अहोई अष्टमी संपूर्ण मार्गदर्शिका: संतान की दीर्घायु के लिए व्रत, साही माता पूजा व कथा
संतान की दीर्घायु और कल्याण के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले अहोई अष्टमी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि, साही (स्याहु) माता की कथा और तारा व चंद्र दर्शन का सटीक समय जानें।
वैदिक अनुष्ठान एवं पंचांग संपादक मंडल
Writer & Research Team

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (दीपावली से ठीक आठ दिन पूर्व) को अहोई अष्टमी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर तारों (या चंद्र दर्शन) तक कठोर निर्जला उपवास रखती हैं। संध्या काल में गेरू से दीवार पर अहोई माता और सेह (साही) की आकृति बनाकर उनका विधि-विधान से पूजन किया जाता है। पूजा के पश्चात आकाश में तारों को अर्घ्य देकर माताएं अपना व्रत खोलती हैं।
Sacred Heritage
Timeless Temple Tradition
Architectural Wonder
Ancient Vedic Mastery
Scriptural Origin
Puranic & Epic History
Spiritual Sadhana
Living Faith & Wisdom
करवा चौथ के चार दिन बाद अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है।
अहोई अष्टमी: संक्षिप्त विवरण और मुख्य तथ्य
| विषय | धार्मिक विवरण |
|---|---|
| त्योहार का नाम | अहोई अष्टमी (अहोई आठे / कृष्ण अष्टमी व्रत) |
| हिन्दू पंचांग तिथि | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि |
| व्रत कर्ता | माताएं (संतान की रक्षा हेतु) एवं संतान प्राप्ति की इच्छुक महिलाएं |
| प्रमुख आराध्य देवी | अहोई माता (स्याहु माता / माता पार्वती का ममतामयी स्वरूप) |
| व्रत का स्वरूप | निर्जला व्रत (सूर्योदय से लेकर गोधूलि वेला तक बिना अन्न और जल का उपवास) |
| व्रत खोलने का आधार | संध्याकाल में तारों का दर्शन (तारा दर्शन); कुछ परिवारों में चंद्र दर्शन की परंपरा |
| मुख्य उद्देश्य | संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, रक्षा और सर्वांगीण समृद्धि |
| विशेष रक्षा सूत्र | चांदी का स्याहु लॉकेट और चांदी के मनके (लाल कलावा में पिरोए हुए) |
शुभ मुहूर्त और पवित्र समय सारणी
| पूजा का चरण | शास्त्रोक्त समय | धार्मिक कर्तव्य |
|---|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | प्रातः 04:15 से 05:15 बजे | स्नान, शुद्ध वस्त्र धारण और व्रत का पावन संकल्प लेना |
| निर्जला व्रत अवधि | सूर्योदय से संध्याकाल तक | अन्न-जल का पूर्ण त्याग और दिन में सोने से परहेज |
| शाम की पूजा का मुहूर्त (प्रदोष काल) | शाम 05:45 से 07:05 बजे तक | अहोई माता की पूजा, घी का दीपक जलाना और व्रत कथा का श्रवण |
| तारा दर्शन (अर्घ्य समय) | शाम 06:10 से 06:35 बजे (गोधूलि वेला) | आकाश में चमकते तारों को करवे से जल का अर्घ्य देना |
| अष्टमी चंद्रोदय का समय | रात्रि 11:20 से 11:55 बजे (स्थान अनुसार) | चंद्र अर्घ्य (केवल उन परिवारों के लिए जहां चंद्र दर्शन की परंपरा है) |
| राधा कुंड पावन स्नान (गोवर्धन) | मध्यरात्रि (11:45 से 12:30 बजे) | संतान सुख की कामना हेतु दंपतियों द्वारा पवित्र कुंड में डुबकी |
संपूर्ण पूजा सामग्री सूची
- माता का चित्र या भित्ति चित्र: अहोई माता का पारंपरिक कैलेंडर अथवा दीवार पर गेरू और पिसे हुए चावल के लेप से बना चित्र।
- चांदी की स्याहु माला: अहोई माता की नक्काशीदार चांदी की स्याहु (लॉकेट) और दो गोल चांदी के मोती, जो लाल कलावे (मौली) में पिरोए हों।
- जल पात्र: एक टोंटीदार मिट्टी या पीतल का करवा (ढक्कन सहित) तथा अर्घ्य के लिए तांबे का लोटा।
- पवित्र अन्न व दूर्वा: सात या आठ मुट्ठी साबुत गेहूं के दाने, हरी दूर्वा घास के तिनके और ताजे फूल।
- पारंपरिक भोग सामग्री:
- शुद्ध देशी घी में बने 8 मीठे पुए या आटे का हलवा।
- उबले हुए ताजे सिंघाड़े।
- ताजे गन्ने के टुकड़े।
- पत्तों सहित ताजी हरी मूली।
- पूजन द्रव्य: गाय का शुद्ध घी, रुई की बत्ती, मिट्टी का दीपक, धूपबत्ती, रोली (कुमकुम), अक्षत (अखंडित चावल) और चंदन।
- बायना सामग्री (सास के लिए भेंट): एक थाली में मीठे पुए, मौसमी फल, नई साड़ी और दक्षिणा राशि।
चरण-दर-चरण अहोई अष्टमी व्रत विधि
- प्रातःकालीन संकल्प: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों, स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें और दाएं हाथ में जल व अक्षत लेकर संतान की दीर्घायु का संकल्प लें।
- अहोई माता की चौकी तैयार करना: उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर गेरू से आठ कोनों वाली अहोई माता, सातों पुत्र, गाय, बछड़ा, शेर और साही (स्याहु) व उसके बच्चों का चित्र बनाएं या चौकी पर चित्र स्थापित करें।
- करवा स्थापित करना: टोंटीदार करवे में स्वच्छ जल भरें, उसकी टोंटी में दूर्वा लगाएं, ढक्कन पर गेहूं रखें और उसके ऊपर गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- चांदी की स्याहु का पूजन: चांदी की स्याहु और मोतियों को कच्चे दूध व गंगाजल से स्नान कराएं, रोली-अक्षत का तिलक लगाएं और माता के चरणों में अर्पित करें।
- व्रत कथा का श्रवण: हाथ में सात गेहूं के दाने और दूर्वा घास लेकर साहुकार की पत्नी और साही के बच्चों वाली अहोई अष्टमी की पावन कथा सुनें या पढ़ें।
- माता की आरती: कथा के पश्चात कपूर या घी के दीपक से अहोई माता की आरती उतारें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
- तारों को अर्घ्य देना: शाम को आकाश में तारे निकलने पर लोटे या करवे के जल से तारों को अर्घ्य दें और हाथ के गेहूं के दानों को भी अर्पित करें।
- स्याहु माला धारण करना: अर्घ्य के पश्चात पूजा की गई चांदी की स्याहु माला को माताएं श्रद्धापूर्वक अपने गले में धारण करें।
- बायना भेंट करना: सास या घर की बुजुर्ग महिला के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और बायने की थाली उन्हें आदर सहित भेंट करें।
- व्रत का पारण: अपने बच्चे के हाथों से जल ग्रहण करें और माता के प्रसाद स्वरूप मीठे पुए या खीर खाकर व्रत पूर्ण करें।
तारों के दर्शन और अर्घ्य देने के नियम
| नियम | शास्त्रीय निर्देश |
|---|---|
| दिशा | गोधूलि वेला में उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा के आकाश की ओर मुख करें |
| अर्घ्य का पात्र | पूजा में रखा गया टोंटीदार करवा अथवा तांबे का शुद्ध लोटा |
| जल में मिलाने योग्य वस्तुएं | कच्चे दूध की कुछ बूंदें, चुटकी भर रोली और साबुत गेहूं के दाने |
| जल अर्पित करने की विधि | पात्र को दोनों हाथों से सिर की ऊंचाई तक उठाएं और बिना रुके धार बनाकर तारों की ओर जल गिराएं |
| पैरों की सुरक्षा | अर्घ्य का जल पैरों पर न पड़े, इसलिए नीचे कोई स्वच्छ परात रखें या गमले/तुलसी के क्यारे में जल अर्पित करें |
| बादल होने पर नियम | यदि आसमान में बादल या धुंध हो, तो पंचांग में दिए गए तारा उदय के समय उत्तर-पूर्व दिशा में तारों का ध्यान करके अर्घ्य दें |
चांदी की स्याहु माला का स्वरूप और महत्व
- मुख्य लॉकेट: चांदी का चौकोर या गोल पत्तर जिस पर अहोई माता की आकृति अंकित होती है।
- आरंभिक मोती: लॉकेट के दोनों तरफ एक-एक गोल चांदी का दाना (मोती) पिरोया जाता है।
- धागा: कच्चा सूती लाल और पीला कलावा (मौली धागा)।
- प्रतिवर्ष वृद्धि: हर साल अहोई अष्टमी पर इस माला में एक या दो चांदी के नए मोती जोड़े जाते हैं, अथवा प्रत्येक संतान के नाम का मोती बढ़ाया जाता है।
- पहनने की अवधि: इसे अहोई अष्टमी की रात से लेकर दीपावली तक (या भैया दूज तक) पहना जाता है, फिर शुद्ध स्थान पर सुरक्षित रख दिया जाता है।
राधा कुंड पावन स्नान (संतान प्राप्ति हेतु)
| विवरण | तीर्थ महात्म्य |
|---|---|
| पवित्र तीर्थ स्थल | राधा कुंड, गोवर्धन पर्वत परिक्रमा मार्ग, मथुरा (उत्तर प्रदेश) |
| स्नान का समय | कार्तिक कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि (निशीथ काल) |
| पुण्य फल | संतानहीन दंपतियों को श्री राधा रानी की कृपा से संतान सुख की प्राप्ति |
| विशेष अर्पण | सफेद पेठा (कूष्मांड फल) को हाथ में लेकर राधा कुंड के जल में अर्पित करना |
| धार्मिक मान्यता | भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम रस से निर्मित इस कुंड में स्नान से वंश वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है |
क्या करें और क्या न करें (नियम और सावधानियां)
| क्या करें (अनिवार्य नियम) | क्या न करें (सख्त वर्जनाएं) |
|---|---|
| पूरे दिन मन शांत रखें और बच्चों के प्रति केवल स्नेह व वात्सल्य भाव रखें। | धारदार वस्तुओं का प्रयोग न करें: चाकू, कैंची, सुई, दरांती या ब्लेड का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित है। |
| गौमाता और उसके बछड़े को हरा चारा, गुड़ और आटे का पेड़ा श्रद्धा से खिलाएं। | मिट्टी न खोदें: खुरपी न चलाएं, क्यारी न खोदें और न ही मिट्टी को किसी भी रूप में कुरेदें। |
| पुत्र और पुत्री दोनों की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए समान भाव से प्रार्थना करें। | दिन में न सोएं: व्रत रखने वाली महिलाओं को दिन में सोने से बचना चाहिए। |
| पूजा में लाल, पीले, गुलाबी या नारंगी जैसे शुभ रंगों के वस्त्र ही पहनें। | काले और नीले वस्त्र न पहनें: पूजा और व्रत के समय गहरे काले या नीले रंग का त्याग करें। |
| व्रत खोलने से पूर्व जरूरतमंद बच्चों को भोजन, मिठाई या फल अवश्य दान करें। | तामसिक भोजन न बनाएं: घर में लहसुन, प्याज या मांसाहार का प्रवेश पूरी तरह निषेध रखें। |
अहोई अष्टमी के पावन मंत्र
1. व्रत का सुबह का संकल्प मंत्र
मम पुत्राणां (पुत्रीणां) दीर्घायुष्य-आरोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्ध्यर्थम् अहोई-अष्टमी-व्रतं करिष्ये।
अर्थ: मैं अपनी संतानों की लंबी उम्र, निरोगी काया और सुख-समृद्धि की वृद्धि के लिए अहोई अष्टमी का व्रत करती हूं।
2. अहोई माता ध्यान मंत्र
ॐ अहोई मातर्यै नमः। सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: हे संपूर्ण मंगलों का विधान करने वाली कल्याणकारी अहोई माता! हम आपकी शरण में हैं, हमारी संतानों की रक्षा करें।
3. तारों को अर्घ्य देने का मंत्र
गगनार्णव-संभूत तारागण-समन्विते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं पुत्राणां शुभ-वर्धिनि॥
अर्थ: हे आकाश रूपी सागर में चमकने वाले दिव्य तारागण! आप मेरी संतानों के कल्याण और ऐश्वर्य को बढ़ाने वाले हैं, मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करें।
Why this matters today
संतान की दीर्घायु और कल्याण के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले अहोई अष्टमी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि, साही (स्याहु) माता की कथा और तारा व चंद्र दर्शन का सटीक समय जानें।
Frequently asked questions
अहोई माता के साथ सेह (साही) क्यों बनाई जाती है?
कथा के अनुसार एक साहूकार की पत्नी से अनजाने में साही के बच्चों की मृत्यु हो गई थी, जिससे उसके बच्चे भी नहीं बचे। साही की सेवा और अहोई माता की कृपा से उसे अपनी संतान पुनः प्राप्त हुई। इसलिए सेह की पूजा होती है।
अहोई अष्टमी का व्रत कैसे खोला जाता है?
अधिकतर माताएं संध्याकाल में तारों को देखकर और अर्घ्य देकर व्रत खोल लेती हैं। परंतु कुछ पारिवारिक परंपराओं में देर रात चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
चांदी की अहोई (स्याहु) की माला का क्या महत्व है?
माताएं चांदी की अहोई और मोतियों की माला पहनती हैं। जब भी घर में कोई संतान जन्म लेती है या विवाह होता है, तो माला में चांदी का नया मोती पिरोया जाता है, जो वंश वृद्धि का प्रतीक है।
