Bhakti Voice
देवी दुर्गा उत्सव8 min read

शारदीय नवरात्रि संपूर्ण गाइड: कलश स्थापना, 9 देवियों की पूजा एवं कन्या पूजन विधि

शारदीय नवरात्रि पर कलश स्थापना की शास्त्रीय विधि, मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा, अखंड ज्योति के नियम, दुर्गा सप्तशती पाठ और कन्या पूजन विधि जानें।

व

वैदिक अनुष्ठान एवं पंचांग संपादक मंडल

Writer & Research Team

Updated: 2026-10-05

Bhakti Voice

भक्ति वॉइस

देवी दुर्गा उत्सव

नवरात्रि का पावन पर्व आद्यशक्ति मां भगवती के नौ दिव्य स्वरूपों (नवदुर्गा) की आराधना का महापर्व है। वर्ष में दो मुख्य नवरात्रियां (चैत्र एवं शारदीय) विशेष रूप से मनाई जाती हैं। यह पर्व अंतःकरण की आसुरी प्रवृत्तियों पर दैवीय शक्तियों की विजय का प्रतीक है। नौ दिनों तक अखंड ज्योति, घटस्थापना, दुर्गा सप्तशती का पाठ और अंत में नवमी तिथि पर कन्या पूजन कर शक्ति की आराधना संपन्न होती है।

Sacred Heritage

Timeless Temple Tradition

Architectural Wonder

Ancient Vedic Mastery

Scriptural Origin

Puranic & Epic History

Spiritual Sadhana

Living Faith & Wisdom

🗓️आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी (सितंबर–अक्टूबर)

घटस्थापना अनिवार्य रूप से प्रतिपदा तिथि में दोपहर से पूर्व संपन्न होनी चाहिए।

नवरात्रि एवं दुर्गा पूजा: मां के नौ दिव्य स्वरूप, घटस्थापना विधि एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में पराशक्ति, मातृ-शक्ति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा की उपासना का सबसे पावन, तेजस्वी और जागृत पर्व नवरात्रि और दुर्गा पूजा है। वर्ष में मुख्य रूप से दो बार मनाई जाने वाली यह नौ दिवसीय साधना—वसंत ऋतु में चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु में शारदीय नवरात्रि (अश्विन मास)—ब्रह्मांड की आदिशक्ति मां दुर्गा को समर्पित है। यह पर्व अधर्म पर धर्म, अंधकार पर प्रकाश और आसुरी शक्तियों (महिषासुर) पर दैवीय शक्ति की शाश्वत विजय का महा-उत्सव है।

जहां उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत में नौ दिनों तक व्रत, उपवास, भजन, गरबा और घटस्थापना (कलश स्थापना) के माध्यम से नवदुर्गा के नौ पावन स्वरूपों की साधना की जाती है, वहीं पूर्वी भारत (विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा) में यह पर्व दुर्गा पूजा (दुर्गोत्सव) के रूप में अत्यंत भव्य सांस्कृतिक रूप से मनाया जाता है। बोधन से प्रारंभ होकर महाअष्टमी की संधि पूजा, ढाक की गूंज पर धुनुची नाच और विजयादशमी के सिन्दूर खेला तक, यह पर्व मानव आत्मा के विकारों को नष्ट कर उसमें नवचेतना का संचार करता है।

"सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥"
(अर्थात: हे संपूर्ण मंगलों का मंगल करने वाली, कल्याणकारी, समस्त पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, तीनों लोकों की शरणदात्री, तीन नेत्रों वाली हे मां गौरी, हे नारायणी! आपको हमारा बारंबार नमन है।)

संक्षिप्त परिचय और मुख्य तथ्य

विषय धार्मिक एवं शास्त्रीय विवरण
पर्व का नाम शारदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दुर्गोत्सव
शाब्दिक अर्थ नव (नौ) + रात्रि (अंधकार का नाश करने वाली रातें) = आत्म-चेतना के 9 चरण
हिन्दू पंचांग तिथि अश्विन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दशमी तिथि (सितंबर–अक्टूबर)
प्रमुख धर्मग्रंथ दुर्गा सप्तशती (मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत देवी महात्म्य / श्री श्री चंडी पाठ)
प्रथम दिन का मुख्य संस्कार घटस्थापना (कलश स्थापना) एवं अखंड ज्योति प्रज्वलन
मुख्य लीलाएं महिषासुर मर्दिनी लीला एवं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम द्वारा अकाल बोधन
सर्वोच्च दिवस महाअष्टमी (संधि पूजा), महानवमी (कन्या पूजन) और विजयादशमी (दशहरा)

नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य: 'नौ रातें' ही क्यों?

वैदिक दर्शन में रात्रि को विश्राम, अंतर्मुखी होने और पुनर्जीवन का प्रतीक माना गया है। जैसे गर्भ में शिशु नौ माह तक रहकर पूर्ण जीवन प्राप्त करता है, उसी प्रकार साधक नौ रात्रियों में अपनी इंद्रियों को बाहरी संसार से समेटकर जगतजननी मां के आंचल में समर्पित करता है और अपनी आध्यात्मिक चेतना का पुनर्जन्म करता है।

नौ रात्रियों के तीन दिव्य चरण:

  • प्रथम 3 रातें (तमोगुण का नाश - मां महाकाली): काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी आंतरिक राक्षसों का संहार करने के लिए मां काली की उपासना की जाती है।
  • मध्य की 3 रातें (रजोगुण का परिष्कार - मां महालक्ष्मी): हृदय की शुद्धि के पश्चात जीवन में सात्विक समृद्धि, प्रेम, करुणा और दैवीय गुणों के विकास हेतु मां लक्ष्मी की आराधना होती है।
  • अंतिम 3 रातें (सत्वगुण का प्रकाश - मां महासरस्वती): अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान, विवेक, प्रज्ञा और मोक्ष की प्राप्ति के लिए मां सरस्वती की उपासना की जाती है।

नवदुर्गा: मां के नौ दिव्य स्वरूप

मार्कंडेय पुराण के देवी कवच में मां के नौ अलौकिक स्वरूपों का वर्णन है, जो मानव शरीर के नौ चक्रों को जाग्रत करते हैं:

दिन व स्वरूप वाहन एवं आयुध आशीर्वाद एवं चक्र जाग्रति
1. मां शैलपुत्री वृषभ (बैल) की सवारी; हाथ में त्रिशूल और कमल। हिमालय राज की पुत्री। स्थिरता, शक्ति और प्रकृति का आधार; मूलाधार चक्र जाग्रत होता है।
2. मां ब्रह्मचारिणी नंगे पैर गमन; हाथ में अक्षमाला और कमंडल। कठोर तप की प्रतिमूर्ति। संयम, तप, त्याग और वैराग्य का वरदान; स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रत होता है।
3. मां चंद्रघंटा सिंह/बाघ की सवारी; मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र; दस भुजाओं में अस्त्र। भय, अशांति और प्रेत-बाधा का नाश; मणिपुर चक्र जाग्रत होता है।
4. मां कूष्मांडा सिंह की सवारी; आठ भुजाएं; अपनी मंद मुस्कान से संपूर्ण ब्रह्मांड को रचा। तेज, आरोग्य, आयु और प्राण ऊर्जा की वृद्धि; अनाहत चक्र (हृदय) जाग्रत होता है।
5. मां स्कंदमाता सिंह पर विराजमान; गोद में बालक कार्तिकेय (स्कंद); चार भुजाएं। मातृत्व का वात्सल्य, ज्ञान और मोक्ष का मार्ग; विशुद्ध चक्र (कंठ) जाग्रत होता है।
6. मां कात्यायनी भव्य सिंह की सवारी; महर्षि कात्यायन की पुत्री; महिषासुर का वध करने वाली। विवाह बाधा निवारण और धर्म की विजय; आज्ञा चक्र (तीसरा नेत्र) जाग्रत होता है।
7. मां कालरात्रि गर्दभ (गधा) की सवारी; घने अंधकार जैसा काला रंग, बिखरे बाल, हाथ में खड्ग। समस्त शत्रुओं, अकाल मृत्यु और भय का काल; सहस्रार चक्र जाग्रत होता है।
8. मां महागौरी श्वेत वृषभ की सवारी; पूर्णतः गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र; अत्यंत शांत व सौम्य। पूर्व जन्मों के समस्त संचित पापों का क्षय और परम शांति की प्राप्ति।
9. मां सिद्धिदात्री कमल पुष्प पर आसीन; चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म। अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्रदात्री; मोक्ष और परमानंद की सिद्धि।

चरण-दर-चरण घटस्थापना (कलश स्थापना) विधि

नवरात्रि के प्रथम दिन (प्रतिपदा) घटस्थापना अत्यंत सावधानी से शास्त्रोक्त शुभ मुहूर्त में ही की जानी चाहिए। घटस्थापना करते समय चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। इसके लिए प्रातःकाल का समय अथवा दोपहर का अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना गया है:

  1. सप्तधान्य (जौ) बोने की वेदी: मिट्टी का एक चौड़ा और उथला पात्र लें। उसमें स्वच्छ, उर्वर मिट्टी की परत बिछाएं। उस पर साबुत, साफ जौ (यव) के दाने समान रूप से बिखेरें और ऊपर से हल्की मिट्टी डालकर थोड़ा जल छिड़कें। यह नौ दिनों में उगकर हरे-भरे 'जवारे' बनते हैं, जो घर में धन-धान्य और समृद्धि का संकेत देते हैं।
  2. कलश की तैयारी (ब्रह्मांड का प्रतीक): तांबे, पीतल या शुद्ध मिट्टी का कलश लें। कलश में शुद्ध जल और गंगाजल भरें। कलश के जल में:
    • एक साबुत सुपारी।
    • एक चांदी या तांबे का सिक्का।
    • चुटकी भर साबुत अक्षत और रोली।
    • एक गांठ साबुत हल्दी।
    • सर्वौषधि और सुगंधित चंदन डालें।
  3. आम्रपल्लव लगाना: कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच या सात ताजे हरे पत्ते इस प्रकार लगाएं कि उनके डंठल जल में रहें और नुकीले सिरे ऊपर की ओर रहें।
  4. नारियल (श्रीफल) की स्थापना: एक जटा वाला सूखा नारियल लें। उस पर नया लाल वस्त्र या माता की लाल चुनरी लपेटें और उसे लाल कलावे (मौली) से अच्छी तरह बांधें। नारियल को आम के पत्तों के बीच कलश के मुख पर स्थापित करें। नारियल का मुख सदैव साधक (पूजा करने वाले) की ओर होना चाहिए।
  5. कलश की प्राण-प्रतिष्ठा: तैयार कलश को जौ वाले मिट्टी के पात्र के ठीक बीच में स्थापित करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। वरुण देव, त्रिदेवों, पवित्र नदियों और मां भगवती का आह्वान करें:
    "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥"
    कलश पर स्वास्तिक बनाएं, चंदन-कुमकुम का तिलक लगाएं, लाल गुड़हल का फूल अर्पित करें और धूप-दीप दिखाएं।
  6. अखंड ज्योति प्रज्वलन: कई श्रद्धालु नवरात्रि के प्रथम दिन पीतल के दीपक में गाय का शुद्ध घी या तिल का तेल डालकर अखंड ज्योति जलाते हैं, जो पूरे नौ दिनों तक बिना बुझे निरंतर जलती रहती है।

पूर्वी भारत का भव्य दुर्गोत्सव (बंगाल की दुर्गा पूजा)

पूर्वी भारत में यह पर्व एक महा-अनुष्ठान और विश्व प्रसिद्ध कला उत्सव का रूप ले लेता है, जिसे यूनेस्को (UNESCO) द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित किया गया है:

1. भगवान श्री राम का अकाल बोधन

कृत्तिवास रामायण के अनुसार, रावण पर विजय पाने के लिए भगवान श्री राम ने शरद ऋतु में मां दुर्गा का असामयिक आह्वान (अकाल बोधन) किया था। पूजा में 108 नीले कमलों में से जब एक कमल कम हो गया, तो प्रभु राम ने अपना कमल-नयन नेत्र काटकर मां के चरणों में अर्पित करने के लिए बाण उठा लिया। प्रभु की इस पराकाष्ठा वाली भक्ति से प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने प्रकट होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था।

2. दुर्गोत्सव के प्रमुख चरण (षष्ठी से दशमी):

  • महाषष्ठी (बोधन): भव्य पूजा पंडालों में मां की प्रतिमाओं के नेत्र खोले जाते हैं और उनका आमंत्रण व प्राण-प्रतिष्ठा होती है। मां दुर्गा अपने चार संतानों—लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ पधारती हैं।
  • महासप्तमी (नवपत्रिका स्नान): नौ विभिन्न पौधों (केला, हल्दी, अनार, अशोक, बेल, धान आदि) को एक साथ बांधकर, उन्हें लाल-सफेद साड़ी पहनाकर (जिन्हें कोला बोऊ कहा जाता है) पवित्र नदी में स्नान कराया जाता है। यह प्रकृति के नौ रूपों की साक्षात पूजा है।
  • महाअष्टमी एवं संधि पूजा: यह दुर्गा पूजा का सबसे दिव्य और उग्र क्षण होता है। अष्टमी के समाप्त होने और नवमी के प्रारंभ होने के ठीक मध्य के 48 मिनट के संधि काल में मां ने चंड-मुंड का संहार करने के लिए चामुंडा रूप धरा था। इस समय मां को 108 नीले कमल और 108 मिट्टी के दीपक अर्पित किए जाते हैं।
  • महानवमी (धुनुची नाच): पारंपरिक ढाक की थाप पर भक्तजन मिट्टी के पात्रों में जलते हुए नारियल के छिलके और धूप (धुनो) रखकर अपने हाथों और मुंह से संतुलित करते हुए भक्ति में लीन होकर धुनुची नाच करते हैं।
  • विजयादशमी (सिन्दूर खेला व विसर्जन): सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा के मस्तक और चरणों पर सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की मंगलकामना करती हैं (सिन्दूर खेला)। इसके पश्चात अश्रुपूरित नेत्रों से "आशचे बोछोर आबार होबे" (मां अगले वर्ष फिर आना) के जयघोष के साथ प्रतिमाओं का पवित्र नदियों में विसर्जन किया जाता है।

कन्या पूजन (कुमारी पूजा): जीवित देवियों की आराधना

महाअष्टमी या महानवमी के दिन घरों में कन्या पूजन किया जाता है। सनातन धर्म मानता है कि 2 से 10 वर्ष की नन्हीं कन्याएं साक्षात मां भगवती का ही निष्पाप और शुद्ध स्वरूप होती हैं:

  1. घर में 9 नन्हीं कन्याओं (नवदुर्गा का प्रतीक) और एक छोटे बालक (बटुक भैरव का प्रतीक) को ससम्मान आमंत्रित किया जाता है।
  2. थाली में जल और दूध लेकर श्रद्धापूर्वक उनके चरण धोए जाते हैं और साफ तौलिए से पोंछे जाते हैं।
  3. उनके मस्तक पर रोली-अक्षत का तिलक लगाया जाता है और हाथों में रक्षा सूत्र (मौली) बांधा जाता है।
  4. उन्हें मां का प्रिय महाप्रसाद—काले चने, सूजी का हलवा और गरमा-गरम फूली हुई पूरियां प्रेमपूर्वक खिलाई जाती हैं।
  5. भोजन के पश्चात कन्याओं को लाल चुनरी, फल, उपहार और दक्षिणा देकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है।

क्या करें और क्या न करें (नियम और सावधानियां)

क्या करें (अनिवार्य नियम) क्या न करें (सख्त वर्जनाएं)
घटस्थापना केवल शुभ मुहूर्त में और सही दिशा (पूर्व/उत्तर) में ही करें। चित्रा नक्षत्र में कलश न रखें: अशुभ योगों में कलश स्थापना करने से बचें।
सात्विक फलाहार लें (सेंधा नमक, कुट्टू, सिंघाड़ा, ताजे फल व दूध)। लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं: घर को पूरी तरह तामसिक भोजन से मुक्त रखें।
यदि अखंड ज्योति जलाई है, तो घर को कभी भी बिल्कुल खाली न छोड़ें। अखंड ज्योति को बुझने न दें: ज्योति का बुझना अपशकुन माना जाता है।
पूरे नौ दिनों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य, सत्य और शांति का पालन करें। बाल, दाढ़ी और नाखून न काटें: व्रत के दिनों में बाल-नाखून काटना वर्जित है।
अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन के पश्चात ही व्रत का पूर्ण उद्यापन करें। महिलाओं का अनादर न करें: जिस घर में नारी का अपमान होता है, वहां मां नहीं ठहरतीं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

1. नवरात्रि में बोए गए जौ (जवारे) का क्या महत्व है?

सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले उत्पन्न होने वाला अन्न 'जौ' (यव) ही था। नवरात्रि में बोए गए जौ यदि घने, सीधे और हरे रंग के उगते हैं, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाला वर्ष आपके परिवार के लिए अपार समृद्धि, शांति और उत्तम स्वास्थ्य लेकर आएगा।

2. बंगाल में दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए वेश्यालय की मिट्टी (निषिद्ध पल्ली की माटी) क्यों लाई जाती है?

यह सनातन संस्कृति के परम समावेशी और करुणामयी दृष्टिकोण का प्रतीक है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति ऐसे स्थान पर प्रवेश करता है, तो वह अपनी सारी पवित्रता और पुण्य चौखट के बाहर छोड़ जाता है; अतः उस देहरी की मिट्टी सबसे पवित्र मानी जाती है। दूसरा संदेश यह है कि मां दुर्गा के दरबार में कोई अछूत या पतित नहीं है; उनका मातृत्व समाज के हर उपेक्षित वर्ग को अपने आंचल में समेटता है।

3. क्या कोई केवल पहले और आखिरी दिन का व्रत रख सकता है?

हां, शास्त्रों में इसे 'जोड़ा व्रत' कहा जाता है। जो लोग अस्वस्थता या व्यस्तता के कारण पूरे नौ दिन उपवास नहीं रख सकते, वे पहले दिन (प्रतिपदा) और आठवें दिन (महाअष्टमी) का उपवास रखकर शेष दिनों में सात्विक आहार लेकर भी मां की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

4. अखंड ज्योति के क्या नियम हैं?

अखंड ज्योति को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए; उसे चावल या जौ की ढेरी पर स्थापित करें। ज्योति को हवा के झोंकों से बचाने के लिए कांच की चिमनी का प्रयोग करें और उसमें समय-समय पर घी या तिल का तेल डालते रहें ताकि वह नौ दिनों तक अखंड जलती रहे।


निष्कर्ष

नवरात्रि और दुर्गा पूजा केवल बाह्य आडंबर या उत्सव नहीं, बल्कि अंतरात्मा की शुद्धि और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानने का महायज्ञ है। यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे आसुरी शक्तियां कितनी भी प्रबल क्यों न हों, जब सत्य, संयम और मातृ-शक्ति का जागरण होता है, तो हर प्रकार के अंधकार और महिषासुर का संहार निश्चित है। जब मंदिरों में शंख गूंजते हैं, पंडालों में ढाक की थाप पर धुनुची का धुआं उठता है और लाखों मस्तक मां के चरणों में झुकते हैं, तो संपूर्ण ब्रह्मांड एक दिव्य अभयदान से भर उठता है।

"बोलो सांचे दरबार की जय! मां जगदम्बा की असीम अनुकंपा से आपके घर में सुख, शांति, संपन्नता, अटूट स्वास्थ्य और आध्यात्मिक तेज का सदैव प्रकाश जगमगाता रहे।"

त्योहार की मुख्य परंपराएं एवं नियम

  • ✓घटस्थापना: मिट्टी के पात्र में सप्तधान्य बोना और जलपूर्ण कलश की स्थापना
  • ✓नौ दिनों तक पवित्र अखंड ज्योति प्रज्वलित रखना
  • ✓नित्य दुर्गा सप्तशती (चंडी पाठ) और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ
  • ✓गुजरात और पश्चिमी भारत में भक्तिमय गरबा और डांडिया रास
  • ✓अष्टमी-नवमी पर कन्या पूजन कर हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद खिलाना

घर पर सरल पूजा विधि

प्रातः शुद्ध मिट्टी में जौ बोएं। उसके ऊपर तांबे के कलश में गंगाजल, सिक्का, सुपारी और आम के पल्लव रखें। कलश पर मौली बंधा श्रीफल (नारियल) स्थापित करें। 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का जाप करते हुए देवी का आह्वान करें। लाल चुनरी, सिन्दूर, लाल पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा चालीसा का पाठ कर कर्पूर से आरती करें।

Why this matters today

शारदीय नवरात्रि पर कलश स्थापना की शास्त्रीय विधि, मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा, अखंड ज्योति के नियम, दुर्गा सप्तशती पाठ और कन्या पूजन विधि जानें।

?

Frequently asked questions

घटस्थापना (कलश स्थापना) का सबसे शुभ समय कौन सा होता है?

प्रतिपदा तिथि के दिन प्रातःकाल द्विस्वभाव लग्न या अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना करना सर्वश्रेष्ठ होता है। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में स्थापना वर्जित है।

नवरात्रि में जौ (जवारे) क्यों बोए जाते हैं?

जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है। जवारों का हरा-भरा और तीव्र गति से बढ़ना घर में सुख, शांति और मां दुर्गा की कृपा का सूचक है।

अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन का क्या महत्व है?

2 से 10 वर्ष की कन्याओं को साक्षात नवदुर्गा का स्वरूप माना जाता है। उनका पूजन व सत्कार करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होकर मनोवांछित फल देती हैं।