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जैन पर्व8 min read

पर्युषण महापर्व संपूर्ण मार्गदर्शिका: मिच्छामि दुक्कडम्, दस धर्म और आत्म-निरीक्षण

जैन धर्म के सबसे बड़े पर्व पर्युषण और दशलक्षण की संपूर्ण जानकारी। तप, प्रतिक्रमण, दस धर्म (उत्तम क्षमा आदि) और विश्वव्यापी क्षमा याचना 'मिच्छामि दुक्कडम्' का महत्व जानें।

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वैदिक अनुष्ठान एवं पंचांग संपादक मंडल

Writer & Research Team

Updated: 2026-08-15
प्रतिक्रमण करते हुए जैन साधु और श्रद्धालु, 'मिच्छामि दुक्कडम्' क्षमा याचना के साथ
जैन पर्व

पर्युषण महापर्व (श्वेतांबर समाज द्वारा 8 दिन) और दशलक्षण महापर्व (दिगंबर समाज द्वारा 10 दिन) जैन धर्म का सबसे महान और आध्यात्मिक उत्सव है। भाद्रपद मास में आने वाला यह पर्व बाहरी उल्लास का नहीं, बल्कि आत्म-निरीक्षण, आत्म-शुद्धि और संचित कर्मों की निर्जरा (नष्ट करने) का समय है। इस दौरान श्रद्धालु कठोर उपवास (जैसे अठ्ठाई या मासक्षमण) करते हैं, कल्पसूत्र का वाचन सुनते हैं, प्रतिक्रमण करते हैं और मौन धारण करते हैं। पर्व का समापन 'संवत्सरी' (या क्षमावाणी) के रूप में होता है, जब सभी जैन धर्मावलंबी 'मिच्छामि दुक्कडम्' (मेरे सभी अपराध क्षमा हों) कहकर जगत के सभी जीवों से क्षमा मांगते हैं और सबको क्षमा करते हैं।

Sacred Heritage

Timeless Temple Tradition

Architectural Wonder

Ancient Vedic Mastery

Scriptural Origin

Puranic & Epic History

Spiritual Sadhana

Living Faith & Wisdom

🗓️भाद्रपद मास (अगस्त–सितंबर)

श्वेतांबर (8 दिन) और दिगंबर (10 दिन) संप्रदायों के अनुसार श्रावण अंत या भाद्रपद में इसकी तिथियां थोड़ी भिन्न होती हैं।

पर्युषण और दशलक्षण पर्व: आत्म-शुद्धि, कठोर तपस्या और सार्वभौमिक क्षमा का महापर्व

संसार के अधिकांश पर्व और त्योहार बाहरी उल्लास, सामाजिक मिलन, स्वादिष्ट व्यंजनों और आतिशबाजी के साथ मनाए जाते हैं। इसके विपरीत, जैन धर्म का पर्युषण और दशलक्षण पर्व एक अलौकिक और अंतर्मुखी आध्यात्मिक अनुष्ठान है। वर्षा ऋतु के चातुर्मास काल में (भाद्रपद मास में) मनाया जाने वाला यह पर्व सांसारिक आमोद-प्रमोद का नहीं, बल्कि आत्मा के विकारों को धोकर उसे शुद्ध करने, कठोर तपस्या (तप), संयम, स्वाध्याय और सार्वभौमिक क्षमा (क्षमावाणी) का महापर्व है।

जैन परंपरा में पर्युषण को 'पर्वाधिराज' यानी सभी पर्वों का राजा कहा गया है। श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों ही परंपराओं के लिए ये दिन एक आध्यात्मिक साधना शिविर के समान होते हैं। इन दिनों का एकमात्र सर्वोच्च उद्देश्य होता है—आत्मा पर जमे कर्मों के भारी आवरण को हटाना, क्रोध, मान, माया और लोभ (चार कषायों) का दमन करना तथा आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जाग्रत करना।

"खामेमि सव्वे जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती मे सव्व-भूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥"
(अर्थात: मैं संसार के समस्त जीवों से क्षमा मांगता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा संसार के सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव है, किसी के प्रति भी कोई वैर या शत्रुता नहीं है।)

पर्युषण और दशलक्षण शब्द का आध्यात्मिक अर्थ

पर्युषण शब्द संस्कृत के दो मूल शब्दों से मिलकर बना है: 'परि' (अर्थात चारों ओर से या समस्त दिशाओं से) और 'वसन' (अर्थात वास करना या निवास करना)। इसका आध्यात्मिक अर्थ है—सांसारिक प्रपंचों और भौतिक आकर्षणों से ध्यान हटाकर अपनी स्वयं की आत्मा में वास करना। इसका एक अन्य अर्थ 'परि-शमन' भी है, जिसका तात्पर्य है आत्मा के भीतर छिपे राग-द्वेष और कषायों को शांत व भस्म कर देना।

दिगम्बर परंपरा में इसे दशलक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है। महान जैनाचार्य उमास्वामी द्वारा रचित ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र के अनुसार, यह पर्व आत्मा के दस स्वाभाविक और शाश्वत गुणों (धर्मों) की आराधना का पर्व है। यहां किसी बाह्य देवता की पूजा के स्थान पर स्वयं आत्मा के विशुद्ध गुणों की पूजा की जाती है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


श्वेताम्बर पर्युषण और दिगम्बर दशलक्षण: मुख्य अंतर

यद्यपि दोनों परंपराओं का मूल उद्देश्य अहिंसा, आत्म-शुद्धि और क्षमा ही है, परंतु उनके अनुष्ठान, दिनों की संख्या और शास्त्र वाचन में कुछ भिन्नताएं हैं:

विषय श्वेताम्बर परंपरा (पर्युषण पर्व) दिगम्बर परंपरा (दशलक्षण पर्व)
पर्व की अवधि 8 दिनों तक निरंतर मनाया जाता है 10 दिनों तक निरंतर मनाया जाता है
समय (तिथि) भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ल पंचमी तक भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) तक
प्रमुख धर्मग्रंथ का वाचन श्री कल्पसूत्र (तीर्थंकरों की जीवन गाथा) एवं अंतगड़दसाओ तत्त्वार्थ सूत्र (अध्याय 9) एवं दस धर्मों पर आधारित प्रवचन
सर्वोच्च दिवस संवत्सरी (आठवां दिन) अनंत चतुर्दशी (दसवां दिन), जिसके बाद क्षमावाणी दिवस
क्षमा याचना का वाक्य "मिच्छामि दुक्कड़म्" "उत्तम क्षमा"
केंद्रीय अनुष्ठान संवत्सरी प्रतिक्रमण (3 घंटे से अधिक चलने वाली आत्म-आलोचना) दशलक्षण धर्म पूजा, ध्यान और निरंतर स्वाध्याय

श्वेताम्बर पर्युषण के 8 पावन दिवस

श्वेताम्बर परंपरा में पर्युषण के आठ दिन आत्मा को बाह्य प्रपंचों से मुक्त कर आंतरिक शांति की ओर ले जाने का सुनियोजित मार्ग हैं:

  1. पहला दिन (अमारि प्रवर्तन व अहिंसा): समस्त जीवों की रक्षा का संकल्प लेना, सूक्ष्म जीवों के प्रति भी अहिंसा का पालन और तप की शुरुआत।
  2. दूसरा दिन (वर्धमान तप व आत्म-शुद्धि): शारीरिक सुख-सुविधाओं का त्याग, सहनशीलता का अभ्यास और भक्तिमय जीवन।
  3. तीसरा दिन (अठाई तप व गुरु वंदन): कई साधक 8 दिवसीय उपवास (अठाई) प्रारंभ करते हैं; आचार्य और गुरु भगवंतों की विशेष वंदना की जाती है।
  4. चौथा दिन (कल्पसूत्र वाचन प्रारंभ): पूज्य साधु-साध्वियों द्वारा पवित्र ग्रंथ कल्पसूत्र का वाचन प्रारंभ होता है, जिसमें तीर्थंकरों के पंच कल्याणकों का वर्णन है।
  5. पांचवां दिन (प्रभु जन्म वाचन व 14 स्वप्न): यह अत्यंत उल्लासमय दिन होता है। भगवान महावीर स्वामी का जन्म वाचन किया जाता है और माता त्रिशला द्वारा देखे गए 14 शुभ स्वप्नों का भव्य दर्शन कराया जाता है।
  6. छठा दिन (संयम व आत्म-चिंतन): उत्सव के वातावरण से निकलकर ध्यान, मौन और इंद्रिय निग्रह की साधना की जाती है।
  7. सातवां दिन (साधु आचार व वैराग्य): मुनि जीवन की मर्यादाओं का श्रवण, अपरिग्रह का अभ्यास और अगले दिन के महापर्व की तैयारी।
  8. आठवां दिन (संवत्सरी - महापर्व): पर्व का सर्वोच्च शिखर। इस दिन पूर्ण उपवास रखा जाता है। वार्षिक संवत्सरी प्रतिक्रमण किया जाता है और अंत में सभी से मिच्छामि दुक्कड़म् कहकर क्षमा मांगी जाती है।

दिगम्बर दशलक्षण पर्व: आत्मा के 10 परम धर्म

दिगम्बर परंपरा के दस दिन आत्मा के दस स्वाभाविक लक्षणों की आराधना को समर्पित होते हैं:

दिन व धर्म संस्कृत नाम आध्यात्मिक महत्व और साधना
पहला दिन: उत्तम क्षमा उत्तम क्षमा क्रोध का समूल नाश करना, धैर्य धारण करना और सभी जीवों को अपने समान मानना।
दूसरा दिन: उत्तम मार्दव उत्तम मार्दव अहंकार, घमंड और मान का त्याग कर अत्यंत कोमल और विनम्र स्वभाव धारण करना।
तीसरा दिन: उत्तम आर्जव उत्तम आर्जव कपट, छल और चालाकी (माया) को छोड़कर मन, वचन और कर्म में पूर्ण सरलता लाना।
चौथा दिन: उत्तम शौच उत्तम शौच लोभ और लालच का त्याग करना तथा मन में पवित्रता और संतोष भाव जाग्रत करना।
पांचवां दिन: उत्तम सत्य उत्तम सत्य सदा हितकारी, प्रिय और सत्य वचन बोलना तथा असत्य का पूर्ण त्याग करना।
छठा दिन: उत्तम संयम उत्तम संयम पांचों इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखना तथा समस्त प्राणी जगत की रक्षा करना।
सातवां दिन: उत्तम तप उत्तम तप कर्मों की निर्जरा के लिए बाह्य और आंतरिक तपस्या करना तथा इच्छाओं का निरोध करना।
आठवां दिन: उत्तम त्याग उत्तम त्याग पात्र जीवों और निर्धनों को बिना किसी स्वार्थ के ज्ञान, आहार, औषधि और अभय का दान देना।
नौवां दिन: उत्तम आकिंचन्य उत्तम आकिंचन्य 'यह मेरा है' के भाव (ममत्व) का त्याग करना; यह जानना कि आत्मा के अलावा मेरा कुछ नहीं है।
दसवां दिन: उत्तम ब्रह्मचर्य उत्तम ब्रह्मचर्य विषय-वासनाओं का त्याग कर अपनी शुद्ध आत्म-चेतना में लीन रहना।

कठोर तपस्या: व्रत और उपवास के विविध रूप

जैन धर्म में तप का अर्थ शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर आत्मा को शक्ति प्रदान करना है। इन दिनों में श्रद्धालु अपनी क्षमतानुसार कठिन तपस्या करते हैं:

  • चौविहार उपवास: लगातार 24 घंटे का पूर्ण उपवास, जिसमें पिछले दिन के सूर्यास्त से लेकर अगले दिन सूर्योदय के 48 मिनट बाद तक जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती।
  • तिविहार उपवास: इसमें अन्न का पूर्ण त्याग होता है, किंतु सूर्योदय से सूर्यास्त के मध्य केवल उबला हुआ ठंडा जल ग्रहण किया जा सकता है।
  • बेला, तेला और अठाई:
    • बेला: लगातार 2 दिनों तक केवल उबले जल पर उपवास।
    • तेला: लगातार 3 दिनों तक उपवास।
    • अठाई: लगातार 8 दिनों तक अन्न का त्याग कर केवल दिन में उबला जल पीकर किया जाने वाला कठिन तप।
  • मासखमण: पूरे एक महीने (30 दिन) तक निरंतर उपवास करना, जिसमें साधक केवल दिन में उबले पानी पर जीवित रहता है।
  • आयंबिल: दिन में केवल एक बार बिना नमक, चीनी, घी, तेल, मसाले, दूध, दही या फल के केवल उबले हुए सादे धान्य और दाल का भोजन करना। यह रसना (जीभ) इंद्रिय को जीतने के लिए किया जाता है।
  • एकासन और बियासन: सूर्यास्त से पूर्व दिन में केवल एक बार (एकासन) या दो बार (बियासन) एक ही आसन पर बैठकर सात्विक भोजन व जल ग्रहण करना।

प्रतिक्रमण: आत्म-निरीक्षण और पश्चाताप की पावन क्रिया

पर्युषण पर्व की दैनिक साधना का सबसे मुख्य अंग प्रतिक्रमण है। प्रतिक्रमण का शाब्दिक अर्थ है—'लौट आना', अर्थात पाप, विकार और प्रमाद के गलत मार्ग से हटकर अपनी शुद्ध आत्मा के स्वभाव में वापस आना। संवत्सरी के दिन किया जाने वाला वार्षिक प्रतिक्रमण 3 घंटे से अधिक समय तक चलता है।

प्रतिक्रमण के दौरान षट्-आवश्यक (छह अनिवार्य कर्तव्य) संपन्न किए जाते हैं:

  1. सामायिक: 48 मिनट तक राग-द्वेष, क्रोध और सांसारिक विचारों को त्यागकर समभाव में लीन रहना।
  2. चौबीसत्थो (चतुर्विंशति स्तव): चौबीस तीर्थंकर भगवंतों की स्तुति और गुणगान करना।
  3. वंदना: गुरु भगवंतों और संतों के चरणों में विनम्र प्रणाम करना।
  4. प्रतिक्रमण: वर्षभर में मन, वचन और काया से हुए ज्ञात-अज्ञात पापों का पश्चाताप और आलोचना करना।
  5. कायोत्सर्ग: शरीर के प्रति मोह त्यागकर स्थिर खड़े होकर या बैठकर शुद्ध ध्यान में लीन होना।
  6. प्रत्याख्यान: भविष्य में पापों और विशिष्ट भोगों के त्याग का नियम या संकल्प लेना।

संवत्सरी और क्षमावाणी: सार्वभौमिक क्षमा का महामंत्र

पर्युषण और दशलक्षण पर्व का समापन मानव इतिहास के सबसे सुंदर और भावनात्मक क्षण के साथ होता है। संवत्सरी और क्षमावाणी दिवस पर प्रत्येक जैन धर्मावलंबी अपने परिवार, मित्रों, पड़ोसियों और यहां तक कि अपने शत्रुओं के पास जाकर दोनों हाथ जोड़कर सच्चे हृदय से क्षमा मांगता है।

"मिच्छामि दुक्कड़म्" का वास्तविक अर्थ:

प्राकृत भाषा का यह पवित्र शब्द दो पदों से मिलकर बना है: 'मिथ्या' (निष्फल, व्यर्थ या शून्य) और 'दुष्कृत' (बुरे कर्म, पाप या गलतियां)। जब कोई व्यक्ति हाथ जोड़कर यह कहता है, तो उसका भाव होता है:

"मेरे द्वारा मन, वचन या शरीर से, जाने-अनजाने में आपके प्रति जो भी कटु व्यवहार, अपमान, चोट या अनुचित कार्य हुआ हो—वे सभी दुष्कृत्य पूर्णतः निष्फल और शून्य हो जाएं। मुझे अंतःकरण से क्षमा करें।"

क्षमा का दार्शनिक महत्व:

जैन धर्म में क्षमा कोई औपचारिकता नहीं है। किसी के प्रति मन में गांठ बांधकर रखना, ईर्ष्या या बदले की भावना रखना आत्मा को भारी कर्मों से बांध देता है। जब साधक सभी को क्षमा कर देता है और सबसे क्षमा मांग लेता है, तो उसके हृदय का सारा विषाद और कर्मों का भार उतर जाता है और आत्मा निर्मल हो जाती है।


पर्व के दौरान खान-पान और जीवनशैली के कड़े नियम

अहिंसा के सूक्ष्म पालन हेतु पर्युषण पर्व के दिनों में आहार और आचरण के अत्यंत कठोर नियम होते हैं:

  • जमींकंद (कंदमूल) का पूर्ण त्याग: आलू, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली, अदरक आदि का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है, क्योंकि जमीन के नीचे उगने वाली इन सब्जियों में अनंत सूक्ष्म जीवों (निगोद) का वास होता है।
  • हरी सब्जियों का त्याग: पर्व के दिनों में वनस्पति काय के जीवों की हिंसा से बचने के लिए कई श्रद्धालु हरी पत्तेदार सब्जियों का भी त्याग कर केवल सूखे अनाज और दालों का सेवन करते हैं।
  • केवल उबला हुआ पानी (उकाला जल): पानी को अच्छी तरह उबालकर, छानकर और ठंडा करके ही पीते हैं। कच्चा नल का पानी नहीं पिया जाता और सूर्यास्त के बाद जल ग्रहण नहीं किया जाता।
  • सूर्यास्त से पहले भोजन (चौविहार): रात्रि के अंधकार में सूक्ष्म कीट-पतंगों की उत्पत्ति हो जाती है, अतः सूर्यास्त से पूर्व ही भोजन और जल ग्रहण कर लिया जाता है।
  • मौन, ब्रह्मचर्य और सादगी: इन दिनों में टीवी, सिनेमा और मोबाइल का त्याग किया जाता है। ब्रह्मचर्य का पालन, व्यापारिक विवादों से दूरी और अधिक से अधिक समय मौन व स्वाध्याय में बिताया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

1. पर्युषण और दशलक्षण पर्व में क्या मुख्य अंतर है?

पर्युषण पर्व मुख्य रूप से श्वेताम्बर परंपरा द्वारा 8 दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें कल्पसूत्र का वाचन होता है और संवत्सरी पर समापन होता है। दशलक्षण पर्व दिगम्बर परंपरा द्वारा 10 दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें तत्त्वार्थ सूत्र के 10 धर्मों की आराधना होती है और अनंत चतुर्दशी व क्षमावाणी पर इसका समापन होता है।

2. पर्युषण में केवल उबला हुआ पानी ही क्यों पिया जाता है?

पानी को उबालने से उसमें उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवों का चक्र थम जाता है, जिससे जीव-हिंसा का दोष नहीं लगता। इसके अतिरिक्त, कठोर उपवास रखने वाले साधकों के पाचन तंत्र के लिए भी उबला और मर्यादित जल अत्यंत स्वास्थ्यवर्धक होता है।

3. क्या गैर-जैन भी पर्युषण पर्व की भावना को अपना सकते हैं?

बिल्कुल। पर्युषण के मूल सिद्धांत—क्षमा, अहिंसा, त्याग, दया, सादगी और अहंकार मुक्ति—सार्वभौमिक मानवीय मूल्य हैं। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में शांति, मानसिक तनाव से मुक्ति और आपसी सौहार्द के लिए इन नियमों को अपना सकता है और मिच्छामि दुक्कड़म् कहकर पुराने मतभेदों को मिटा सकता है।

4. पारणा क्या होता है और इसे कैसे किया जाता है?

उपवास या तपस्या की पूर्णता के बाद अगले दिन सुबह किए जाने वाले भोजन को पारणा कहते हैं। पारणा बहुत सादगी से किया जाता है। इसमें सबसे पहले उबला हुआ गुनगुना जल, मूंग का पानी, सोंठ का पानी या बादाम का पानी जैसी हल्की वस्तुएं आदरपूर्वक ग्रहण कराई जाती हैं।


पर्युषण पर्व का अमर संदेश

पर्युषण और दशलक्षण पर्व हमें यह सिखाते हैं कि संसार में वास्तविक विजय किसी दूसरे पर आधिपत्य जमाने में नहीं है, बल्कि अपनी स्वयं की वासनाओं, क्रोध, घमंड और लालच पर विजय प्राप्त करने में है। जब करोड़ों लोग अपनी भूलों को स्वीकार कर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और सच्चे हृदय से "मिच्छामि दुक्कड़म्" या "उत्तम क्षमा" कहते हैं, तो यह संपूर्ण पृथ्वी करुणा, मैत्री और शांति के पवित्र तीर्थ में परिवर्तित हो जाती है।

Why this matters today

जैन धर्म के सबसे बड़े पर्व पर्युषण और दशलक्षण की संपूर्ण जानकारी। तप, प्रतिक्रमण, दस धर्म (उत्तम क्षमा आदि) और विश्वव्यापी क्षमा याचना 'मिच्छामि दुक्कडम्' का महत्व जानें।

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Frequently asked questions

'मिच्छामि दुक्कडम्' का क्या अर्थ है?

यह प्राकृत भाषा का प्राचीन वाक्य है, जिसका अर्थ है: 'यदि मैंने जाने-अनजाने में, मन, वचन या कर्म से आपको कोई कष्ट पहुंचाया हो, तो मैं आपसे क्षमा मांगता हूं।' यह अहंकार को मिटाने का सर्वोच्च मंत्र है।

दशलक्षण पर्व के दौरान किन दस धर्मों की पूजा होती है?

दस उत्तम धर्म हैं: क्षमा, मार्दव (विनम्रता), आर्जव (सरलता), शौच (पवित्रता/संतोष), सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य (अपरिग्रह) और ब्रह्मचर्य। प्रतिदिन एक धर्म पर विशेष चिंतन किया जाता है।

'प्रतिक्रमण' क्या है?

प्रतिक्रमण का अर्थ है 'वापस लौटना'। यह एक ऐसी ध्यान-प्रक्रिया और अनुष्ठान है जिसमें व्यक्ति अपने द्वारा साल भर में की गई गलतियों (पापों) का प्रायश्चित करता है और भविष्य में उन्हें न दोहराने का संकल्प लेता है।