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गीता अध्याय 1 सम्पूर्ण8 min read

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग): सभी 47 श्लोकों का सम्पूर्ण प्रामाणिक स्वाध्याय

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के सभी 47 श्लोकों का संपूर्ण प्रामाणिक संग्रह। शुद्ध संस्कृत, पदच्छेद, अन्वय, सरल हिंदी भावार्थ और जीवनोपयोगी दार्शनिक विश्लेषण।

आ

आचार्य देवरतन

Writer & Research Team

Updated: 2026-08-20
कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं के मध्य रथ पर भगवान श्रीकृष्ण और गांडीव धनुष त्यागकर शोकमग्न बैठे अर्जुन
गीता अध्याय 1 सम्पूर्ण

श्रीमद्भगवद्गीता का आरंभ किसी शांत वन या तपोभूमि में नहीं, बल्कि कुरुक्षेत्र के भीषण युद्धक्षेत्र में जीवन के सबसे बड़े धर्मसंकट के बीच होता है। प्रथम अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' के 47 श्लोक मानव मन के अंतर्द्वंद्व, मोह, भय और कर्तव्य के त्याग की मनोवैज्ञानिक यात्रा हैं। धृतराष्ट्र के पक्षपाती संशय से लेकर शंखनाद के महाघोष और अंततः गांडीव धनुष त्यागकर शोकमग्न बैठे अर्जुन के समर्पण तक—यह अध्याय वह उर्वर भूमि तैयार करता है जहाँ साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के मुख से अमर ज्ञानगंगा प्रवाहित होती है।

Sacred Heritage

Timeless Temple Tradition

Architectural Wonder

Ancient Vedic Mastery

Scriptural Origin

Puranic & Epic History

Spiritual Sadhana

Living Faith & Wisdom

श्लोक 1.1: धृतराष्ट्र का पक्षपातपूर्ण प्रश्न

संस्कृत: धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || १ || पदच्छेद व अन्वय: धृतराष्ट्रः उवाच, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाः च एव किम् अकुर्वत सञ्जय। हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र ने कहा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? विस्तृत व्याख्या: गीता का प्रथम शब्द 'धर्म' और अंतिम शब्द 'मम' है (मम धर्म - मेरा कर्तव्य)। धृतराष्ट्र अपने पुत्रों (मामकाः) और पांडु के पुत्रों (पाण्डवाः) में भेद करके अपने भीतर के गहरे मोह और संकीर्ण दृष्टि को प्रकट करते हैं।

श्लोक 1.2: दुर्योधन का द्रोणाचार्य के पास जाना

संस्कृत: सञ्जय उवाच | दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा | आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् || २ || पदच्छेद व अन्वय: सञ्जयः उवाच, दृष्ट्वा तु पाण्डव-अनीकम् व्यूढम् दुर्योधनः तदा आचार्यम् उपसङ्गम्य राजा वचनम् अब्रवीत्। हिंदी भावार्थ: संजय ने कहा: उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहे। विस्तृत व्याख्या: 11 अक्षौहिणी सेना का स्वामी होने पर भी दुर्योधन पांडवों की सुव्यवस्थित व्यूहरचना देखकर भयभीत हो जाता है और भीष्म के स्थान पर गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है।

श्लोक 1.3: द्रोणाचार्य पर दुर्योधन का व्यंग्य

संस्कृत: पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् | व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता || ३ || पदच्छेद व अन्वय: पश्य एताम् पाण्डु-पुत्राणाम् आचार्य महतीम् चमूम् व्यूढाम् द्रुपद-पुत्रेण तव शिष्येण धीमता। हिंदी भावार्थ: दुर्योधन ने कहा: हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य, द्रुपदपुत्र (धृष्टद्युम्न) द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गई पाण्डवों की इस विशाल सेना को देखिए। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन द्रोणाचार्य को याद दिलाता है कि जिस धृष्टद्युम्न ने सेना सजाई है, वह उन्हीं का शिष्य है। वह द्रोणाचार्य को उकसाता है ताकि वे पांडवों पर कोई दया न दिखाएं।

श्लोक 1.4: पांडव सेना के भीम-अर्जुन समान शूरवीर

संस्कृत: अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि | युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः || ४ || पदच्छेद व अन्वय: अत्र शूराः महेष्वासाः भीम-अर्जुन-समाः युधि युयुधानः विराटः च द्रुपदः च महारथः। हिंदी भावार्थ: इस सेना में भीम और अर्जुन के समान युद्ध करने वाले बहुत से शूरवीर धनुर्धर हैं, जैसे—युयुधान (सात्यकि), राजा विराट और महारथी द्रुपद। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन शत्रु पक्ष के वीरों की गणना करता है। वह सात्यकि, विराट और द्रुपद का नाम भीम और अर्जुन की शक्ति के समकक्ष रखकर प्रस्तुत करता है।

श्लोक 1.5: धर्म के पक्षधर पराक्रमी राजा

संस्कृत: धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् | पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः || ५ || पदच्छेद व अन्वय: धृष्टकेतुः चेकितानः काशिराजः च वीर्यवान् पुरुजित् कुन्तिभोजः च शैब्यः च नरपुङ्गवः। हिंदी भावार्थ: साथ ही धृष्टकेतु, चेकितान और पराक्रमी काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य भी उपस्थित हैं। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन पांडवों के अन्य पराक्रमी सहयोगियों—धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, कुंती के भाइयों (पुरुजित-कुन्तिभोज) और शैब्य की शक्ति का उल्लेख करता है।

श्लोक 1.6: युवा पीढ़ी के महारथी

संस्कृत: युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् | सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः || ६ || पदच्छेद व अन्वय: युधामन्युः च विक्रान्तः उत्तमौजाः च वीर्यवान् सौभद्रः द्रौपदेयाः च सर्वे एव महारथाः। हिंदी भावार्थ: पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र—ये सभी निश्चय ही महारथी हैं। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन स्वीकार करता है कि अर्जुन के चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजा, वीर अभिमन्यु और पाँचों उपपांडव सभी 'महारथी' की श्रेणी में आते हैं।

श्लोक 1.7: कौरव सेनानायकों का परिचय

संस्कृत: अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम | नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते || ७ || पदच्छेद व अन्वय: अस्माकम् तु विशिष्टाः ये तान् निबोध द्विजोत्तम नायकाः मम सैन्यस्य संज्ञार्थम् तान् ब्रवीमि ते। हिंदी भावार्थ: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ (द्रोणाचार्य)! हमारे पक्ष में भी जो विशिष्ट सेनानायक हैं, उनको आप जान लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मैं उनके नाम बताता हूँ। विस्तृत व्याख्या: पांडवों की प्रशंसा के बाद द्रोणाचार्य का मनोबल बनाए रखने के लिए दुर्योधन उन्हें 'द्विजोत्तम' कहकर अपनी सेना के प्रमुख योद्धाओं का नाम लेना प्रारंभ करता है।

श्लोक 1.8: कौरव पक्ष के अजेय योद्धा

संस्कृत: भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || ८ || पदच्छेद व अन्वय: भवान् भीष्मः च कर्णः च कृपः च समितिञ्जयः अश्वत्थामा विकर्णः च सौमदत्तिः तथा एव च। हिंदी भावार्थ: आप (द्रोणाचार्य), भीष्म पितामह, कर्ण, और युद्धविजयी कृपाचार्य; तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन अपने प्रमुख स्तंभों—द्रोण, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य ('समितिंजय'), अश्वत्थामा, धर्मात्मा विकर्ण और भूरिश्रवा का नाम गर्व से लेता है।

श्लोक 1.9: प्राण न्योछावर करने को तैयार शूरवीर

संस्कृत: अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः | नानाशास्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः || ९ || पदच्छेद व अन्वय: अन्ये च बहवः शूराः मत्-अर्थे त्यक्त-जीविताः नाना-शस्त्र-प्रहरणाः सर्वे युद्ध-विशारदाः। हिंदी भावार्थ: और भी बहुत से शूरवीर मेरे लिए अपने प्राण त्यागने को तत्पर हैं। वे अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं और युद्धकला में निपुण हैं। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन कहता है कि ये राजा 'मदर्थे त्यक्तजीविताः' (मेरे लिए प्राण देने आए हैं)। अनजाने में उसके मुख से यह सत्य निकल जाता है कि अधर्म का साथ देने वाले इन वीरों की मृत्यु निश्चित है।

श्लोक 1.10: दोनों सेनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

संस्कृत: अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् | पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् || १० || पदच्छेद व अन्वय: अपर्याप्तम् तत् अस्माकम् बलम् भीष्म-अभिरक्षितम् पर्याप्तम् तु इदम् एतेषाम् बलम् भीम-अभिरक्षितम्। हिंदी भावार्थ: भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी सेना सब प्रकार से असीम/अपर्याप्त है, और भीम द्वारा रक्षित इन पाण्डवों की सेना जीतने में सुगम/सर्वथा समर्थ है। विस्तृत व्याख्या: 'अपर्याप्तम्' शब्द दुर्योधन के अंतर्मन के भय को दर्शाता है कि भीष्म के रहते हुए भी अधर्म के कारण हमारी सेना असमर्थ है, जबकि धर्म के कारण पांडवों की सेना सर्वथा सक्षम है।

श्लोक 1.11: भीष्म पितामह की रक्षा का निर्देश

संस्कृत: अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः | भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि || ११ || पदच्छेद व अन्वय: अयनेषु च सर्वेषु यथा-भागम् अवस्थिताः भीष्मम् एव अभिरक्षन्तु भवन्तः सर्वे एव हि। हिंदी भावार्थ: इसलिए आप सभी अपनी-अपनी मोर्चाबंदियों पर दृढ़ता से स्थित रहकर सब ओर से विशेष रूप से भीष्म पितामह की ही रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: दुर्योधन जानता है कि भीष्म ही कौरव सेना के मुख्य प्राण हैं। इसलिए वह सभी महारथियों को भीष्म की रक्षा में तैनात रहने का आदेश देता है।

श्लोक 1.12: भीष्म का सिंहनाद और प्रथम शंखघोष

संस्कृत: तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः | सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् || १२ || पदच्छेद व अन्वय: तस्य सञ्जनयन् हर्षम् कुरु-वृद्धः पितामहः सिंह-नादम् विनद्य उच्चैः शङ्खम् दध्मौ प्रतापवान्। हिंदी भावार्थ: तब कुरुवंश के वृद्ध पितामह भीष्म ने दुर्योधन का उत्साह बढ़ाने के लिए सिंह के समान गर्जना करते हुए उच्च स्वर से अपना शंख बजाया। विस्तृत व्याख्या: पितामह भीष्म दुर्योधन के मन के भय को समझ जाते हैं और उसका उत्साह बढ़ाने के लिए सिंहनाद करते हुए शंख बजाकर युद्ध का शंखनाद करते हैं।

श्लोक 1.13: कौरव वाद्यों का तुमुल कोलाहल

संस्कृत: ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् || १३ || पदच्छेद व अन्वय: ततः शङ्खाः च भेर्यः च पणव-आनक-गोमुखाः सहसा एव अभ्यहन्यन्त सः शब्दः तुमुलः अभवत्। हिंदी भावार्थ: इसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंगे आदि वाद्य एक साथ बज उठे, और वह ध्वनि अत्यंत भयंकर व तुमुल हो गई। विस्तृत व्याख्या: भीष्म के शंखनाद के साथ ही कौरव सेना के हजारों युद्ध-वाद्य एक साथ बज उठते हैं, जिससे युद्धभूमि में भयानक गर्जना होती है।

श्लोक 1.14: श्रीकृष्ण और अर्जुन का दिव्य शंखनाद

संस्कृत: ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ | माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः || १४ || पदच्छेद व अन्वय: ततः श्वेतैः हयैः युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ माधवः पाण्डवः च एव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। हिंदी भावार्थ: तत्पश्चात श्वेत घोड़ों से युक्त दिव्य रथ पर आसीन भगवान माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंखों का नाद किया। विस्तृत व्याख्या: कौरवों के कोलाहल के प्रत्युत्तर में अग्निदेव द्वारा प्रदत्त श्वेत अश्वों वाले दिव्य रथ पर विराजमान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने अलौकिक शंख बजाते हैं।

श्लोक 1.15: पांचजन्य, देवदत्त और पौण्ड्र का महाघोष

संस्कृत: पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः | पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः || १५ || पदच्छेद व अन्वय: पाञ्चजन्यम् हृषीकेशः देवदत्तम् धनञ्जयः पौण्ड्रम् दध्मौ महा-शङ्खम् भीम-कर्मा वृकोदरः। हिंदी भावार्थ: हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने पांचजन्य नामक, धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त नामक और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर (भीम) ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया। विस्तृत व्याख्या: श्रीकृष्ण का 'पांचजन्य' नाद-ब्रह्म का प्रतीक है, अर्जुन का 'देवदत्त' देव-आशीर्वाद का और भीम का 'पौण्ड्र' महापराक्रम का प्रतीक है।

श्लोक 1.16: युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव का शंखनाद

संस्कृत: अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः | नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ || १६ || पदच्छेद व अन्वय: अनन्तविजयम् राजा कुन्ती-पुत्रः युधिष्ठिरः नकुलः सहदेवः च सुघोष-मणिपुष्पकौ। हिंदी भावार्थ: कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक तथा नकुल और सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। विस्तृत व्याख्या: धर्मराज युधिष्ठिर 'अनंतविजय' (धर्म की अनंत विजय) शंख बजाते हैं, तथा नकुल 'सुघोष' और सहदेव 'मणिपुष्पक' शंख का नाद करते हैं।

श्लोक 1.17 व 1.18: समस्त पांडव महारथियों का शंखघोष

संस्कृत: काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः | धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः || १७ || द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते | सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् || १८ || पदच्छेद व अन्वय: काश्यः च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः धृष्टद्युम्नः विराटः च सात्यकिः च अपराजितः द्रुपदः द्रौपदेयाः च सर्वशः पृथिवी-पते सौभद्रः च महा-बाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्। हिंदी भावार्थ: हे पृथ्वीपति! श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा महाबली अभिमन्यु—इन सभी ने चारों ओर से अपने-अपने शंख बजाए। विस्तृत व्याख्या: पांडव सेना के सभी महारथी एक साथ अपने-अपने शंख बजाकर धर्म की रक्षा हेतु अपनी अटूट एकता और शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

श्लोक 1.19: शंखनाद से कौरवों के हृदय का विदीर्ण होना

संस्कृत: स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् | नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् || १९ || पदच्छेद व अन्वय: सः घोषः धार्तराष्ट्राणाम् हृदयानि व्यदारयत् नभः च पृथिवीम् च एव तुमुलः व्यनुनादयन्। हिंदी भावार्थ: उस गगनभेदी भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को गुंजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हृदयों को विदीर्ण कर दिया। विस्तृत व्याख्या: पांडवों का शंखनाद धर्म का नाद था। इस दिव्य ध्वनि ने कौरवों के मन में छिपे अधर्म के अपराधबोध और भय को झकझोर कर रख दिया।

श्लोक 1.20: कपिध्वज अर्जुन द्वारा धनुष उठाना

संस्कृत: अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः | प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः || २० || पदच्छेद व अन्वय: अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपि-ध्वजः प्रवृत्ते शस्त्र-सम्पाते धनुः उद्यम्य पाण्डवः। हिंदी भावार्थ: इसके बाद, जब शस्त्र चलने ही वाले थे, उस समय कपिध्वज (हनुमान जी की ध्वजा वाले) अर्जुन ने कौरवों को देखकर अपना धनुष उठाया। विस्तृत व्याख्या: युद्ध के निर्णायक क्षण में अर्जुन गांडीव धनुष उठाते हैं। उनके रथ की ध्वजा पर साक्षात पवनपुत्र हनुमान विराजमान हैं, जो अजेयता के प्रतीक हैं।

श्लोक 1.21 व 1.22: दोनों सेनाओं के मध्य रथ ले जाने की प्रार्थना

संस्कृत: हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते | अर्जुन उवाच | सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || २१ || यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् | कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे || २२ || पदच्छेद व अन्वय: हृषीकेशम् तदा वाक्यम् इदम् आह मही-पते, अर्जुनः उवाच, सेनयोः उभयोः मध्ये रथम् स्थापय मे अच्युत। यावत् एतान् निरीक्षे अहम् योद्धु-कामान् अवस्थितान् कैः मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रण-समुद्यमे। हिंदी भावार्थ: अर्जुन ने कहा: हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन विपक्षी योद्धाओं को देख सकूं कि मुझे किनसे युद्ध करना है। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन श्रीकृष्ण को 'अच्युत' (अविनाशी/अडिग) कहते हैं। अर्जुन योद्धा के आत्मविश्वास से शत्रु सेना का निरीक्षण करना चाहते हैं।

श्लोक 1.23: दुर्योधन के सहायकों को देखने की इच्छा

संस्कृत: योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः | धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः || २३ || पदच्छेद व अन्वय: योत्स्यमानान् अवेक्षे अहम् ये एते अत्र समागताः धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेः युद्धे प्रिय-चिकीर्षवः। हिंदी भावार्थ: दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो राजा यहाँ एकत्र हुए हैं, उन सबको मैं भली-भांति देख लूँ। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कहते हैं और देखना चाहते हैं कि कौन-कौन से राजा अधर्म का साथ देने आए हैं।

श्लोक 1.24: श्रीकृष्ण द्वारा दोनों सेनाओं के मध्य रथ की स्थापना

संस्कृत: सञ्जय उवाच | एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् || २४ || पदच्छेद व अन्वय: सञ्जयः उवाच, एवम् उक्तः हृषीकेशः गुडाकेशेन भारत सेनयोः उभयोः मध्ये स्थापयित्वा रथ-उत्तमम्। हिंदी भावार्थ: संजय ने कहा: हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! गुड़ाकेश (अर्जुन) द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने दोनों सेनाओं के मध्य उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया। विस्तृत व्याख्या: गुड़ाकेश (निद्राजयी अर्जुन) के कहने पर हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण) रथ को दोनों विशाल सेनाओं के बीच में ले जाते हैं।

श्लोक 1.25: भीष्म और द्रोण के सम्मुख श्रीकृष्ण की गूढ़ लीला

संस्कृत: भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् | उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति || २५ || पदच्छेद व अन्वय: भीष्म-द्रोण-प्रमुखतः सर्वेषाम् च मही-क्षिताम् उवाच पार्थ पश्य एतान् समवेतान् कुरून् इति। हिंदी भावार्थ: भीष्म, द्रोण और समस्त राजाओं के सामने रथ को खड़ा कर भगवान ने कहा: हे पार्थ! यहाँ एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देखो। विस्तृत व्याख्या: श्रीकृष्ण जानबूझकर रथ को भीष्म और द्रोण के सामने खड़ा करते हैं और 'कुरुवंशियों को देखो' कहकर अर्जुन के भीतर छिपे पारिवारिक मोह को जाग्रत करते हैं।

श्लोक 1.26: दोनों सेनाओं में स्वजनों का दर्शन

संस्कृत: तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा || २६ || श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि | पदच्छेद व अन्वय: तत्र अपश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखीन् तथा श्वशुरान् सुहृदः च एव सेनयोः उभयोः अपि। हिंदी भावार्थ: वहाँ खड़े होकर अर्जुन ने दोनों ही सेनाओं में पिताओं, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और सुहृदों को देखा। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन जब दृष्टि घुमाते हैं, तो उन्हें शत्रु नहीं, बल्कि अपने पूज्य पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, मामा और भाई दिखाई देते हैं, जिससे उनका हृदय विचलित हो जाता है।

श्लोक 1.27: अर्जुन का करुणा और विषाद से घिरना

संस्कृत: तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् | कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् || २७ || पदच्छेद व अन्वय: तान् समीक्ष्य सः कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान् कृपया परया आविष्टः विषीदन् इदम् अब्रवीत्। हिंदी भावार्थ: उन सभी बंधु-बांधवों को उपस्थित देखकर कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यधिक करुणा से व्याकुल हो गए और शोक करते हुए यह वचन बोले। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन 'कृपया परयाविष्टो' (गहन करुणा) से भर जाते हैं। यह करुणा ज्ञान की नहीं, बल्कि देह-संबंधों और मोह की उपज थी।

श्लोक 1.28: 'स्वजन' मोह और शारीरिक दुर्बलता

संस्कृत: अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् | सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति || २८ || पदच्छेद व अन्वय: अर्जुनः उवाच, दृष्ट्वा इमम् स्व-जनम् कृष्ण युयुत्सुम् समुपस्थितम् सीदन्ति मम गात्राणि मुखम् च परिशुष्यति। हिंदी भावार्थ: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से सामने खड़े इस स्वजन-समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूखा जा रहा है। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन 'स्वजनम्' (मेरे अपने) शब्द का प्रयोग करते हैं। मानसिक आघात के कारण उनके अंग कांपने लगते हैं और मुख सूख जाता है।

श्लोक 1.29: शरीर में कंपन और गांडीव का गिरना

संस्कृत: वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते | गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते || २९ || पदच्छेद व अन्वय: वेपथुः च शरीरे मे रोम-हर्षः च जायते गाण्डीवम् स्रंसते हस्तात् त्वक् च एव परिदह्यते। हिंदी भावार्थ: मेरे शरीर में कंपन हो रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं, हाथ से गांडीव धनुष फिसल रहा है और त्वचा में तीव्र जलन हो रही है। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन अवसाद के गंभीर लक्षणों का वर्णन करते हैं: शरीर में कंपन (वेपथु), रोंगटे खड़े होना, गांडीव का हाथ से फिसलना और त्वचा में जलन।

श्लोक 1.30: मानसिक भ्रम और विपरीत अपशकुन

संस्कृत: न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः | निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव || ३० || पदच्छेद व अन्वय: न च शक्नोमि अवस्थातुम् भ्रमति इव च मे मनः निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। हिंदी भावार्थ: हे केशव! अब मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हूँ, मेरा मन भ्रमित हो रहा है और मुझे सब लक्षण विपरीत (अमंगलकारी) ही दिखाई दे रहे हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन का मानसिक संतुलन डगमगा जाता है। वे अपने आंतरिक भय को बाहरी अपशकुनों ('विपरीतानि निमित्तानि') के रूप में देखने लगते हैं।

श्लोक 1.31: स्वजन-वध में अकल्याण और राज्य-सुख की व्यर्थता

संस्कृत: न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे | न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च || ३१ || पदच्छेद व अन्वय: न च श्रेयः अनुपश्यामि हत्वा स्व-जनम् आहवे न काङ्क्षे विजयम् कृष्ण न च राज्यम् सुखानि च। हिंदी भावार्थ: युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण (श्रेय) दिखाई नहीं देता। हे कृष्ण! न तो मैं विजय चाहता हूँ और न ही राज्य तथा सुखों की कामना करता हूँ। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन क्षणिक वैराग्य के प्रभाव में आकर विजय, राज्य और समस्त सांसारिक सुखों को त्यागने की घोषणा कर देते हैं।

श्लोक 1.32: स्वजनों के बिना राज्य का क्या प्रयोजन?

संस्कृत: किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा | येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च || ३२ || पदच्छेद व अन्वय: किम् नः राज्येन गोविन्द किम् भोगैः जीवितेन वा येषाम् अर्थे काङ्क्षितम् नः राज्यम् भोगाः सुखानि च। हिंदी भावार्थ: हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन, अथवा भोगों से या जीवन से ही क्या लाभ? क्योंकि जिनके लिए हम राज्य और सुख चाहते हैं, वे ही सामने खड़े हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन कहते हैं कि जिन परिजनों के साथ सुख भोगने के लिए राज्य चाहिए, जब वे ही नहीं रहेंगे, तो इस जीवन और सत्ता का क्या अर्थ?

श्लोक 1.33: प्राण और धन त्यागकर खड़े संबंधी

संस्कृत: त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च | आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः || ३३ || पदच्छेद व अन्वय: ते इमे अवस्थिताः युद्धे प्राणान् त्यक्त्वा धनानि च आचार्याः पितरः पुत्राः तथा एव च पितामहाः। हिंदी भावार्थ: वे ही आचार्य, पिता, पुत्र और पितामह अपने प्राण और धन की आशा छोड़कर युद्ध में मरने-मारने के लिए खड़े हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन देखते हैं कि उनके गुरु, पिता समान बड़े और बच्चे सभी युद्ध में अपने प्राणों की बाजी लगाकर खड़े हैं।

श्लोक 1.34: प्राण जाने पर भी शस्त्र न उठाने का संकल्प

संस्कृत: मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा | एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन || ३४ || पदच्छेद व अन्वय: मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनः तथा एतान् न हन्तुम् इच्छामि घ्नतः अपि मधुसूदन। हिंदी भावार्थ: मामा, श्वसुर, पौत्र, साले तथा अन्य सभी संबंधी—हे मधुसूदन! यदि ये मुझे मार भी डालें, तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता। विस्तृत व्याख्या: मोह के वशीभूत होकर अर्जुन कहते हैं कि चाहे ये संबंधी मुझ पर वार करके मेरे प्राण ही क्यों न ले लें, मैं इन पर अस्त्र नहीं चलाऊंगा।

श्लोक 1.35: त्रिलोकी के राज्य का परित्याग

संस्कृत: अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते | निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन || ३५ || पदच्छेद व अन्वय: अपि त्रैलोक्य-राज्यस्य हेतोः किम् नु मही-कृते निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्यात् जनार्दन। हिंदी भावार्थ: तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता, फिर इस पृथ्वी के राज्य की तो बात ही क्या? हे जनार्दन! इन्हें मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी? विस्तृत व्याख्या: अर्जुन कहते हैं कि यदि मुझे तीनों लोकों का अखंड साम्राज्य भी मिले, तब भी मैं अपने भाइयों का वध करके प्रसन्न नहीं हो सकता।

श्लोक 1.36: आततायियों के वध से पाप का भय

संस्कृत: पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः | तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् | स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव || ३६ || पदच्छेद व अन्वय: पापम् एव आश्रयेत् अस्मान् हत्वा एतान् आततायिनः तस्मात् न अर्हाः वयम् हन्तुम् धार्तराष्ट्रान् स्व-बान्धवान् स्व-जनम् हि कथम् हत्वा सुखिनः स्याम माधव। हिंदी भावार्थ: इन आततायियों को मारने से भी हमें पाप ही लगेगा। इसलिए अपने ही संबंधी धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे योग्य नहीं है। हे माधव! अपने स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे? विस्तृत व्याख्या: कौरव आततायी थे, जिनका वध शास्त्रसम्मत था। परंतु अर्जुन का मोह उन्हें भ्रमित करता है और वे उनके वध को पाप मानने लगते हैं।

श्लोक 1.37 व 1.38: कौरवों का लोभ और पांडवों का विवेक

संस्कृत: यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः | कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् || ३७ || कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन || ३८ || पदच्छेद व अन्वय: यदि अपि एते न पश्यन्ति लोभ-उपहत-चेतसः कुल-क्षय-कृतम् दोषम् मित्र-द्रोहे च पातकम्। कथम् न ज्ञेयम् अस्माभिः पापात् अस्मात् निवर्तितुम् कुल-क्षय-कृतम् दोषम् प्रपश्यद्भिः जनार्दन। हिंदी भावार्थ: यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! इस कुलक्षय के दोष को स्पष्ट देखने वाले हम लोगों को इस पाप से बचने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए? विस्तृत व्याख्या: अर्जुन तर्क देते हैं कि कौरवों का विवेक तो लोभ में नष्ट हो चुका है, परंतु ज्ञानी होने के नाते हमें इस विनाशकारी युद्ध से पीछे हट जाना चाहिए।

श्लोक 1.39: कुलक्षय से कुल-धर्म का विनाश

संस्कृत: कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || ३९ || पदच्छेद व अन्वय: कुल-क्षये प्रणश्यन्ति कुल-धर्माः सनातनाः धर्मे नष्टे कुलम् कृत्स्नम् अधर्मः अभिभवति उत। हिंदी भावार्थ: कुल का नाश होने पर सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं; और धर्म के नष्ट होने पर संपूर्ण कुल को अधर्म अपने घेरे में ले लेता है। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन कहते हैं कि युद्ध में परिवार के श्रेष्ठ पुरुषों के मारे जाने से सनातन संस्कार और कुल-मर्यादाएं समाप्त हो जाती हैं, जिससे अधर्म फैलता है।

श्लोक 1.40: अधर्म का प्रसार और वर्णसंकर

संस्कृत: अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः | स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः || ४० || पदच्छेद व अन्वय: अधर्म-अभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुल-स्त्रियः स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्ण-सङ्करः। हिंदी भावार्थ: हे कृष्ण! अधर्म के अत्यधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां दूषित (असुरक्षित व मर्यादाहीन) हो जाती हैं; और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन चिंता व्यक्त करते हैं कि धर्मनिष्ठ पुरुषों के अभाव में कुल की स्त्रियों की मर्यादा और सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी, जिससे समाज में वर्णसंकरता फैलेगी।

श्लोक 1.41: पिण्डोदक क्रिया का लोप और पितरों का पतन

संस्कृत: सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च | पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः || ४१ || पदच्छेद व अन्वय: सङ्करः नरकाय एव कुल-घ्नानाम् कुलस्य च पतन्ति पितरः हि एषाम् लुप्त-पिण्ड-उदक-क्रियाः। हिंदी भावार्थ: वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाता है। श्राद्ध और तर्पण (पिंड और जल दान) की क्रिया लुप्त हो जाने से इनके पितर भी गिर जाते हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन वैदिक पितृ-परंपरा का उल्लेख करते हैं कि कुलनाश से श्राद्ध-तर्पण बंद हो जाएगा, जिससे पूर्वजों की आध्यात्मिक अधोगति होगी।

श्लोक 1.42: जाति-धर्म और कुल-धर्म का नाश

संस्कृत: दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः | उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः || ४२ || पदच्छेद व अन्वय: दोषैः एतैः कुल-घ्नानाम् वर्ण-सङ्कर-कारकैः उत्साद्यन्ते जाति-धर्माः कुल-धर्माः च शाश्वताः। हिंदी भावार्थ: कुलघातियों के इन वर्णसंकर पैदा करने वाले दोषों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म (सामाजिक व्यवस्था) पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन कहते हैं कि कुल के विनाश से समाज की दो प्रमुख आधारशिलाएं—कुल-धर्म (पारिवारिक मूल्य) और जाति-धर्म (सामाजिक कर्तव्य) नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 1.43: कुल-धर्म नष्ट होने से नरक-वास

संस्कृत: उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन | नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम || ४३ || पदच्छेद व अन्वय: उत्सन्न-कुल-धर्माणाम् मनुष्याणाम् जनार्दन नरके अनियतम् वासः भवति इति अनुशुश्रुम। हिंदी भावार्थ: हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, उनका अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है—ऐसा हम परंपरा से सुनते आए हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन शास्त्र-परंपरा ('अनुशुश्रुम') का हवाला देते हुए कहते हैं कि कुलनाश का अंतिम परिणाम केवल नरक की यातना ही है।

श्लोक 1.44: राज्य-लोभ में महापाप का संताप

संस्कृत: अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः || ४४ || पदच्छेद व अन्वय: अहो बत महत् पापम् कर्तुम् व्यवसिताः वयम् यत् राज्य-सुख-लोभेन हन्तुम् स्व-जनम् उद्यताः। हिंदी भावार्थ: हाय! बड़े खेद की बात है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हैं। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन आत्मग्लानि में डूब जाते हैं और धर्म-रक्षा के इस युद्ध को मात्र 'राज्य-सुख का लोभ' मानकर पश्चाताप करने लगते हैं।

श्लोक 1.45: निहत्थे रहकर मारे जाने की इच्छा

संस्कृत: यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः | धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || ४५ || पदच्छेद व अन्वय: यदि माम् अप्रतीकारम् अशस्त्रम् शस्त्र-पाणयः धार्तराष्ट्राः रणे हन्युः तत् मे क्षेमतरम् भवेत्। हिंदी भावार्थ: यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ निहत्थे और प्रतिकार न करने वाले को युद्ध में मार भी डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन का वैराग्य अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है। वे कहते हैं कि स्वजनों के रक्त से हाथ रंगने की बजाय निहत्थे रहकर कौरवों के हाथों मारा जाना कहीं श्रेष्ठ है।

श्लोक 1.46: रथ पर बैठकर गांडीव का परित्याग

संस्कृत: सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः || ४६ || पदच्छेद व अन्वय: सञ्जयः उवाच, एवम् उक्त्वा अर्जुनः सङ्ख्ये रथ-उपस्थे उपाविशत् विसृज्य स-शरम् चापम् शोक-संविग्न-मानसः। हिंदी भावार्थ: संजय ने कहा: युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर शोकमग्न मन वाले अर्जुन अपने बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए। विस्तृत व्याख्या: संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन ने मानसिक अवसाद की चरम सीमा पर पहुंचकर अपने गांडीव धनुष और बाणों को फेंक दिया और शोक से व्याकुल होकर रथ पर बैठ गए।

श्लोक 1.47: अर्जुनविषादयोग का समापन

संस्कृत पुष्पिका / श्लोक 1.47 सार: तस्मात् न योत्स्ये इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || (ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'अर्जुनविषादयोगो' नाम प्रथमोऽध्यायः ||) हिंदी भावार्थ: 'हे गोविंद! मैं युद्ध नहीं करूंगा'—ऐसा कहकर अर्जुन सर्वथा मौन हो गए। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' समाप्त होता है। विस्तृत व्याख्या: अर्जुन के संपूर्ण विषाद और अहंकार के टूटने के साथ प्रथम अध्याय पूर्ण होता है। यह विषाद ही अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण का शिष्य बनाकर आत्मज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी बनाता है।

Why this matters today

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के सभी 47 श्लोकों का संपूर्ण प्रामाणिक संग्रह। शुद्ध संस्कृत, पदच्छेद, अन्वय, सरल हिंदी भावार्थ और जीवनोपयोगी दार्शनिक विश्लेषण।

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Frequently asked questions

प्रथम अध्याय में 'विषाद' (दुःख/शोक) को 'योग' की संज्ञा क्यों दी गई है?

विषाद तब योग बन जाता है जब वह मनुष्य के सांसारिक अहंकार और सामर्थ्य के भ्रम को तोड़कर उसे परमात्मा की पूर्ण शरणागति में ले आता है। अर्जुन का यह मानसिक द्वंद्व ही उन्हें शिष्य बनाकर गीता के दिव्य ज्ञान का अधिकारी बनाता है।

गीता के प्रथम शब्द 'धर्मक्षेत्रे' का दार्शनिक महत्व क्या है?

'धर्मक्षेत्रे' शब्द यह स्पष्ट करता है कि यह संघर्ष केवल कुरुक्षेत्र की भूमि पर नहीं, बल्कि मानव शरीर रूपी क्षेत्र में सद्वृत्तियों (पांडव) और दुर्गुणों (कौरव) के बीच चलने वाला शाश्वत आध्यात्मिक संग्राम है।

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में कुल कितने श्लोक हैं?

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) में कुल 47 श्लोक हैं, जो अर्जुन के धनुष त्यागने और रथ के पिछले भाग में मौन होकर बैठने पर समाप्त होते हैं।

श्लोक 28 से 30 में अर्जुन के भीतर तनाव और अवसाद के कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

इन श्लोकों में अवसाद के शारीरिक व मानसिक लक्षण वर्णित हैं: अंगों का कांपना, मुख का सूखना, रोंगटे खड़े होना, त्वचा में जलन, गांडीव धनुष का हाथ से छूटना और बुद्धि का भ्रमित होना।