्थ:
हे कुन्तीपुत्र! इंद्रियों और विषयों का संपर्क ही सर्दी-गर्मी तथा सुख-दुःख को देने वाला है। ये आने-जाने वाले और अनित्य हैं; इसलिए हे भारत! तुम इन्हें सहन करो (तितिक्षा रखो)।
विस्तृत व्याख्या:
सुख और दुःख, अनुकूलता और प्रतिकूलता इंद्रियों के बाहरी संपर्क हैं। वे स्थायी नहीं हैं। श्रीकृष्ण 'तितिक्षा' (सहनशीलता) का अभ्यास करने का उपदेश देते हैं।
श्लोक 2.15: सुख-दुःख में सम रहने वाला ही मोक्ष का अधिकारी
संस्कृत:
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ |
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || १५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यम् हि न व्यथयन्ति एते पुरुषम् पुरुष-ऋषभ सम-दुःख-सुखम् धीरम् सः अमृतत्वाय कल्पते।
हिंदी भावार्थ:
हे पुरुषों में श्रेष्ठ (अर्जुन)! सुख और दुःख में समान रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये इंद्रिय-विषय व्यथित नहीं करते, वही मोक्ष (अमृतत्व) का अधिकारी होता है।
विस्तृत व्याख्या:
समत्व योग की पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति सुख और दुःख के थपेड़ों में अपनी आंतरिक शांति नहीं खोता, वही अमरत्व (आत्म-साक्षात्कार) प्राप्त करता है।
श्लोक 2.16: असत्य का अस्तित्व नहीं, सत्य का कभी अभाव नहीं
संस्कृत:
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः |
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः || १६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
न असतः विद्यते भावः न अभावः विद्यते सतः उभयोः अपि दृष्टः अन्तः तु अनयोः तत्त्व-दर्शिभिः।
हिंदी भावार्थ:
असत्य (नाशवान देह/संसार) की कोई स्थायी सत्ता नहीं है, और सत्य (अविनाशी आत्मा) का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्वज्ञानी पुरुषों ने इन दोनों के रहस्य को भली-भांति देखा है।
विस्तृत व्याख्या:
वेदांत का परम सिद्धांत: जो परिवर्तनशील है (शरीर, संसार) वह 'असत' है; जो सदा एकरस और अपरिवर्तनीय है (आत्मा) वह 'सत' है।
श्लोक 2.17: संपूर्ण जगत में व्याप्त चेतना अविनाशी है
संस्कृत:
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति || १७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अविनाशि तु तत् विद्धि येन सर्वम् इदम् ततम् विनाशम् अव्ययस्य अस्य न कश्चित् कर्तुम् अर्हति।
हिंदी भावार्थ:
जिससे यह संपूर्ण दृश्य-जगत व्याप्त है, उसे तुम अविनाशी जानो। इस अविनाशी तत्त्व का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
विस्तृत व्याख्या:
परमात्मा और आत्मा समस्त ब्रह्मांड के कण-कण में चेतना रूप से व्याप्त हैं। इसे न कोई अस्त्र नष्ट कर सकता है और न कोई काल।
श्लोक 2.18: शरीर नाशवान है, आत्मा अमर है—अतः युद्ध करो
संस्कृत:
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः |
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत || १८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अन्तवन्तः इमे देहाः नित्यस्य उक्ताः शरीरिणः अनाशिनः अप्रमेयस्य तस्मात् युध्यस्व भारत।
हिंदी भावार्थ:
इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (माप-रहित) जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारतवंशी अर्जुन! तुम युद्ध करो।
विस्तृत व्याख्या:
शरीर का अंत निश्चित है, परंतु देह के भीतर का चैतन्य 'अप्रमेय' (अनंत) है। आत्मा की अमरता को समझकर अर्जुन को अपने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध का आदेश दिया जाता है।
श्लोक 2.19: आत्मा न किसी को मारती है, न मारी जाती है
संस्कृत:
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || १९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यः एनम् वेत्ति हन्तारम् यः च एनम् मन्यते हतम् उभौ तौ न विजानीतः न अयम् हन्ति न हन्यते।
हिंदी भावार्थ:
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं; क्योंकि यह आत्मा न किसी को मारती है और न किसी के द्वारा मारी जाती है।
विस्तृत व्याख्या:
आत्मा अकर्ता और अभोक्ता साक्षी चैतन्य है। जन्म और मरण केवल स्थूल शरीर का धर्म है, आत्मा का नहीं।
श्लोक 2.20: आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है
संस्कृत:
न जायते म्रियते वा कदाचि-न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे || २० ||
पदच्छेद व अन्वय:
न जायते म्रियते वा कदाचित् न अयम् भूत्वा भविता वा न भूयः अजः नित्यः शाश्वतः अयम् पुराणः न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
हिंदी भावार्थ:
यह आत्मा किसी काल में भी न जन्म लेती है और न मरती है; और न यह उत्पन्न होकर फिर अभाव को प्राप्त होती है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक उपनिषदों का महामंत्र है। आत्मा षड्-विकारों (जन्म, स्थिति, वृद्धि, परिणाम, अपक्षय, मृत्यु) से सर्वथा परे है।
श्लोक 2.21: आत्मज्ञानी पुरुष किसे और कैसे मार सकता है?
संस्कृत:
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || २१ ||
पदच्छेद व अन्वय:
वेद अविनाशिनम् नित्यम् यः एनम् अजम् अव्ययम् कथम् सः पुरुषः पार्थ कम् घातयति हन्ति कम्।
हिंदी भावार्थ:
हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और किसको मारता है?
विस्तृत व्याख्या:
आत्मज्ञान हो जाने पर कर्तापन का अहंकार समाप्त हो जाता है। ज्ञानी जानता है कि चेतना का कोई हनन नहीं कर सकता।
श्लोक 2.22: पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करना
संस्कृत:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही || २२ ||
पदच्छेद व अन्वय:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरः अपराणि तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देही।
हिंदी भावार्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।
विस्तृत व्याख्या:
पुनर्जन्म का सबसे सुंदर दृष्टांत। जैसे हम प्रतिदिन पुराने कपड़े बदलकर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा अपनी यात्रा में एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है।
श्लोक 2.23: शस्त्र इसे काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती
संस्कृत:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः || २३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
न एनम् छिन्दन्ति शस्त्राणि न एनम् दहति पावकः न च एनम् क्लेदयन्ति आपः न शोषयति मारुतः।
हिंदी भावार्थ:
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको अग्नि जला नहीं सकती, इसको जल गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
विस्तृत व्याख्या:
प्रकृति के चारों विनाशकारी तत्व (शस्त्र, अग्नि, जल, वायु) स्थूल पदार्थों को नष्ट कर सकते हैं, परंतु आत्मा इनसे अत्यंत सूक्ष्म और अगोचर है।
श्लोक 2.24: आत्मा अखंड, सर्वव्यापी, स्थिर और अचल है
संस्कृत:
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः || २४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम् अक्लेद्यः अशोष्यः एव च नित्यः सर्व-गतः स्थाणुः अचलः अयम् सनातनः।
हिंदी भावार्थ:
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य है (जलाई नहीं जा सकती), अक्लेद्य है (गीली नहीं की जा सकती) और अशोष्य है (सुखाई नहीं जा सकती)। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
विस्तृत व्याख्या:
आत्मा की अखंडता का संपूर्ण विवरण: यह सर्वत्र विद्यमान, अचल और अनादि काल से अपरिवर्तित रहने वाला परम तत्त्व है।
श्लोक 2.25: आत्मा अव्यक्त, अचिंत्य और अविकारी है
संस्कृत:
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || २५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम् अविकार्यः अयम् उच्यते तस्मात् एवम् विदित्वा एनम् न अनुशोचितुम् अर्हसि।
हिंदी भावार्थ:
यह आत्मा अव्यक्त (इंद्रियों से परे), अचिंत्य (मन की कल्पना से परे) और अविकारी (परिवर्तनरहित) कही जाती है। इसलिए हे अर्जुन! इस आत्मा को ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
विस्तृत व्याख्या:
आत्मा बुद्धि का विषय नहीं, बल्कि बुद्धि को जानने वाली स्वयं साक्षी चेतना है। इसे जानकर शोक का कोई कारण नहीं रह जाता।
श्लोक 2.26: यदि इसे नित्य जन्मने-मरने वाला भी मानो, तब भी शोक व्यर्थ
संस्कृत:
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || २६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अथ च एनम् नित्य-जातम् नित्यम् वा मन्यसे मृतम् तथापि त्वम् महा-बाहो न एवम् शोचितुम् अर्हसि।
हिंदी भावार्थ:
और यदि तुम इस आत्मा को सदा जन्म लेने वाली तथा सदा मरने वाली भी मानते हो, तो भी हे महाबाहु! तुम्हें इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है।
विस्तृत व्याख्या:
यदि भौतिकवादी दृष्टि से भी सोचें कि शरीर के साथ ही जीवन शुरू और समाप्त होता है, तब भी यह प्राकृतिक नियम है, जिस पर रोना व्यर्थ है।
श्लोक 2.27: जन्म लेने वाले की मृत्यु और मरने वाले का जन्म निश्चित है
संस्कृत:
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || २७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
जातस्य हि ध्रुवः मृत्युः ध्रुवम् जन्म मृतस्य च तस्मात् अपरिहार्ये अर्थे न त्वम् शोचितुम् अर्हसि।
हिंदी भावार्थ:
क्योंकि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है; और जो मर गया है, उसका जन्म निश्चित है। इसलिए इस अनिवार्य (अपरिहार्य) विषय पर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
विस्तृत व्याख्या:
प्रकृति का अटल नियम है: उत्पत्ति के बाद विनाश और विनाश के बाद पुनः उत्पत्ति। जो अटल और अनिवार्य है, उस पर शोक करना अज्ञानता है।
श्लोक 2.28: जीव पहले अव्यक्त थे, बीच में व्यक्त और अंत में पुनः अव्यक्त
संस्कृत:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || २८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अव्यक्त-आदीनि भूतानि व्यक्त-मध्यानि भारत अव्यक्त-निधनानि एव तत्र का परिदेवना।
हिंदी भावार्थ:
हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे, बीच में प्रकट (व्यक्त) होते हैं और मृत्यु के बाद पुनः अप्रकट हो जाते हैं; फिर ऐसी स्थिति में शोक कैसा?
विस्तृत व्याख्या:
जैसे समुद्र से लहर उठती है और पुनः समुद्र में समा जाती है, वैसे ही प्राणी प्रकृति के अव्यक्त रूप से आते हैं और वहीं विलीन हो जाते हैं।
श्लोक 2.29: आत्मा का अद्भुत और विस्मयकारी रहस्य
संस्कृत:
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः |
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || २९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
आश्चर्य-वत् पश्यति कश्चित् एनम् आश्चर्य-वत् वदति तथा एव च अन्यः आश्चर्य-वत् च एनम् अन्यः शृणोति श्रुत्वा अपि एनम् वेद न च एव कश्चित्।
हिंदी भावार्थ:
कोई इस आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता है, कोई इसका आश्चर्य की भांति वर्णन करता है, कोई इसे आश्चर्य की भांति सुनता है; और कोई तो सुनकर भी इसे नहीं जान पाता।
विस्तृत व्याख्या:
आत्मज्ञान अत्यंत गूढ़ और विस्मयकारी है। केवल शब्दों से इसे नहीं समझा जा सकता, इसका स्वयं के भीतर साक्षात्कार करना पड़ता है।
श्लोक 2.30: सर्वव्यापी आत्मा अवध्य है—अतः शोक मत करो
संस्कृत:
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || ३० ||
पदच्छेद व अन्वय:
देही नित्यम् अवध्यः अयम् देहे सर्वस्य भारत तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वम् शोचितुम् अर्हसि।
हिंदी भावार्थ:
हे भारत! सबके शरीरों में रहने वाली यह देही (आत्मा) सदा ही अवध्य (जिसका वध न किया जा सके) है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
विस्तृत व्याख्या:
सांख्य ज्ञान का उपसंहार: प्रत्येक शरीर में विराजमान आत्मा अमर है। अतः मृत्यु के भय से कर्तव्य से पीछे हटना सर्वथा अनुचित है।
श्लोक 2.31: स्वधर्म का विचार और धर्मयुद्ध का महत्व
संस्कृत:
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || ३१ ||
पदच्छेद व अन्वय:
स्व-धर्मम् अपि च अवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि धर्म्यात् हि युद्धात् श्रेयः अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।
हिंदी भावार्थ:
अपने स्वधर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण अब सामाजिक कर्तव्य (स्वधर्म) की बात करते हैं। समाज को अन्याय और अत्याचार से बचाना क्षत्रिय का परम कर्तव्य है।
श्लोक 2.32: स्वतः प्राप्त हुआ खुला स्वर्ग का द्वार
संस्कृत:
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् |
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || ३२ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यदृच्छया च उपपन्नम् स्वर्ग-द्वारम् अपावृतम् सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धम् ईदृशम्।
हिंदी भावार्थ:
हे पार्थ! अपने आप प्राप्त हुआ और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप ऐसे धर्मयुद्ध को भाग्यशाली क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
अन्याय के विरुद्ध बिना मांगे उपस्थित हुआ यह धर्मयुद्ध एक अवसर है, जो निष्ठावान क्षत्रिय को परम गति प्रदान करता है।
श्लोक 2.33: धर्मयुद्ध न करने पर स्वधर्म हानि और पाप की प्राप्ति
संस्कृत:
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि |
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || ३३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अथ चेत् त्वम् इमम् धर्म्यम् सङ्ग्रामम् न करिष्यसि ततः स्व-धर्मम् कीर्तिम् च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि।
हिंदी भावार्थ:
किंतु यदि तुम इस धर्मयुक्त संग्राम को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप के भागी बनोगे।
विस्तृत व्याख्या:
अन्याय का विरोध न करना और कायरतापूर्वक युद्धक्षेत्र छोड़ना सबसे बड़ा पाप है। इससे धर्म और यश दोनों का विनाश होता है।
श्लोक 2.34: सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बदतर
संस्कृत:
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् |
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते || ३४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अकीर्तिम् च अपि भूतानि कथयिष्यन्ति ते अव्ययाम् सम्भावितस्य च अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते।
हिंदी भावार्थ:
लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति का बखान करेंगे; और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक होती है।
विस्तृत व्याख्या:
जिस व्यक्ति ने जीवन भर मान-मर्यादा और शौर्य अर्जित किया हो, उसके लिए कायरता का कलंक मृत्यु से भी भयानक होता है।
श्लोक 2.35: महारथी समझेंगे कि तुम भय के कारण भागे
संस्कृत:
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः |
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || ३५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
भयात् रणात् उपरतम् मंस्यन्ते त्वाम् महा-रथाः येषाम् च त्वम् बहु-मतः भूत्वा यास्यसि लाघवम्।
हिंदी भावार्थ:
महारथी लोग ऐसा मानेंगे कि तुम भय के मारे युद्ध से हट गए; और जिनकी दृष्टि में तुम पहले अत्यंत सम्मानित थे, उन्हीं के सामने तुम तुच्छ हो जाओगे।
विस्तृत व्याख्या:
शत्रु योद्धा तुम्हारी भावुकता को दया नहीं, बल्कि नपुंसकता और मृत्यु का भय मानेंगे, जिससे तुम्हारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी।
श्लोक 2.36: शत्रुओं के अपमानजनक वचन और असह्य दुःख
संस्कृत:
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः |
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् || ३६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अवाच्य-वादान् च बहून् वदिष्यन्ति तव अहिताः निन्दन्तः तव सामर्थ्यम् ततः दुःखतरम् नु किम्।
हिंदी भावार्थ:
तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निंदा करते हुए बहुत से न कहने योग्य (अपमानजनक) वचन कहेंगे; उससे अधिक दुःख की बात और क्या हो सकती है?
विस्तृत व्याख्या:
तुम्हारे विरोधी तुम्हारी वीरता का उपहास उड़ाएंगे। एक वीर क्षत्रिय के लिए शत्रुओं द्वारा सामर्थ्य पर उठाया गया प्रश्न सबसे बड़ा आघात है।
श्लोक 2.37: मरे तो स्वर्ग, जीते तो पृथ्वी का राज्य—अतः उठो!
संस्कृत:
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः || ३७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
हतः वा प्राप्स्यसि स्वर्गम् जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत-निश्चयः।
हिंदी भावार्थ:
यदि तुम युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और यदि जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तुम युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय करके उठ खड़े होओ।
विस्तृत व्याख्या:
धर्मयुद्ध में दोनों हाथों में लड्डू हैं: वीरगति मिली तो वीरगति/स्वर्ग और विजय मिली तो धर्मराज्य की स्थापना। किसी भी स्थिति में हानि नहीं है।
श्लोक 2.38: सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर युद्ध करो
संस्कृत:
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || ३८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
सुख-दुःखे समे कृत्वा लाभ-अलाभौ जय-अजयौ ततः युद्धाय युज्यस्व न एवम् पापम् अवाप्स्यसि।
हिंदी भावार्थ:
सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर तुम युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
विस्तृत व्याख्या:
यह कर्मयोग का प्रारंभिक सूत्र है: जब मन में फल की कामना और द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं, तब किया गया कर्तव्य कर्म मनुष्य को कभी बंधन या पाप में नहीं बांधता।
श्लोक 2.39: सांख्य से कर्मयोग (बुद्धियोग) की ओर संक्रमण
संस्कृत:
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || ३९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
एषा ते अभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिः योगे तु इमाम् शृणु बुद्ध्या युक्तः यया पार्थ कर्म-बन्धम् प्रहास्यसि।
हिंदी भावार्थ:
हे पार्थ! यह बुद्धि (ज्ञान) तुम्हारे लिए सांख्य योग के विषय में कही गई। अब तुम इसे कर्मयोग (बुद्धियोग) के विषय में सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बंधन को पूरी तरह नष्ट कर दोगे।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण ज्ञान (सांख्य) के बाद अब कर्म के विज्ञान (कर्मयोग) का उपदेश देते हैं, जिससे व्यक्ति संसार में कर्म करते हुए भी कर्मबंधनों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2.40: निष्काम कर्म में कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता
संस्कृत:
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || ४० ||
पदच्छेद व अन्वय:
न इह अभिक्रम-नाशः अस्ति प्रत्यवायः न विद्यते स्वल्पम् अपि अस्य धर्मस्य त्रायते महतः भयात्।
हिंदी भावार्थ:
इस निष्काम कर्मयोग के मार्ग में आरंभ किए गए प्रयास का नाश नहीं होता और न कोई उल्टा दोष (विपरीत फल) लगता है। इस धर्म का थोड़ा सा भी आचरण मनुष्य को जन्म-मरण के महान भय से मुक्त कर देता है।
विस्तृत व्याख्या:
सकाम कर्मों में त्रुटि होने पर दोष लगता है, परंतु निष्काम साधना का छोटा सा अंश भी आत्मा के खाते में सदा के लिए जुड़ जाता है और भय से मुक्ति दिलाता है।
श्लोक 2.41: एकाग्र निश्चयात्मिका बुद्धि बनाम अनंत शाखाओं वाली बुद्धि
संस्कृत:
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || ४१ ||
पदच्छेद व अन्वय:
व्यवसाय-आत्मिका बुद्धिः एका इह कुरु-नन्दन बहु-शाखाः हि अनन्ताः च बुद्धयः अव्यवसायिनाम्।
हिंदी भावार्थ:
हे कुरुनंदन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका (एकाग्र) बुद्धि एक ही होती है; किंतु अस्थिर और चंचल मन वालों की बुद्धियां अनंत शाखाओं वाली और बिखरी हुई होती हैं।
विस्तृत व्याख्या:
साधक का एक ही लक्ष्य होता है—आत्म-कल्याण और ईश्वर-प्राप्ति। जबकि सांसारिक कामनाओं में भटके व्यक्ति का मन हजारों इच्छाओं में खंडित रहता है।
श्लोक 2.42 व 2.43: सकाम कर्मकांडियों की दिखावटी वाणी
संस्कृत:
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः |
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः || ४२ ||
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || ४३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
याम् इमाम् पुष्पिताम् वाचम् प्रवदन्ति अविपश्चितः वेद-वाद-रताः पार्थ न अन्यत् अस्ति इति वादिनः कामात्मानः स्वर्ग-पराः जन्म-कर्म-फल-प्रदाम् क्रिया-विशेष-बहुलाम् भोग-ऐश्वर्य-गतिम् प्रति।
हिंदी भावार्थ:
हे पार्थ! जो अविवेकी मनुष्य वेदों के केवल कर्मकांड रूपी वाक्यों में प्रीति रखते हैं और कहते हैं कि इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं है; जो कामनाओं से भरे हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं तथा भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए जन्म-कर्म रूपी फल देने वाली अनेक प्रकार की क्रियाओं का बखान करते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण उन लोगों की आलोचना करते हैं जो धर्म का उपयोग केवल सांसारिक और स्वर्गीय भोगों की प्राप्ति के लिए करते हैं। यह दृष्टि आत्मज्ञान से भटकाने वाली है।
श्लोक 2.44: भोग और ऐश्वर्य में आसक्त चित्त की समाधि असंभव
संस्कृत:
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते || ४४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
भोग-ऐश्वर्य-प्रसक्तानाम् तया अपहृत-चेतसाम् व्यवसाय-आत्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।
हिंदी भावार्थ:
भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त तथा उन लुभावनी बातों से जिनका चित्त हर लिया गया है, ऐसे मनुष्यों की बुद्धि परमात्मा में एकाग्र (समाधिस्थ) नहीं हो पाती।
विस्तृत व्याख्या:
जब तक मन में भौतिक सुखों और सत्ता का आकर्षण है, तब तक चित्त में वह स्थिरता नहीं आ सकती जो आत्म-साक्षात्कार के लिए आवश्यक है।
श्लोक 2.45: तीनों गुणों से ऊपर उठो, हे अर्जुन!
संस्कृत:
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || ४५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
त्रैगुण्य-विषयाः वेदाः निस्त्रैगुण्यः भव अर्जुन निर्द्वन्द्वः नित्य-सत्त्व-स्थः निर्योग-क्षेमः आत्मवान्।
हिंदी भावार्थ:
वेद तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के कार्य रूप संसार का प्रतिपादन करने वाले हैं; हे अर्जुन! तुम तीनों गुणों से परे हो जाओ। समस्त द्वंद्वों से मुक्त, नित्य सत्व में स्थित, योग-क्षेम की चिंता से रहित और आत्मपरायण बनो।
विस्तृत व्याख्या:
श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठकर 'निर्द्वन्द्व' (सुख-दुःख से परे), 'निर्योगक्षेम' (प्राप्ति और रक्षा की चिंता से मुक्त) और 'आत्मवान' (स्वयं में स्थित) होने का आदेश देते हैं।
श्लोक 2.46: विशाल जलाशय मिलने पर कुएं की क्या आवश्यकता?
संस्कृत:
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके |
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः || ४६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यावान् अर्थः उद-पाने सर्वतः सम्प्लुत-उदके तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।
हिंदी भावार्थ:
सब ओर से परिपूर्ण विशाल जलाशय प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय (कुएं) से जितना प्रयोजन रहता है, तत्त्व को जानने वाले ब्रह्मज्ञानी का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है।
विस्तृत व्याख्या:
जैसे महासागर मिल जाने पर छोटे गड्ढे के पानी की कोई चिंता नहीं रहती, वैसे ही साक्षात परमात्मा का अनुभव हो जाने पर बाहरी कर्मकांडों की निर्भरता समाप्त हो जाती है।
श्लोक 2.47: कर्मयोग का मूल मंत्र: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते...'
संस्कृत:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || ४७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
कर्मणि एव अधिकारः ते मा फलेषु कदाचन मा कर्म-फल-हेतुः भूः मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि।
हिंदी भावार्थ:
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और न ही तुम्हारी आसक्ति अकर्म (कर्म न करने) में हो।
विस्तृत व्याख्या:
गीता का सबसे अमर श्लोक:
1. केवल कर्म पर तुम्हारा नियंत्रण है।
2. फल की चिंता में अपनी ऊर्जा व्यर्थ न करो।
3. फल की आशा से कर्म मत करो।
4. कभी आलस्य या अकर्मण्यता को मत चुनो।
श्लोक 2.48: समत्व ही योग कहलाता है
संस्कृत:
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || ४८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
योग-स्थः कुरु कर्माणि सङ्गम् त्यक्त्वा धनञ्जय सिद्धि-असिद्ध्योः समः भूत्वा समत्वम् योगः उच्यते।
हिंदी भावार्थ:
हे धनंजय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि (सफलता और असफलता) में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो। यह समत्व भाव ही 'योग' कहलाता है।
विस्तृत व्याख्या:
'समत्वं योग उच्यते'—सफलता मिले या असफलता, लाभ हो या हानि, मन की शांति को न डिगने देना ही सच्चा योग है।
श्लोक 2.49: सकाम कर्म अत्यंत निकृष्ट है
संस्कृत:
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय |
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः || ४९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
दूरेण हि अवरम् कर्म बुद्धि-योगात् धनञ्जय बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ कृपणाः फल-हेतवः।
हिंदी भावार्थ:
हे धनंजय! इस बुद्धियोग (समत्व बुद्धि) की तुलना में सकाम कर्म अत्यंत निकृष्ट (तुच्छ) है। इसलिए तुम समत्व बुद्धि की शरण लो; क्योंकि फल की इच्छा से कर्म करने वाले लोग अत्यंत दीन (कृपण) हैं।
विस्तृत व्याख्या:
केवल परिणामों की लालसा में काम करने वाले मानसिक तनाव और चिंता में जीते हैं। वे आध्यात्मिक रूप से 'कृपण' (दीन-हीन) हैं।
श्लोक 2.50: योग ही कर्मों में कुशलता है
संस्कृत:
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् || ५० ||
पदच्छेद व अन्वय:
बुद्धि-युक्तः जहाति इह उभे सुकृत-दुष्कृते तस्मात् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।
हिंदी भावार्थ:
समत्व बुद्धि से युक्त मनुष्य इस जीवन में ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है (कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है)। इसलिए तुम योग में लग जाओ; क्योंकि कर्मों में कुशलता ही 'योग' है।
विस्तृत व्याख्या:
'योगः कर्मसु कौशलम्'—कर्म को इस प्रकार कुशलता से करना कि वह चित्त पर कोई बंधन या तनाव न छोड़े, यही योग की पराकाष्ठा है।
श्लोक 2.51: कर्मफल त्याग से परम पद की प्राप्ति
संस्कृत:
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् || ५१ ||
पदच्छेद व अन्वय:
कर्म-जम् बुद्धि-युक्ताः हि फलम् त्यक्त्वा मनीषिणः जन्म-बन्ध-विनिर्मुक्ताः पदम् गच्छन्ति अनामयम्।
हिंदी भावार्थ:
क्योंकि समत्व बुद्धि से युक्त ज्ञानी जन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल का त्याग करके जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और परम कल्याणमय (निरामय) पद को प्राप्त करते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
जब कर्मों के फल की आसक्ति छूट जाती है, तो जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और जीव 'अनामय' (समस्त दुःखों से रहित) मोक्ष पद प्राप्त करता है।
श्लोक 2.52: मोह के दलदल को पार करने पर वैराग्य की प्राप्ति
संस्कृत:
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति |
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || ५२ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यदा ते मोह-कलिलम् बुद्धिः व्यतितरिष्यति तदा गन्ता असि निर्वेदम् श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।
हिंदी भावार्थ:
जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पूरी तरह पार कर जाएगी, तब तुम सुनने योग्य और सुने हुए समस्त सांसारिक व स्वर्गीय भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओगे।
विस्तृत व्याख्या:
जब तक मोह है, तब तक मनुष्य बाहरी बातों से प्रभावित होता है। मोह के नष्ट होते ही बुद्धि स्वतः शांत और वैराग्ययुक्त हो जाती है।
श्लोक 2.53: समाधि में बुद्धि के अचल होने पर योग की सिद्धि
संस्कृत:
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || ५३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
श्रुति-विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला समाधौ अचला बुद्धिः तदा योगम् अवाप्स्यसि।
हिंदी भावार्थ:
भांति-भांति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम वास्तविक योग को प्राप्त कर लोगे।
विस्तृत व्याख्या:
अनेक मत-मतांतरों और संशयों से मुक्त होकर जब बुद्धि आत्म-तत्त्व में पूरी तरह एकाग्र हो जाती है, तभी पूर्ण योग घटित होता है।
श्लोक 2.54: अर्जुन का प्रश्न: स्थितप्रज्ञ के क्या लक्षण हैं?
संस्कृत:
अर्जुन उवाच |
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् || ५४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
अर्जुनः उवाच, स्थित-प्रज्ञस्य का भाषा समाधि-स्थस्य केशव स्थित-धीः किम् प्रभाषेत किम् आसीत व्रजेत किम्।
हिंदी भावार्थ:
अर्जुन ने कहा: हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले (स्थितप्रज्ञ) पुरुष का क्या लक्षण है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
विस्तृत व्याख्या:
अर्जुन एक आत्मज्ञानी महापुरुष के दैनिक जीवन, भाषा, व्यवहार और मानसिक स्थिति के विषय में विस्तार से जानने की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 2.55: संपूर्ण कामनाओं का त्याग और आत्मा में ही तृप्ति
संस्कृत:
श्रीभगवानुवाच |
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान् |
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || ५५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
श्री-भगवान् उवाच, प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनः-गतान् आत्मनि एव आत्मना तुष्टः स्थित-प्रज्ञः तदा उच्यते।
हिंदी भावार्थ:
श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को सर्वथा त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह 'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है।
विस्तृत व्याख्या:
स्थितप्रज्ञ की पहली पहचान: बाहरी वस्तुओं से सुख की भीख न मांगकर स्वयं की चेतना के आनंद में तृप्त रहना ('आत्मन्येवात्मना तुष्टः')।
श्लोक 2.56: दुःखों में शांत, सुखों में अनासक्त, राग-भय-क्रोध से मुक्त
संस्कृत:
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः |
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते || ५६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
दुःखेषु अनुद्विग्न-मनाः सुखेषु विगत-स्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थित-धीः मुनिः उच्यते।
हिंदी भावार्थ:
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निष्स्पृह (आसक्तिरहित) है, तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो चुके हैं—वह मुनि 'स्थिरबुद्धि' कहा जाता है।
विस्तृत व्याख्या:
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का मानसिक संतुलन अटूट होता है। दुःख उसे तोड़ नहीं सकते, सुख उसे भटका नहीं सकते और उसके जीवन से भय, क्रोध व आसक्ति मिट चुके होते हैं।
श्लोक 2.57: सर्वत्र अनासक्त, न हर्ष न द्वेष
संस्कृत:
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् |
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || ५७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यः सर्वत्र अनभिस्नेहः तत् तत् प्राप्य शुभ-अशुभम् न अभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिंदी भावार्थ:
जो पुरुष सर्वत्र स्नेह (आसक्ति) से रहित है और शुभ या अशुभ परिस्थिति को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित (स्थिर) है।
विस्तृत व्याख्या:
अनुकूल परिस्थिति में अहंकार से न फूलना और प्रतिकूल परिस्थिति में क्रोध या निराशा न करना ही स्थिर प्रज्ञा का प्रमाण है।
श्लोक 2.58: कछुए की भांति इंद्रियों को समेटना
संस्कृत:
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || ५८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
यदा संहरते च अयम् कूर्मः अङ्गानि इव सर्वशः इन्द्रियाणि इन्द्रिय-अर्थेभ्यः तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिंदी भावार्थ:
और कछुआ जैसे अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष अपनी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से सब प्रकार से खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
विस्तृत व्याख्या:
जैसे कछुआ आवश्यकता पड़ने पर अपने अंगों को खोलता है और संकट में समेट लेता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष इंद्रियों का स्वामी होता है, उनका दास नहीं।
श्लोक 2.59: परमात्मा का दर्शन होने पर सूक्ष्म रस (कामना) की भी निवृत्ति
संस्कृत:
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || ५९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
विषयाः विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रस-वर्जम् रसः अपि अस्य परम् दृष्ट्वा निवर्तते।
हिंदी भावार्थ:
इंद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परंतु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) बनी रहती है। किंतु इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार होने पर सर्वथा नष्ट हो जाती है।
विस्तृत व्याख्या:
जबरदस्ती उपवास या त्याग करने से बाहरी विषय छूट सकते हैं, मन का रस नहीं। परंतु जब आत्मा के परम आनंद का अनुभव होता है, तो तुच्छ विषय-भोग स्वतः छूट जाते हैं।
श्लोक 2.60: प्रमथनशील इंद्रियां ज्ञानी के मन को भी हर लेती हैं
संस्कृत:
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः |
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः || ६० ||
पदच्छेद व अन्वय:
यततः हि अपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभम् मनः।
हिंदी भावार्थ:
हे कुन्तीपुत्र! यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी ये चंचल और प्रमथनशील (मथ डालने वाली) इंद्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।
विस्तृत व्याख्या:
इंद्रियों का वेग अत्यंत तीव्र होता है। थोड़ा सा भी असावधान होने पर बड़े-बड़े साधकों और विद्वानों का मन भी भटक सकता है।
श्लोक 2.61: इंद्रियों को वश में कर ईश्वरपरायण होना
संस्कृत:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः |
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || ६१ ||
पदच्छेद व अन्वय:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्तः आसीत मत्-परः वशे हि यस्य इन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिंदी भावार्थ:
साधक को चाहिए कि उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके मेरे परायण (मत्परः) होकर ध्यान में बैठे; क्योंकि जिसकी इंद्रियां वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर मानी जाती है।
विस्तृत व्याख्या:
इंद्रिय संयम केवल हठ से नहीं, बल्कि ईश्वर-समर्पण से सिद्ध होता है। जब हृदय परमात्मा से जुड़ता है, तो इंद्रियां स्वतः शांत हो जाती हैं।
श्लोक 2.62: पतन की सीढ़ी: विषयों के चिंतन से काम और क्रोध की उत्पत्ति
संस्कृत:
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते || ६२ ||
पदच्छेद व अन्वय:
ध्यायतः विषयान् पुंसः सङ्गः तेषु उपजायते सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधः अभिजायते।
हिंदी भावार्थ:
विषयों का निरंतर चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है; आसक्ति से उन विषयों की कामना (काम) उत्पन्न होती है; और कामना में बाधा पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
विस्तृत व्याख्या:
मनोविज्ञान का अद्भुत सूत्र: विषयों का ध्यान ➔ आसक्ति ➔ तीव्र इच्छा (काम) ➔ इच्छापूर्ति न होने पर क्रोध।
श्लोक 2.63: क्रोध से सम्मोह, स्मृतिनाश, बुद्धिनाश और सर्वनाश
संस्कृत:
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः |
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || ६३ ||
पदच्छेद व अन्वय:
क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृति-विभ्रमः स्मृति-भ्रंशात् बुद्धि-नाशः बुद्धि-नाशात् प्रणश्यति।
हिंदी भावार्थ:
क्रोध से सम्मोह (मूढ़भाव/अंधापन) उत्पन्न होता है; सम्मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है; स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि (विवेक) का नाश हो जाता है; और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।
विस्तृत व्याख्या:
क्रोध ➔ अज्ञान/अविवेक (सम्मोह) ➔ संस्कारों व शिक्षा की स्मृति का लोप ➔ सही-गलत का निर्णय करने वाली बुद्धि का विनाश ➔ मनुष्य का पतन।
श्लोक 2.64: राग-द्वेष से मुक्त होकर विषयों में विचरण करने पर शांति
संस्कृत:
रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति || ६४ ||
पदच्छेद व अन्वय:
राग-द्वेष-विमुक्तैः तु विषयान् इन्द्रियैः चरन् आत्म-वश्यैः विधेय-आत्मा प्रसादम् अधिगच्छति।
हिंदी भावार्थ:
किंतु अपने वश में किए हुए अंतःकरण वाला साधक राग और द्वेष से रहित इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ भी अंतःकरण की परम प्रसन्नता और शांति (प्रसाद) को प्राप्त होता है।
विस्तृत व्याख्या:
संसार को छोड़ना जरूरी नहीं है, राग और द्वेष को छोड़ना जरूरी है। जब इंद्रियों में आकर्षण और विकर्षण नहीं रहता, तो जीवन में स्थायी शांति बनी रहती है।
श्लोक 2.65: चित्त की प्रसन्नता में समस्त दुःखों का नाश
संस्कृत:
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते |
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते || ६५ ||
पदच्छेद व अन्वय:
प्रसादे सर्व-दुःखानाम् हानिः अस्य उपजायते प्रसन्न-चेतसः हि आशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।
हिंदी भावार्थ:
अंतःकरण की प्रसन्नता प्राप्त हो जाने पर इस मनुष्य के संपूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है; और उस प्रसन्नचित्त वाले साधक की बुद्धि शीघ्र ही परमात्मा में भली-भांति स्थिर हो जाती है।
विस्तृत व्याख्या:
जिसका मन भीतर से शांत और संतुष्ट है, उसके सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं और उसकी बुद्धि ज्ञान में स्थिर हो जाती है।
श्लोक 2.66: अशांत मन को न ज्ञान, न शांति और न सुख
संस्कृत:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् || ६६ ||
पदच्छेद व अन्वय:
न अस्ति बुद्धिः अयुक्तस्य न च अयुक्तस्य भावना न च अ-भावयतः शान्तिः अशान्तस्य कुतः सुखम्।
हिंदी भावार्थ:
इंद्रियों को वश में न रखने वाले असंयमी पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और न उसके मन में भावना (एकाग्रता) होती है; भावनाहीन मनुष्य को शांति नहीं मिलती, और अशांत मनुष्य को सुख कहाँ?
विस्तृत व्याख्या:
जीवन की शांति का गणित: असंयम ➔ बुद्धिहीनता ➔ एकाग्रता का अभाव ➔ अशांति ➔ सुख का सर्वथा लोप।
श्लोक 2.67: भटकती हुई इंद्रियां बुद्धि को वैसे ही हरती हैं जैसे वायु नाव को
संस्कृत:
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते |
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि || ६७ ||
पदच्छेद व अन्वय:
इन्द्रियाणाम् हि चरताम् यत् मनः अनुविधीयते तत् अस्य हरति प्रज्ञाम् वायुः नावम् इव अम्भसि।
हिंदी भावार्थ:
क्योंकि जल में चलने वाली नाव को जैसे तीव्र वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस एक इंद्रिय के पीछे चलता है, वह अकेली ही उसकी बुद्धि को हर लेती है।
विस्तृत व्याख्या:
जैसे जल में नाव को तूफान भटका देता है, वैसे ही एक भी बेलगाम इंद्रिय मनुष्य के सारे विवेक को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
श्लोक 2.68: इंद्रियों के वश में होने पर ही बुद्धि स्थिर
संस्कृत:
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || ६८ ||
पदच्छेद व अन्वय:
तस्मात् यस्य महा-बाहो निगृहीतानि सर्वशः इन्द्रियाणि इन्द्रिय-अर्थेभ्यः तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।
हिंदी भावार्थ:
इसलिए हे महाबाहु! जिस पुरुष की इंद्रियां इंद्रिय-विषयों से सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसी की बुद्धि प्रतिष्ठित (स्थिर) है।
विस्तृत व्याख्या:
इंद्रिय-संयम ही आत्मज्ञान की आधारशिला है। जो इंद्रियों का स्वामी है, वही अपनी बुद्धि को ईश्वर में स्थिर रख सकता है।
श्लोक 2.69: संसारियों की रात में ज्ञानी जागता है
संस्कृत:
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी |
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः || ६९ ||
पदच्छेद व अन्वय:
या निशा सर्व-भूतानाम् तस्याम् जागर्ति संयमी यस्याम् जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतः मुनेः।
हिंदी भावार्थ:
संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है (आत्मज्ञान), उस परमात्म-तत्त्व में संयमी पुरुष जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (सांसारिक विषय-भोग), वह आत्मज्ञानी मुनि के लिए रात्रि के समान है।
विस्तृत व्याख्या:
दृष्टिकोण का अंतर: सांसारिक लोग धन, मान और वासना में जागे हैं और आत्मा के प्रति सोए हैं; जबकि सिद्ध ज्ञानी आत्मा में जागा हुआ है और संसार के प्रपंचों के प्रति सो चुका है।
श्लोक 2.70: समुद्र के समान अडोल चित्त वाला ही शांति पाता है
संस्कृत:
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् |
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी || ७० ||
पदच्छेद व अन्वय:
आपूर्यमाणम् अचल-प्रतिष्ठम् समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् तद्वत् कामाः यम् प्रविशन्ति सर्वे सः शान्तिम् आप्नोति न काम-कामी।
हिंदी भावार्थ:
जैसे सब ओर से जल से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेक नदियों का जल बिना कोई हलचल किए समा जाता है, वैसे ही संपूर्ण भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में विकार उत्पन्न किए बिना समा जाते हैं, वही शांति पाता है; भोगों की कामना करने वाला नहीं।
विस्तृत व्याख्या:
समुद्र की उपमा: नदियां आकर गिरती हैं, पर समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता। ज्ञानी के सामने सांसारिक विषय आते हैं, पर वे उसके मन की शांति को हिला नहीं पाते।
श्लोक 2.71: 'अहं' और 'मम' से मुक्त पुरुष ही परम शांति प्राप्त करता है
संस्कृत:
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः |
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति || ७१ ||
पदच्छेद व अन्वय:
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमान् चरति निःस्पृहः निर्ममः निरहङ्कारः सः शान्तिम् अधिगच्छति।
हिंदी भावार्थ:
जो मनुष्य संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर स्पृहा (इच्छा) रहित, ममता रहित और अहंकार रहित होकर जीवन व्यतीत करता है, वही परम शांति को प्राप्त होता है।
विस्तृत व्याख्या:
शांति का अंतिम सूत्र: कामनाओं का त्याग ('विहाय कामान्'), इच्छारहित होना ('निःस्पृहः'), 'मेरा' का भाव छोड़ना ('निर्ममः') और 'मैं' का अहंकार मिटाना ('निरहङ्कारः')।
श्लोक 2.72: ब्राह्मी स्थिति और ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति
संस्कृत:
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति |
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति || ७२ ||
पदच्छेद व अन्वय:
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ न एनाम् प्राप्य विमुह्यति स्थित्वा अस्याम् अन्त-काले अपि ब्रह्म-निर्वाणम् ऋच्छति।
हिंदी भावार्थ:
हे पार्थ! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति (ब्राह्मी स्थिति) है। इसे प्राप्त होकर मनुष्य कभी मोहित नहीं होता; और जीवन के अंतिम काल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण (परम मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।
विस्तृत व्याख्या:
द्वितीय अध्याय का परम समापन। 'ब्राह्मी स्थिति' परमात्मा में एकीभाव की स्थिति है। जो इस दिव्य चेतना में स्थित हो जाता है, वह मृत्यु के समय भी परम शांति और ब्रह्म-साक्षात्कार (मोक्ष) प्राप्त करता है।